बिजनेस स्टैंडर्ड - चुनाव और घोषणापत्र की अनूठी धुन
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चुनाव और घोषणापत्र की अनूठी धुन

रंजीता गणेशन /  May 15, 2019

संगीतकारों की मदद लेकर, दिलचस्प वीडियो तैयार कर राजनीतिक दल अपने नेताओं व घोषणापत्रों को लोगों के बीच पेश कर रहे हैं। चुनाव अभियान के लिए ऐसी अनूठी तैयारियों का जायजा लिया रंजीता गणेशन ने 

 
जब संगीतकार शक्तिकांत कार्तिक इंडियन पॉलिटिकल ऐक्शन कमेटी (आईपीएसी) से मुलाकात करने पहुंचे तब तक राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने चुनावी गीत के बोल पर पहले ही फैसला कर लिया था: 'रवाली जगत, कवाली जगन'। आईपीएसी ने कार्तिक को आंध्र प्रदेश के मशहूर नेता और वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष जगन मोहन रेड्डी के लिए चुनावी गाना तैयार करने के लिए चुना था। 'रवाली जगत, कवाली जगन' बोल का मतलब है, 'जगन आ रहे हैं, हमें जगत की जरूरत है' और इसे इसलिए चुना गया क्योंकि छोटे फोन पर भी इसकी आवाज बिल्कुल स्पष्ट होगी।
 
कार्तिक को तेलुगू फिल्मों 'हैप्पी वेडिंग' (2018) और 'फिदा' (2017) के लिए सफल संगीत देने के लिए जाना जाता है। उन्होंने इससे जुड़ी धुन पर ही गीत और संगीत तैयार किया जिससे चुनावी वादों और रेड्डी के दिवंगत पिता की यादें ताजा होती रहें। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के नेताओं के आंध्र प्रदेश में 341 दिनों की भागदौड़ के स्लो मोशन विजुअल को भी इसमें शामिल किया गया। यूट््यूब पर अब तक इसे 2.2 करोड़ बार देखा जा चुका है और इस प्रकार यह इस चुनावी सीजन के सबसे लोकप्रिय गानों में शुमार हो चुका है।
 
इसे तैयार करने में करीब सात महीने लगे और इसे करीब छह फॉर्मेट में तैयार किया गया है। इसे जनसभाओं में लाउडस्पीकरों, बाइक रैली, मोबाइल फोन के रिंगटोन और बल्क वॉयस कॉल के लिए विशेष तौर पर तैयार किया गया है। कार्तिक ने कहा, 'मैंने इस पर उसी तरीके से काम किया है जैसे मैं किसी फिल्म के लिए काम करता हूं।' एक-दो साल के बच्चों को भी उनके माता-पिता के साथ गाते हुए इसे फिल्माया गया है जो वोट नहीं दे सकते। उन्होंने कहा, 'वीडियो के वायरल होने का यह पहला संकेत है।' राजनीतिक पार्टियों को उम्मीद होती है कि उनके चुनावी वीडियो वायरल हो जाए और इसलिए वे जानेमाने संगीतकारों वाले वीडियो जारी करती हैं।
 
पिछले कुछ चुनावों के दौरान राजनीतिक पार्टियों के लिए प्रचार अभियान से संबंधित गीत-संगीत से जुड़े प्रमुख हस्तियों में गीतकार जावेद अख्तर, विज्ञापन क्षेत्र की हस्ती प्रसून जोशी एवं पीयूष पांडे, गायक शंकर महादेवन और अवधूत गुप्ते शुमार किए जाते हैं। कभी-कभी ये कलाकार राजनीतिक दलों के करीब होते हैं और मुफ्त में काम करते हैं। फिल्म उद्योग में केवल संगीत तैयार करने की लागत ही करीब 10 लाख रुपये होती है और वीडियो तैयार करने से यह रकम कहीं अधिक बढ़ सकती है। कुछ राजनीतिक दल किसी एक गाने को चुनते हैं जबकि कुछ अन्य दल पूरा एलबम तैयार कराते हैं।
 
कुल मिलाकर रोडशो केवल आयोजन होता है जबकि संगीत उसे देखने का चश्मा तैयार करता है। गाने पहले से रिकॉर्डेड या लाइव प्रदर्शन के लिए हो सकते हैं। चुनावी गानों को मूल फिल्मी गाने में हास्य-व्यंग्य को जोड़ते हुए आकर्षक तरीके से तैयार किया जाता है। आमतौर पर इन्हें लोकप्रिय गानों की तर्ज पर तैयार किए जाते हैं। यह कोई नया रुझान नहीं है। शीर्ष स्तर के राजनीतिक दल पहले भी फिल्मी जगत के दक्ष संगीतज्ञों की मदद लेते रहे हैं। इतिहासकार एस सी सरकार ने लिखा है कि आजादी के बाद 1962 के तीसरे आम चुनावों के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) ने विभिन्न संसदीय क्षेत्रों में बजाने के लिए 6,000 ग्रामोफोन रिकॉर्ड का आर्डर दिया था। 1971 में संगीत निदेशक प्रेम धवन ने बोल दिए, 'जनसंघ के दीये में तेल नहीं'। वहीं संगीतकार कल्याणजी आनंदजी ने 1989 में कहा था कि वे 'त्रिदेव' फिल्म के मशहूर गाने के बोल 'ओए ओए वा' का इस्तेमाल कांग्रेस के प्रचार गीत के तौर पर करेंगे। गीतकार समीर के पिता अंजान ने फिल्म 'डॉन' के लिए 'खइके पान बनारस वाला' गीत लिखा था जिसका इस्तेमाल तब किया गया जब 1984 में इलाहाबाद से अमिताभ बच्चन कांग्रेस की सीट से चुनाव लड़ रहे थे। वहीं कांग्रेस के अशोक चव्हाण के लिए फिल्म 'लव आजकल' के गाने 'चोर बाजारी' की एक पैरोडी तैयार की गई। 
 
1998 का चुनाव कवरेज टीवी पर खूब दिखाया गया और ऐसा कहा जाता है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने गीतकारों की एक टीम की सेवाएं ली थी जिसने विपक्षी दलों के लिए अहम राजनीतिक संदेशों को लोकप्रिय फिल्मी और पॉप गानों में मिक्स किया था। उन दिनों ऑडियो कैसेट वितरण का माध्यम हुआ करता था। समाजवादी पार्टी ने अमेरिकी गीतकार और गायक ब्रूस स्प्रिंगस्टीन के गीत 'वी डिडन्ट स्टार्ट दि फायर, इट वॉज ऑलवेज बर्निंग' को नए कलेवर में कुछ यूं पेश किया, 'मन से है मुलायम, पर इरादे लोहा हैं'। वहीं सपना अवस्थी के गाने 'मैं आई हूं यूपी बिहार लूटने' की पैरोडी भी चुनावों में खूब लोकप्रिय रही।
 
एक अच्छे गाने की वजह से आम लोगों की नेताओं और उनके घोषणापत्र को समझने में लगने वाली मेहनत आधी हो सकती है। ऐसे में ये सुरीले लेकिन सतही गाने नीति से जुड़े विचारपूर्ण चर्चा की जगह ले सकते हैं। भाजपा ने अपने एक प्रचार गीत में 'डिजिटल इंडिया', 'स्किल इंडिया', 'एलपीजी सब्सिडी', 'स्टार्टअप' जैसी योजनाओं का जिक्र करते हुए पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं से गुजारिश की है जिन्हें नरेंद्र मोदी पूरा कर चुके हैं। वहीं कांग्रेस के चुनावी थीम 'अब होगा न्याय' में 'न्याय' पार्टी की प्रमुख न्यूनतम आय गारंटी योजना का प्रतीक है और यह 'अन्याय' का विपरीत शब्द भी है। दोनों दलों ने विभिन्न भारतीय भाषाओं में गाने रिकॉर्ड किए। वहीं क्षेत्रीय स्तर के राजनीतिक प्रचार में स्थानीय संगीत का दबदबा ज्यादा दिखता है। मुंबई में एक नई पार्टी दुर्बल घटक आगाडी ने एक पोवाड़ा रिलीज किया जो महाराष्ट्र का लोकगायन है जिसमें गायक गीत और बोले गए शब्दों के बीच सक्रिय होता है। इसके साथ ही लाइव डफली का आयोजन भी होता है। 
 
वंचित बहुजन आगाडी (वीबीए) का नेतृत्व करने वाले प्रकाश आंबेडकर भी इससे जुड़ चुके हैं और ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन (एमआईएम) के साथ सहयोग कर रहे हैं। उन्होंने लाइव प्रदर्शन भी दिखाया है जो दलित-आंबेडकर आधारित बैठकों में लोकप्रिय रहा है। इसके अलावा चुनाव प्रचार में कव्वाली का इस्तेमाल भी होता है और अलताफ रजा इस शैली में माहिर हैं।  दक्षिण के राज्यों में नेताओं की शख्सियत और उनकी योजनाओं को बताने के लिए गाने अहम जरिया होते हैं। लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस ने देश भर के लिए हिंदी में गाना रिकॉर्ड कराया जिसे 1.8 लाख लोगों ने देखा। मिसाल के तौर पर इसके मलयालम गीत 'जननायक' को खासतौर पर वायनाड के चुनाव के मद्देनजर राहुल गांधी के लिए पेश किया गया जिसे 1.2 लाख लोगों ने देखा। इसके संगीतकार जेक्स बेजॉय थे जो फिल्मों के लिए संगीत निर्देशन का काम करते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने इसके लिए ऑर्केस्ट्रा का इंतजाम किया जिससे श्रोताओं में आसानी से जोश आ सकता है। 
 
इस राज्य में लोकशैली वाले संघर्षशील वामपंथी गाने की परंपरा है जिन्हें हजारों श्रमिक और किसानों गाया है। वामपंथी उम्मीदवार पी राजीव के लिए 2019 का थीम गीत 'दिल में राजीव, दिल्ली में राजीव' तैयार किया फिल्म संगीतकार बिजीबल ने। वहीं तमिलनाडु में जहां द्रमुक को परंपरागत रूप से एम करुणानिधि जैसे वक्ता के रहने का फायदा मिला वहीं अन्नाद्रमुक की निर्भरता एमजीआर की हिट फिल्मों के गाने और लाइनों पर तब बन गई जब उनकी आवाज बुलेट लगने की वजह से जाती रही। इलैयाराजा ने तमिलनाडु और केरल में कम्युनिस्ट पार्टी के गीत के लिए प्रदर्शन किया जब वह किशोर थे और अपने बड़े भाई वरदराजन की मंडली के साथ दौरा किया करते थे। दक्षिणी राज्यों में दूसरी भाषाओं में राजनीतिक गाने की तारीफ करना श्रोताओं के लिए कोई असामान्य बात नहीं है। संगीतकार कार्तिक कहते हैं, 'यहां भाषायी बाधा ज्यादा नहीं है।' कुछ लोग गाने के गलत इस्तेमाल को लेकर भी सतर्कता बरतते हैं। 
 
वर्ष 1996 में कांग्रेस पार्टी की आलोचना करने वाले और विपक्षी उम्मीदवार का पक्ष लेने वाले एक कोंकणी गाने का प्रसारण गोवा के रेडियो पर प्रसारित किया गया। इसके बाद रेडियो स्टेशन से यह ब्योरा मांगा गया कि चुनाव आचार संहिता का हनन हुआ या नहीं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने मशहूर अभिनेता आमिर खान से पीपली लाइव फिल्म के गाने 'महंगाई डायन' का इस्तेमाल उत्तर प्रदेश और बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान करने की इजाजत मांगी थी। हाल ही में बाबुल सुप्रियो ने बिना इजाजत के एक गाना, 'तृणमूल अब नहीं' रिकॉर्ड कराया था जिसे निर्वाचन आयोग द्वारा प्रतिबंध के बावजूद बजाया जा रहा था। बेजॉय कहते हैं, 'किसी प्रतिद्वंद्वी के बारे में बुरा-भला कहना बचकाना है और चुनावी जंग भी सकारात्मक तरीके से  होनी चाहिए।'
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