बिजनेस स्टैंडर्ड - खपत में इजाफे का उठाना होगा फायदा
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खपत में इजाफे का उठाना होगा फायदा

आकाश प्रकाश /  May 14, 2019

देश के व्यय में आ रही तेजी का फायदा उठाने के लिए हमें यह समझना होगा कि किन वस्तुओं की मांग में किस समय इजाफा होगा। विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं आकाश प्रकाश

 
चीन की अर्थव्यवस्था में ढांचागत धीमापन आ रहा है। ऐसे में कई निवेशक वैश्विक खपत के अगले वाहक की तलाश में हैं। माना जा रहा है कि भारत इसका फायदा उठा सकता है। 130 करोड़ की आबादी और 30 वर्ष की औसत आयु के साथ यह दुनिया की सबसे तेज विकसित होती अर्थव्यवस्था वाला देश है। हाल ही में मैंने वित्तीय विश्लेषकों और सलाहकारों की ऐसी कई रिपोर्ट देखीं जो भारत की खपत संभावनाओं को रेखांकित करती हैं। उन सभी ने खपत में तेजी के उस ढांचे का प्रयोग किया है जो सलाहकार समुदाय को रास आता है। इसकी सहायता से उभरते बाजारों में आर्थिक विकास के विभिन्न चरणों में खपत के रुझान का सही आकलन किया जाता है। 
 
मूल ढांचा चुनिंदा वस्तुओं और सेवाओं की मांग की अवधारणा प्रस्तुत करता है जो आय में वृद्घि के साथ विसंगतिपूर्ण ढंग से विकसित होते हैं और मांग में बदलाव का ढांचा तैयार करते हैं। आम परिवारों में चुनिंदा वस्तुओं और सेवाओं पर किया जाने वाला व्यय सहजता से नहीं बढ़ता है, हालांकि आय में स्थिर वृद्घि देखने को मिलती है। व्यय में वृद्घि आती दिखती है लेकिन यह अलग-अलग आय वर्ग में अलहदा उत्पादों के लिए होती है। हालिया गवेकल रिपोर्ट से लिए उदाहरण के मुताबिक अगर किसी अर्थव्यवस्था में आय का वितरण एकदम सामान्य है और अर्थव्यवस्था की औसत आय 25 फीसदी बढ़ती है तो वह 10,000 डॉलर से बढ़कर 12,500 डॉलर हो जाएगी। 15,000 डॉलर से अधिक आय वाली आबादी का प्रतिशत 25 फीसदी नहीं बढ़ेगा। यह सात गुना बढ़कर 2.3 फीसदी से 15.9 फीसदी हो जाएगा। स्वाभाविक सी बात है कि खपत उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ेगी और यह वृद्घि दर 25 फीसदी की शीर्ष वृद्घि दर से अधिक होगी। मैंने जो रिपोर्ट देखीं उन सभी ने भारत के लिए खपत व्यय की इसी अवधारणा पर काम किया।
 
इसके लिए सबसे पहले हमें देश के आय वितरण कर्व को समझना होगा। देश में आय का वितरण किताबों में वर्णित वितरण की तरह सामान्य नहीं है। हालांकि वास्तविक वितरण को लेकर बहुत सीमित जानकारी है। 2018 में हमारी प्रति व्यक्ति जीडीपी 2,000 डॉलर थी लेकिन दोतिहाई आबादी इसके आधे से भी कम कमाती थी। यही कारण है कि देश में आय का वितरण बहुत लंबा है। अधिकांश विश्लेषक खपत के आंकड़े नमूना सर्वेक्षणों से लेते हैं और इसी पर अपनी अवधारणा बना लेते हैं। इसी आधार पर अर्थव्यवस्था की आय वृद्घि का आंकड़ा पेश किया जाता है। वृद्घि का अनुमान भी बड़ा अंतर पैदा करता है। अधिकांश रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले पांच वर्ष के दौरान भारत 7.5 फीसदी से 8 फीसदी की दर से विकसित होगा। उसके बाद वह 7 फीसदी तक धीमा होगा। 
 
शहरी आय ग्रामीण आय से बहुत अधिक है। इसे ध्यान में रखना होगा। तेज शहरीकरण खपत बढ़ाने वाला साबित होता है। चुनिंदा वस्तुओं और सेवाओं की मांग को समझने के लिए हमें एक तय आय सीमा की जानकारी होनी चाहिए। यानी खपत में तेजी किस स्तर पर आती है। एक बार इसका निर्धारण होने के बाद पता लगाया जा सकता है कि कई परिवार नए आय वर्ग में शामिल हो रहे हैं। इसका असर खपत पर पडऩा तय है।  सबसे स्पष्ट वर्गीकरण मुझे गवेकल रिपोर्ट में देखने को मिला। वहां तीन श्रेणियां हैं। पहली श्रेणी में उभरते ग्राहक हैं जिनका आय वर्ग दो लाख से पांच लाख रुपये है। यह 2016 की कीमतों पर आधारित है। यह श्रेणी सस्ते स्मार्ट फोन और दोपहिया खरीदता है। दूसरी श्रेणी में उभरते ग्राहक होते हैं जिनकी आय 5 लाख रुपये से 12 लाख रुपये के बीच है। वे सस्ती कार खरीदते हैं और विदेशों में छुट्टियां मनाना शुरू करते हैं। आखिरी श्रेणी उन प्रभावशाली उपभोक्ताओं की है जिनकी आय 12 लाख रुपये से अधिक है। वे डिजाइनर ब्रांड खरीदते हैं। इन वर्गीकरण से कुछ निष्कर्ष एकदम स्पष्ट हैं। देश के आधे से भी कम परिवार अभी आधुनिक खपत वाली अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। गवेकल श्रेणियों के अनुसार आज देश में 7.1 करोड़ परिवार उभरते ग्राहक की श्रेणी में, 3.3 करोड़ ग्राहक उभरते ग्राहक और 1.8 करोड़ ग्राहक प्रभावशाली ग्राहकों की श्रेणी में आते हैं, यानी कुल आबादी के आधे से भी कम। 
 
अगर मान लें कि 2025 तक जीडीपी 8 फीसदी की दर से विकसित होगी और 2030 तक यह घटकर 7 फीसदी हो जाएगी तो शहरीकरण के मौजूदा रुझान के अनुरूप अगले एक दशक में आंकड़ों में तेजी से बदलाव आएगा। शुरुआती ग्राहक 14 करोड़ हो जाएंगे, उभरते ग्राहक 10 करोड़ और प्रभावशाली ग्राहक 7.2 करोड़ हो जाएंगे। आधुनिक उपभोक्ता अर्थव्यवस्था में शामिल परिवारों की संख्या 12 करोड़ से बढ़कर 31 करोड़ हो जाएगी। यह इतना अहम है कि 10 वर्ष में अगर वृद्घि दर महज दो फीसदी कम रहे तो इससे करीब 6 करोड़ परिवार पिछड़ जाएंगे। 
 
बढ़ती खपत के वास्तविक प्रभाव के वास्तविक असर को समझने के लिए हमें केवल इन श्रेणियों में शामिल परिवारों की वास्तविक संख्या को नहीं देखना चाहिए बल्कि हर श्रेणी में नीचे से शामिल होने वाली सकल वृद्घि पर भी ध्यान देना होगा। इस दृष्टि से देखें तो गत दशक उभरते ग्राहकों का दशक था। गवेकल आंकड़ों के अनुसार 2009 में करीब 25 लाख नए परिवार इस श्रेणी में आए। 2019 में करीब 1.2 करोड़ नए परिवार इस श्रेणी में शामिल होंगे। 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर 1.5 करोड़ हो जाएगा। जैसे-जैसे देश धनाढ्य होगा, प्रभावी उपभोक्ताओं की संख्या अधिक हो जाएगी। 2019 में 40 लाख की जगह 2025 तक प्रभावी उपभोक्ताओं की तादाद में एक करोड़ सालाना की वृद्घि होगी। 2030 तक यह संख्या 1.3 करोड़ वार्षिक हो जाएगी। इसके कुछ रोचक निहितार्थ देखने को मिलेंगे। 
 
बीते दशक के दौरान हमें उन श्रेणियों के व्यय में इजाफा देखने को मिला जो उभरते उपभोक्ता समूह से हैं। मसलन दोपहिया वाहनों की संख्या 70 लाख से बढ़कर 2.1 करोड़ हो गई। आधारभूत उपभोक्ता वस्तुओं की मांग भी बढ़ी। आने वाले दशक में जब उभरता उपभोक्ता वर्ग प्रमुखता पाएगा तब विभिन्न श्रेणियों को लाभ मिलेगा। उदाहरण के लिए कारों की बिक्री पिछले एक दशक में हर वर्ष 12 लाख से बढ़कर 22 लाख तक पहुंची। जबकि 2025 तक हर वर्ष एक करोड़ नए संभावित ग्राहक इस श्रेणी में शामिल होंगे। ब्रांडेड कपड़ों और विदेश यात्रा की श्रेणी में भी तेजी आएगी। 
 
चीन तथा अन्य उभरते बाजारों के तर्ज पर भारत अपनी ही खपत में तेजी के दम पर विकास करेगा। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि यह तेजी कैसी होगी और किन वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ेगी। गवेकल रिपोर्ट तथा ऐसे ही अन्य विश्लेषण इसे समझने में मददगार हो सकते हैं। 
Keyword: india, economy, GDP, china,,
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