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बेहाल कॉर्पोरेट इंडिया की होगी बिक्री?

तमाल बंद्योपाध्याय /  May 15, 2019

कंपनी के प्रवर्तकों को फंडिंग के लिए निजी इक्विटी एवं दीर्घकालिक पूंजी लानी होगी। अगर इसमें देर होती है तो कंपनी जगत अपना आवरण गंवा सकता है। बता रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

 
पिछले हफ्ते एस्सेल समूह की कंपनियों के शेयरों में तीव्र गिरावट हुई। समूह की हिस्सेदारी बिक्री प्रकिया में देरी होने पर चिंताएं बढऩे से ऐसा हुआ। रिलायंस म्युचुअल फंड के कथित तौर पर करीब 400 करोड़ रुपये की अपनी समूची होल्डिंग बाजार में बेच देने से समूह की अग्रणी कंपनी ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ज़ीईईएल) के शेयर धराशायी हो गए। अगर इसके प्रवर्तक सितंबर तक बैंक कर्ज का भुगतान नहीं कर पाए तो कर्जदाता अपने पास गिरवी रखे शेयरों की बिक्री कर सकते हैं। हालांकि एस्सेल समूह के शेयर रखने वाले फंड हाउस तेजी से अपना धैर्य खो रहे हैं। समूह की तरफ से 7 मई को जारी बयान के मुताबिक, 'ज़ीईईएल की हिस्सा बिक्री की शुरू हुई प्रक्रिया में लगातार प्रगति है और अब यह अग्रिम चरण में है।' इसके पहले अप्रैल में समूह ने कहा था, 'कर्जदाताओं के साथ समझौते के तहत पुनर्भुगतान का संकल्प सितंबर 2019 तक हासिल कर लिया जाएगा। एस्सेल समूह को हरेक कर्जदाता का कर्ज चुकाने का भरोसा है।'
 
बी एम खेतान ग्रुप भी अपनी शीर्ष कंपनी एवरेडी इंडस्ट्रीज लिमिटेड के लिए नए मालिक की तलाश कर रहा है। बैटरी निर्माता एवरेडी के अलावा खेतान ग्रुप की चाय बागान कंपनी मैकलॉयड रसेल लिमिटेड के शेयरों पर तगड़ी चोट देखी जा रही है।  फरवरी में इमामी लिमिटेड के प्रवर्तक अग्रवाल एवं गोयनका परिवारों ने समूह की कंपनियों- इमामी सीमेंट लिमिटेड और इमामी पावर लिमिटेड के कर्ज चुकाने के लिए अपने 10 फीसदी शेयर 1,600 करोड़ रुपये में बेचे थे। लेकिन इस बिक्री से इमामी लिमिटेड में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी 72.74 फीसदी से 10 प्रतिशत अंक कम हो गई। अपने कर्ज का बोझ कम होने से लेनदारों के पास रखे होल्डिंग कंपनी के शेयर छुड़वाने की समूह की क्षमता बढ़ेगी। 
 
गौरतलब है कि इमामी के प्रवर्तकों ने पूंजी की अधिक जरूरत वाली सीमेंट एवं बिजली परियोजनाओं को फंड मुहैया कराने के लिए धन जुटाने के वास्ते अपनी 47 फीसदी हिस्सेदारी गिरवी रखी थी। तीसरी तिमाही के आंकड़े आने के बाद प्रवर्तकों ने अपने निवेशकों से कहा था कि समूह गिरवी शेयरों को कम करते हुए 30-35 फीसदी पर लाना चाहेगा। ये घटनाएं भारतीय कंपनी जगत की एक नई बीमारी की ओर इशारा करती हैं जो कारोबार के नियम हमेशा के लिए बदल सकती हैं। कई कारोबारी समूह देनदारी के चलते भारी दबाव में हैं और बैंकों के पास गिरवी रखे हुए अपने शेयर बेचने या वापस लेने के तरीके तलाश रहे हैं। बीएसई के आंकड़े देखें तो अप्रैल के अंत में प्रवर्तकों ने करीब 2.25 लाख करोड़ रुपये के शेयर गिरवी रखे थे। बीएसई में सूचीबद्ध 5,126 कंपनियों में से 2,932 कंपनियों के प्रवर्तकों ने अकेली मार्च तिमाही में अपने शेयर गिरवी रखकर पैसे जुटाए हैं और 125 कंपनियों के प्रवर्तकों ने गिरवी रखे हुए शेयरों की मात्रा बढ़ाई है।
 
साफ है कि किसी कंपनी की लाभ कमाने की क्षमता का पैमाना माने जाने वाला ब्याज, कर, मूल्यह्रास और ऋण-परिशोधन पूर्व आय (एबिटा) और कर्ज के अनुपात पर हमें नए सिरे से गौर करने की जरूरत है क्योंकि यह किसी कंपनी की असली सेहत नहीं दिखाता है। परिचालक कंपनी के ऋण के अलावा हमें होल्डिंग कंपनी के ऋण पर भी ध्यान रखने की जरूरत है। सरल शब्दों में, यह किसी अर्थव्यवस्था की ताकत के आकलन के लिए केंद्र के साथ राज्यों के राजकोषीय घाटे पर भी नजर डालने की तरह है।
 
प्रवर्तक अपनी परिचालक कंपनियों में पैसे लगाने, कारोबार विस्तार या किसी अन्य मकसद के लिए होल्डिंग कंपनी के शेयर गिरवी रखकर कर्ज लेते हैं और शायद ही कभी वे उन शेयरों को वापस लेने के लिए उस कर्ज का निपटारा करते हैं। सेंसेक्स स्टॉक का औसत प्रतिफल करीब 1.5 फीसदी है और सूचीबद्ध कंपनियों का शेयर प्रतिफल करीब 0.5 फीसदी है। वे अपने कर्ज का निपटारा कैसे करेंगे? इसके अलावा कर्जदाता हमेशा पुराने कर्ज पर नया कर्ज देने को तैयार रहते हैं। इस तरह के गिरवी रखे शेयरों का कम-से-कम 60 फीसदी हिस्सा गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (एनबीएफसी) और म्युचुअल फंड के पास है। बैंकों को शेयर गिरवी रखकर कंपनियों को फंड देने की इजाजत नहीं है लेकिन वे कर्ज पुनर्भुगतान सुनिश्चित करने के लिए जमानत के तौर पर ऐसे शेयर मांग सकते हैं। वास्तव में, निजी स्तर पर शेयर गिरवी रखकर पैसे जुटाए जा सकते हैं। बीमा कंपनियां और पेंशन फंड गिरवी रखे हुए शेयरों के एवज में फंड नहीं देते हैं।
 
फंड की कमी से बेहाल एनबीएफसी को पैसों की दरकार है और डेट म्युचुअल फंड भी प्रतिदान के दबाव में हैं। उनके निवेशक कर्ज लेने वाली कुछ कंपनियों के प्रवर्तकों की वित्तीय हालत को लेकर फिक्रमंद हैं। अमूमन ऐसे कर्ज तगड़े मार्जिन पर दिए जाते हैं (100 रुपये के कर्ज के लिए प्रवर्तक को 150 या 200 रुपये के शेयर गिरवी रखने पड़ सकते हैं)। जब इन शेयरों के भाव गिर जाते हैं तो प्रवर्तकों को मार्जिन बरकरार रखने के लिए और शेयर देने पड़ते हैं। ऐसा नहीं करने पर कर्जदाता एनबीएफसी एवं एमएफ पहले से रखे हुए शेयरों को बेचकर अपना बकाया वसूल लेते हैं। इस दौरान  कंपनी में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी घट जाती है जिससे शेयरों के भाव पर दबाव पड़ता है। भाव गिरते ही और शेयर बेचे जाते हैं जिससे एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है।
 
भले ही शेयरों की बिक्री कर्जदाता कर रहे हैं या खुद प्रवर्तक ऐसा कर रहे हैं, लेकिन हिस्सेदारी में आई कमी और स्वामित्व गंवाने का भय कई प्रवर्तकों को खूब सता रहा है। यह भारतीय कंपनी जगत की समस्या है। एनबीएफसी और म्युचुअल फंड का क्या है? कई लोगों का मानना है कि फंड हाउसों को शेयरों के एवज में प्रवर्तकों को पैसे देने का कोई मतलब नहीं है और बाजार नियामक को इस पर रोक लगानी चाहिए। इसी तरह बैंकिंग नियामक को प्रवर्तकों को गिरवी रखे हुए शेयरों के एवज में फंड देने से रोकना चाहिए।
 
यह पैसे जुटाने का एक वैध तरीका है और गिरवी रखे शेयरों के एवज में पैसे देने में कोई बुराई नहीं है क्योंकि शेयर भी किसी फैक्टरी, सोना या रियल एस्टेट की तरह एक परिसंपत्ति समूह है। वैश्विक स्तर पर निजी इक्विटी फंड इस श्रेणी में बड़ी भूमिका निभाते हैं लेकिन भारतीय बाजार में वे मौजूद नहीं हैं। जहां प्रवर्तकों को असंबद्ध विविधीकरण या फंड प्रत्यावर्तन रोकना चाहिए वहीं एनबीएफसी और एमएफ को इस श्रेणी पर नए सिरे से गौर करने की जरूरत है। मसलन, जब कोई निवेशक एक डेट फंड भुनाता है तो टी प्लस 1 ट्रेडिंग सिस्टम के चलते पैसा अगले दिन दिया जाता है। अगर एमएफ ऐसे एक्सपोजर के क्लोज-एंडेड वैकल्पिक निवेश फंड (एआईएफ) का हिस्सा होने का तरीका निकाल लेते हैं तो प्रतिदान दबाव से बचा जा सकता है। करीब 23 लाख करोड़ रुपये आकार के भारतीय म्युचुअल फंड बाजार का 10 फीसदी से भी कम हिस्सा एआईएफ का है। हमें गिरवी शेयरों के एवज में प्रवर्तकों को फंडिंग में निजी इक्विटी एवं दीर्घकालिक पूंजी लाने की जरूरत है। अगर इसमें अधिक देर होती है तो भारतीय कंपनी जगत अपना आवरण गंवा सकता है।
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं) 
Keyword: corporate india, funding, equity,,
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