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बुरा विचार

संपादकीय /  May 15, 2019

कंपनी मामलों के केंद्रीय सचिव के हवाले से कहा जा रहा है कि चुनाव के बाद जब देश में नई सरकार बन जाएगी तो ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) में संशोधन करके इसे छोटे कर्जदारों के लिए आसान बनाया जा सकता है। जो कर्जदार एक वर्ष में 60,000 रुपये से कम कमाते हैं, जिनके पास 20,000 रुपये से कम की परिसंपत्तियां हैं और जिनका बकाया कर्ज 35,000 रुपये से कम है उन्हें खुद सचिव के शब्दों में एक किस्म की कर्जमाफी दी जा सकती है। यह कर्जमाफी किसानों, दस्तकारों और कारीगरों, छोटे उद्यमियों तथा अन्य लोगों को दी जा सकती है। यह नई योजना भी उन तमाम माफी योजनाओं में शामिल हो जाती है जिनका वादा विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव के दौरान करते आए हैं। परंतु यह योजना पहले की गई माफी की तमाम पेशकश पर भारी पड़ सकती है। 

 
दिवालिया के व्यक्तिगत मामलों की बात करें तो छोटे कर्जदारों की दिक्कत दूर करने में कोई समस्या नहीं है। छोटी उधारी वाले लोगों की बात करें तो उन्हें बड़े कारोबारी घरानों की तरह कठिन दिवालिया प्रक्रिया से नहीं गुजारा जाना चाहिए। अधिकारी का यह कहना भी एकदम सही है कि ऐसे छोटे-छोटे मामले आईबीसी की व्यवस्था को जाम कर सकते हैं। ऐसे में बड़े और कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण मामलों का निस्तारण बाधित हो सकता है। इन तमाम दिक्कतों को दूर करना आवश्यक है। शायद कम आय स्तर वाले व्यक्तिगत मामलों की दिवालिया प्रक्रिया के लिए अधिक सुसंगत तरीका अपनाना होगा। हालांकि कंपनी मामलों के सचिव ने जिसे सार्वभौमिक ऋण राहत योजना का नाम दिया है वह काफी खतरनाक है। इससे वित्तीय समावेशन का पूरा आधार ही प्रभावित होगा। वित्तीय समावेशन का लक्ष्य है लोगों को उद्यमिता और व्यय के लिए अधिक से अधिक ऋण लेने के लिए प्रोत्साहित करना। बैंकों के लिए प्रोत्साहन समाप्त हो जाएगा। अधिकारी ने यह भी दावा किया कि इसकी लागत बमुश्किल 20,000 करोड़ रुपये आएगी लेकिन यह मानने की कोई वजह नहीं है कि यह राशि बढ़ेगी नहीं। ऐसे में यह सवाल पूछना उचित है कि जिन व्यक्तियों को अपने ऋण संबंधी अतीत की महत्ता का भी ठीक-ठीक ज्ञान नहीं है उनके इस ऋण इतिहास की उपयोगिता ही क्या है? अगर बकाया ऋण 35,000 रुपये से कम है तो कर्जदार को यह प्रोत्साहन मिल सकता है कि वह अपनी अतिरिक्त संपत्ति को अवैध एग्रीगेटर्स को बेच सकता है। नोटबंदी का अनुभव हमें यह बता चुका है कि बैंकों के पास ऐसे समांतर लेनदेन को रोकने का कोई ठोस तरीका नहीं है। 
 
यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि सार्वभौमिक ऋण राहत कार्यक्रम की अभी क्या आवश्यकता आ पड़ी? क्या सरकार को मुद्रा अल्प ऋण योजना के बारे में कोई ऐसी बात पता है जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों में सामने नहीं आ रही। पिछले कुछ समय में इस श्रेणी में फंसे हुए कर्ज में इजाफा हुआ है। भविष्य में हालात और बुरे हो सकते हैं। इसमें दो राय नहीं कि छोटे कर्जदारों के लिए दिवालिया घोषित करने का बेहतर ढांचागत तरीका होना चाहिए। एक ऐसा वित्तीय तंत्र बनाने की आवश्यकता है जो ऐसे कर्जदारों तक प्रभावी तरीके से पहुंचे। इसके लिए पुनर्भुगतान का मजबूत तरीका सुनिश्चित करना होगा। ऐसी योजना में यह जोखिम भी है कि यह ऋण संबंधी अनुशासन और ऋण संस्कृति को भंग कर दे और सूक्ष्म वित्त संस्थानों के लिए संकट खड़ा करे। इससे ऋण का एक अहम स्रोत ठप हो सकता है जबकि वह कर्ज देने वाले महाजनों से कहीं बेहतर है। इसमें दो राय नहीं कि गरीबों में काफी निराशा है लेकिन एक सार्वभौमिक ऋण माफी योजना समस्या को हल नहीं करेगी। प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण योजना इसी काम को बेहतर ढंग से कर सकती है। 
Keyword: IBC, code, IBBI, NCLT, RBI,,
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