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बड़ी आबादी वाले 5 एशियाई देशों का लेखा-जोखा

शंकर आचार्य /  May 16, 2019

चीन ने पिछले 40 वर्षों में हरेक पैमाने पर बाकी एशियाई देशों को पीछे छोड़ दिया है। इस दौरान भारत और बांग्लादेश का प्रदर्शन भी सुधरा है। विस्तार से बता रहे हैं शंकर आचार्य

 
कभी-कभी भारत में तात्कालिक आर्थिक एवं वित्तीय मुद्दों की गहमागहमी से दूर हट जाना और देशों के दीर्घकालिक विकास प्रदर्शन पर नजर डालना शिक्षाप्रद होता है। यह लेख एशिया के सर्वाधिक जनसंख्या वाले पांच देशों के बारे में कुछ बुनियादी आंकड़ों और उससे जुड़ी टिप्पणियों को पेश करता है। ये देश हैं- चीन (139.5 करोड़), भारत (133.4 करोड़), इंडोनेशिया (26.4 करोड़), पाकिस्तान (20.1 करोड़) और बांग्लादेश (16.5 करोड़)। एक साथ इन पांचों देशों की आबादी वर्ष 2018 में दुनिया की कुल 7.46 अरब आबादी का 45 फीसदी रही। इनमें अकेले चीन और भारत का योगदान क्रमश: 18.7 फीसदी और 17.8 फीसदी है।
 
सारिणी के पहले दो कॉलम देशों की प्रति व्यक्ति जीडीपी को 1980 और 2018 के संदर्भ में दिखाते हैं। यह गौर करना दिलचस्प है कि इस पैमाने से 1980 में इंडोनेशिया सर्वाधिक समृद्ध या सबसे कम गरीब देश था और पाकिस्तान दूसरे, चीन तीसरे, भारत चौथे एवं बांग्लादेश अंतिम स्थान पर था। लेकिन 2018 में तस्वीर नाटकीय रूप से बदल चुकी थी। चीन में करीब 35 वर्षों तक अनवरत 8 फीसदी दर से प्रति व्यक्ति वास्तविक जीडीपी बढऩे से उसकी प्रति व्यक्ति आय 30 गुना बढ़कर करीब 10,000 डॉलर हो गई। यह आंकड़ा दूसरे स्थान पर मौजूद इंडोनेशिया की तुलना में ढाई गुना और आखिरी पायदान पर खड़े पाकिस्तान से छह गुना अधिक है। इस असामान्य वृद्धि का कारण यह नहीं है कि बाकी चारों देशों की वृद्धि दर स्थिर बनी रही। इस दौरान उनकी प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि भी 1980 की तुलना में चार से आठ गुना तक बढ़ी है। दरअसल चीन जैसे विशाल एवं बड़ी आबादी वाले देश की विस्फोटक वृद्धि ऐतिहासिक रूप से असाधारण एवं अभूतपूर्व रही।
 
तीसरा और चौथा कॉलम दिखाता है कि इन देशों ने 38 वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी किस तरह बढ़ाई है? वर्ष 1980 में इनकी हिस्सेदारी महज 5.8 फीसदी होती थी लेकिन 2018 में यह 21 फीसदी के सम्मानजनक स्तर पर पहुंच गया। अगर क्रय शक्ति समानता के संदर्भ में गणना करें तो यह हिस्सेदारी 30 फीसदी के खुशनुमा स्तर तक पहुंच जाएगी। लेकिन यहां फिर से चीन का ही दबदबा है जिसकी वैश्विक अर्थव्यवस्था में 16 फीसदी की हिस्सेदारी दूसरे स्थान पर मौजूद भारत की पांच गुना है। अगर चीन को सूची से बाहर कर दें तो बाकी चार एशियाई देशों की वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी 1980 के 3.1 फीसदी से मामूली बढ़त के साथ 2018 में 5.1 फीसदी तक ही पहुंच सकी। 
 
इन 38 वर्षों में से अधिकांश समय तक वैश्विक अर्थव्यवस्था और उसके सहभागी देशों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं पूंजी प्रवाह में हुए उदारीकरण से लाभ हो रहा था। सारिणी का पांचवां एवं छठा कॉलम 1980 के तीन सबसे गरीब देशों- चीन, भारत एवं बांग्लादेश की जीडीपी में वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात खंड में हुई उच्च वृद्धि को रेखांकित करता है। इंडोनेशिया और पाकिस्तान में निर्यात हिस्सेदारी गिरने की बड़ी वजह तेल निर्यात में कमी और खराब नीतियों का क्रियान्वयन रही है। इसका परिणाम यह हुआ कि चीन, भारत एवं बांग्लादेश ने वैश्विक वस्तु निर्यात में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा दी। चीन का हिस्सा 1980 के महज 1 फीसदी से बढ़कर 2017 में करीब 13 फीसदी तक पहुंच चुका था। उस समय तक चीन दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक देश बन चुका था। इसी दौरान वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 0.4 फीसदी से चार गुना बढ़कर 1.7 फीसदी हो गई लेकिन इसके बावजूद यह 2018 में चीन की हिस्सेदारी का आठवां भाग ही है।
 
सारिणी के सातवें एवं आठवें कॉलम रोजगार परिदृश्य एवं मानव विकास के संदर्भ में 1990-2018 के दौरान महिला श्रमशक्ति भागीदारी दर (एफएलएफपीआर) पर विश्व बैंक रिपोर्ट से जुटाए आंकड़े पेश करते हैं। यह संकेतक सामान्य रोजगार परिस्थितियों खासकर राष्ट्रीय श्रमशक्ति में महिलाओं पर रोशनी डालता है। वर्ष 1990 में चीन का एफएलएफपीआर 73 फीसदी के उच्च स्तर पर था जो भारत का करीब ढाई गुना था। हालांकि अगले 28 वर्षों में दोनों ही देशों का एफएलएफपीआर घटा है लेकिन आनुपातिक तौर पर चीन के पक्ष में अंतराल बढ़ गया। असल में, इस गिरावट के बावजूद चीन का एफएलएफपीआर वर्ष 2018 में इन पांचों देशों में सबसे अधिक रहा है। दुर्भाग्य से, वर्ष 2018 आते-आते भारत में एफएलएफपीआर इन देशों में सबसे कम रहा और बांग्लादेश एवं पाकिस्तान भी उससे बेहतर स्थिति में रहे। 
 
सारिणी के आखिरी तीन कॉलम संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की वार्षिक मानव विकास रिपोर्ट में प्रकाशित मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के रुझानों को इंगित करते हैं। सबसे पहले 1990 में इस सूचकांक का इस्तेमाल महबूब उल हक और अमत्र्य सेन ने किया था। नौवां और दसवां कॉलम 1990 और 2017 में हरेक देश के एचडीआई के गणित मूल्यों को दर्शाते हैं जबकि आखिरी कॉलम 2017 में हरेक देश की रैंकिंग दिखाता है।  इन सभी आंकड़ों से कई दिलचस्प तथ्य सामने आते हैं। पहला और सबसे अहम, सभी पांचों जनसंख्या-बहुल देश 27 वर्षों में उनके एचडीआई मूल्यों में खासी बढ़ोतरी को दर्शाते हैं। दूसरा, प्रतिशत बढ़ोतरी के मामले में बांग्लादेश (56 फीसदी) के साथ सबसे आगे रहा जिसके बाद चीन (50 फीसदी) और भारत (48 फीसदी) का स्थान रहा। तीसरा, 1990 में उच्च आधार मूल्य होने और अगले 27 वर्षों में तगड़ी प्रतिशत वृद्धि के चलते चीन 2017 की रैंकिंग में 86वें स्थान के साथ सबसे आगे रहा और इंडोनेशिया (116वां) एवं भारत (130वां) उसके पीछे रहे। पाकिस्तान तो 150वीं रैंकिंग के साथ इस सूची में सबसे पीछे रहा। 
 
सवाल उठता है कि इन 40 वर्षों में एशिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देशों के विकास संकेतकों के क्या निहितार्थ हैं? पहली बात यह है कि यह असल में चीन की कहानी है। प्रति व्यक्ति आय, विश्व अर्थव्यवस्था के साथ संपर्क और मानव विकास पैमानों में हुए बदलावों पर गौर करें तो चीन बाकी चारों देशों से सबसे आगे है। ऐसे में चीन का इस अवधि में एक आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभरने से कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दूसरा, भारत, इंडोनेशिया एवं बांग्लादेश ने अधिकांश पैमानों पर काफी हद तक अच्छा प्रदर्शन किया है। यह दलील देना भी संभव है कि बांग्लादेश और भारत ने अधिकतर विश्लेषकों की उम्मीदों से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है। तीसरा, यह देखकर थोड़ा आश्चर्य होता है कि पाकिस्तान अमूमन हरेक संकेतक में पिछड़ गया है और अब निचली पायदान पर है।
 
(लेखक इक्रियर में मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
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