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पूंजी, श्रम व भूमि सुधार हो एजेंडा

अरुप रॉयचौधरी और इंदिवजल धस्माना /  05 15, 2019

बीएस बातचीत

वित्त वर्ष 2018-19 की आर्थिक समीक्षा बनाने में व्यस्त मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन के मुताबिक 2019-20 में देश की आर्थिक विकास दर 7 फीसदी के आसपास रह सकती है। अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर अरुप रॉयचौधरी और इंदिवजल धस्माना से उनकी बातचीत के संपादित अंश: 

खपत, ग्रामीण मजदूरी और निजी निवेश में सुस्ती के बारे में काफी चर्चा हो रही है। इस पर आपका क्या कहना है?

बिजनेस स्टैंडर्ड पूंजी, श्रम व भूमि सुधार हो एजेंडायह समझना जरूरी है कि इस सुस्ती की वजह क्या है। पिछले साल तक निजी निवेश में उल्लेखनीय कमी के दो कारण थे। क्षमता निर्माण और दोहरे बैलेंस शीट के कारण अत्यधिक ऋण बोझ। यह स्थिति छह-सात साल के दौरान बनी। इससे बाहर निकलने में समय लग गया। जब कंपनियां ऐसा कर रही थीं तो उस दौरान ज्यादा निवेश नहीं हो सकता था। हमारी जैसी जटिल अर्थव्यवस्था में इसका असर लंबे समय तक रहता है। मौजूदा स्थिति उसी का नतीजा है, जिसे हमें स्वीकार करना होगा। हम कह सकते हैं कि काफी हद तक हम इस स्थिति से उबर चुके हैं। खासकर अगर आप क्षमता के इस्तेमाल को देखें तो कुछ क्षेत्रों में यह 74-76 फीसदी के करीब पहुंच चुका है। दिवालिया संहिता के कारण अहम बदलाव आया है। इसने निवेश के तरीके को बदलकर रख दिया है। आप कह सकते हैं कि अहम ढांचागत सुधार हुए हैं। अर्थव्यवस्था में इसका लाभ दिखने में समय लग सकता है। मैं इस बारे में आशावादी हूं।

आपने निवेश की बात की। आप ग्रामीण मजदूरी और खपत में कमी की क्या वजह मानते हैं?

अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों का योग होती है और इसका संपूर्ण हिस्सों के योग से अलग होता है। जब मैं तीन-चार हिस्सों की बात करता हूं तो मैं थोड़ा सतर्क रहता हूं। मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूं कि अर्थव्यवस्था में भाई-भतीजावाद को कम करने के लिए अहम कदम उठाए गए हैं। हमें इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि भाई-भतीजावाद से अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। मैं लंबे समय को देखता हूं। निवेश कम होने का असर हुआ है। मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूं कि हम इस दौर से बाहर निकल आएंगे। 

यह सुस्ती कितनी तिमाहियों तक रहेगी?

मेरा अब भी मानना है कि इस साल आर्थिक विकास दर सात फीसदी रहने का अनुमान है। लेकिन आपकी बातों से लगता है कि मेरा अनुमान बहुत ज्यादा है। ढांचागत सुधारों का असर दिखने के बाद अर्थव्यवस्था की स्थिति बेहतर होगी। मुझे उम्मीद है कि चीजें बेहतर होंगी। दुनियाभर में जहां भी चुनाव होते हैं, इससे अनिश्चितता आती है और लोग देखो और इंतजार करो की मुद्रा में चले जाते हैं। इस अनिश्चितता के दूर होने के बाद गतिविधियां जोर पकड़ती हैं। 

अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए सरकार क्या कदम उठा सकती है?

सरकार को पूंजी, भूमि और श्रम सुधारों पर काम करना चाहिए। हमें अर्थव्यवस्था को दीर्घावधि में प्रतिस्पद्र्घी बनाने की जरूरत है और इस संदर्भ में इन तीन क्षेत्रों में सुधार अहम हैं। पूंजी की वास्तविक लागत अधिक है जिसे कम करने की जरूरत है। मेरा जोर क्रेडिट के फैलाव पर होगा। हमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भूमि अधिग्रहण की लागत कम करने की दिशा में काम करना होगा।

एनबीएफसी क्षेत्र में जोकुछ हुआ, उसे देखते हुए क्या हम नकदी संकट की ओर जा रहे हैं?

बाजार के कई भागीदार जिसे नकदी कहते हैं वह वास्तव में कर्ज निपटान से संबंधित है। हमारे पास ऐसी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां हैं जिनके पास दीर्घावधि परिसंपत्तियां हैं और उनकी देनदारियां अल्पावधि की हैं जिसके भुगतान को वे आगे बढ़ाती हैं। अगर आपके पास इस तरह परिसंपत्ति-देनदारी में बेमेल की स्थिति हो तो कोई समस्या नहीं है। जब भी स्थिति मुश्किल होती है, देनदारी को आगे बढ़ाना मुश्किल हो जाता है। यह जरूरी है कि इस बेमेल स्थिति पर नजर रखी जाए ताकि नकदी की निगरानी हो सके।

जीडीपी के आंकड़ों पर फिर सवाल उठाए गए हैं क्योंकि सरकार की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि एमसीए 21 में शामिल कंपनियों के आंकड़ों का पता नहीं लगाया जा सकता है?

रोजगार और जीडीपी के आंकड़ों पर मैं कुछ कहना चाहता हूं। मुझे लगता है कि भारत जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सच्चाई से अलग एक बहस आगे बढ़ाना बहुत मुश्किल है। एनएसएसओ ने सेवा क्षेत्र के लिए सर्वेक्षण किया है। विभाग ने एमसीए 21 से नमूने लिए और फिर उनकी पड़ताल की। यह सेवाओं का सर्वेक्षण है, अर्थव्यवस्था का नहीं। ऐसी कंपनियां हो सकती हैं जो सेवाएं नहीं दे रही हैं लेकिन निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। इसलिए हमें इस तरह की तुलना में सावधानी बरतनी होगी।  रोजगार के आंकड़ों में भी यह कहना गलत है कि बेरोजगारी कई दशकों के शीर्ष पर है। हमारे यहां बेरोजगारी का सर्वेक्षण होता है और समय-समय पर श्रम बल का भी सर्वेक्षण होता है। बेरोजगारी सर्वेक्षण में नमूने  पारिवारिक खर्च पर आधारित होते हैं जबकि श्रम बल में ये सर्वेक्षण शिक्षा के स्तर पर आधारित है। 75 फीसदी परिवारों में कम से कम एक सदस्य ने दसवीं पास किया है। अगर किसी ने दसवीं पास किया है तो वह दिहाड़ी मजदूर का काम नहीं करेगा। अगर आप जनगणना को देखें तो आप पाएंगे कि जिन परिवारों में किसी एक सदस्य ने दसवीं पास किया है वहां बेरोजगारी की दर ज्यादा है। लेकिन इसका अर्थव्यवस्था की बुनियादी बातों से कोई लेनादेना नहीं है। यह केवल नमूने की बात है। 

Keyword: india, economy, GDP,,
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