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विश्वसनीयता ही संगठन को बनाती है संस्थान

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  May 16, 2019

यह लेख उच्चतम न्यायालय और विïश्वसनीयता के मौजूदा संकट के केंद्र में मौजूद बिंदुओं के बारे में नहीं है। प्रैक्टिस करने वाला एक वकील होने के नाते ऐसे मसलों पर चर्चा करने को सही और गलत के गुण-दोषों पर टिप्पणी के तौर पर देखे जाने का भी जोखिम जुड़ा है जिसका न्यायिक समुदाय एवं संबद्ध पक्षों के हाथों गंभीर नतीजा भी भुगतना पड़ सकता है। सच तो यह है कि 'संकट' शब्द का इस्तेमाल भी एक भावनात्मक मुद्दा हो सकता है। इसके बजाय यह लेख संस्थानों और उन सामाजिक अपेक्षाओं के बारे में है कि 'संगठन' किस तरह 'संस्थानों' में परिवर्तित होते हैं। जब कोई संगठन न्याय प्रदान करने की व्यवस्था के शीर्ष पर है तो उसे महज कानूनी व्याख्या से परे विश्वसनीयता की अघोषित जरूरत भी होती है। यह शीर्ष अदालत के फैसलों को मिलने वाली सामाजिक स्वीकृति के केंद्र में होता है। 

 
संवैधानिक एवं विधिक तौर पर उच्चतम न्यायालय हमेशा सही होता है क्योंकि यह अंतिम न्यायालय है। यह हमेशा सही होने की वजह से अंतिम नहीं होता है। किसी भी संस्थान के निर्णय सही या गलत ठहराए जाने के लिए मुक्त हो सकते हैं। किसी भी विवाद को एक जगह जाकर खत्म होना होता है और वह रास्ता उच्चतम न्यायालय पर जाकर बंद हो जाता है। हालांकि किसी भी दूसरे संगठन की तरह इसका संचालन भी इंसान ही करते हैं। इंसान होने का बुनियादी गुण यह है कि वह गलती भी कर सकता है, हम गलतियां करने के आदी हैं और काफी गलत भी हो सकते हैं। लिहाजा सभी तरह के विवाद यहीं खत्म हो जाते हैं। समाज मान लेता है कि यह समापन केवल हमारे संविधान एवं मानव-निर्मित कानून के कहने से ही नहीं होता है बल्कि न्यायालय की मौलिक विश्वसनीयता के नाते इसके आचरण को समाज की स्वीकृति मिलने की वजह से भी होता है। 
 
विश्वसनीयता ही किसी 'संगठन' को 'संस्थान' में परिवर्तित करती है। ऐसा कहने का कोई मतलब नहीं है कि न्याय न केवल किया जाना चाहिए बल्कि न्याय होते हुए दिखाई भी देना चाहिए। ऐसे न्यायाधीश हैं जिनकी अदालतों से दावा ठुकराए जाने के बाद भी वादियों को यह संतोष रहता है कि उनकी बात अच्छी तरह सुनी गई है। वहीं कुछ ऐसे न्यायाधीश भी हैं जिनकी अदालतों से निकलते समय वादी को जीत मिलने के बाद भी किस्मत का साथ मिलने से राहत का भाव रहता है, न कि जीत का हकदार होने के नाते संतोष का भाव होता है। यह सब इसलिए होता है कि इस न्यायिक व्यवस्था को चलाने वाले इंसान ही होते हैं। 
 
जहां भी इंसान काम करते हैं वहां विचारों में अंतर होगा। कहा-सुनी हो सकती है, स्वस्थ बहस हो सकती है। एक-दूसरे पर गलत काम करने के सही एवं गलत आरोप लगाए जा सकते हैं। मानव संसाधनों पर निर्णय लेने के तरीकों में गहरा अनौचित्य हो सकता है और यह किसी भी संगठन का आवश्यक गुण है। लेकिन संगठन में विचारों के अंतर से निपटने के तरीके, विवादों के समाधान के तरीके और आरोपों के निपटान के तरीके से ही यह परिभाषित किया जाता है कि कोई संगठन संस्थान बन पाया है या नहीं।
 
एक संस्थान के लिए दीर्घकालिक विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि वह अपने लोगों और उसके पास आने वाले लोगों से कैसा बरताव करता है। मत भिन्नता को सेंसर कर देना या आवाज उठाने वाले को प्रताडि़त करना संस्थान में तब्दील नहीं हो पाए किसी भी संगठन के लिए आसान हो सकता है। लेकिन एक वास्तविक संस्थान असहमति, विचारों में भिन्नता को जगह देगा और उसके प्रति पारदर्शिता बरतेगा। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जिंसबर्ग और न्यायमूर्ति स्केलिया के विचार एक-दूसरे से काफी अलग थे- एक लिबरल तो दूसरे कंजर्वेटिव मत के थे। लेकिन दोनों काफी अच्छे दोस्त थे और अपने फैसलों से न्याय एवं कानून के प्रति अपने नजरिये में इस फर्क को जगह भी दी। 
 
अब हमारे देश की एक और संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग का रुख करते हैं जिस पर समूची निर्वाचन प्रक्रिया के संचालन का दायित्व होता है। हमें अब मालूम है कि चुनाव आयोग के एक आयुक्त आयोग के हालिया फैसलों से असहमति जता चुके हैं लेकिन बाकी दो आयुक्त तकनीकी एवं आभासी तर्कों के आधार पर बहुमत से फैसले सुनाकर असहमति की इस आवाज को दबाने में लगे हुए हैं। उनकी दलील यह है कि ये फैसले केवल प्रशासनिक प्रकृति के हैं।  सही एवं गलत को लेकर चुनाव आयोग के विचारों को चाहे जितने अलग रूप में देखा जाए लेकिन चुनावों के निर्विघ्न संचालन के लिए वे अहम हैं। चुनाव संपन्न होंगे और उसके नतीजे को मोटे तौर पर पूरा समाज मान्यता देगा (हालांकि इसके कुछ फैसलों को चुनौती भी दी जाएगी)। लेकिन मतदान खत्म होने पर समूचे देश को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव का अहसास दिलाने के लिए यह विश्वसनीयता जरूरी होगी कि क्या चुनाव आयोग महज एक संगठन की तरह चुनावों का संचालन करता रहा या यह एक ऐसा संस्थान रहा जिसने मतदाताओं को अपने भाग्यविधाता के बारे में फैसला करने लायक चुनावी प्रक्रिया के संचालन का पुनीत पवित्र कार्य पूरा किया? उच्चतम न्यायालय को सिर्फ ऐसे संगठन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जहां विवादों पर अंतिम एवं आखिरी अपील पर सुनवाई की जाती है। इसके बजाय उसे ऐसे संस्थान के रूप में दिखाई देना चाहिए जो इंसाफ देने के पुनीत कार्य का संचालन कर रहा है। 
 
(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: supreme court, high court,,
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