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नया शीतयुद्घ?

संपादकीय /  May 14, 2019

अमेरिका और चीन के बीच चल रही व्यापारिक जंग एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। पहले तो समझौते की कुछ उम्मीद भी जताई जा रही थी लेकिन इस बार तो वह भी तेजी से नदारद हो रही है।  एक समझौते के करीब पहुंचने के बाद अमेरिका ने चीन पर आरोप लगाया कि वह संभावित समझौते के व्यापक भाग से मुकर रहा है। परिणामस्वरूप अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने चीन से आयात होने वाली वस्तुओं पर शुल्क दर बढ़ाने की धमकी दी। चीन ने भी प्रतिरोध किया और कहा कि वह अमेरिका से चीन को होने वाले करीब 600 करोड़ डॉलर के निर्यात पर शुल्क दरें बढ़ाएगा। इन वस्तुओं में शराब, वस्त्र और तरल प्राकृतिक गैस शामिल हैं। ट्रंप प्रशासन ने पहले ही चीन से अमेरिका को होने वाले 20,000 करोड़ डॉलर मूल्य के निर्यात पर शुल्क दर बढ़ाकर 25 फीसदी कर दी है। 

 
कुल मिलाकर तमाम वस्तुओं की कीमतें बढऩे वाली हैं। इस व्यापार युद्घ की कीमत दोनों देशों के उपभोक्ताओं और कंपनियों को चुकानी होगी। अमेरिकी उपभोक्ताओं को बुनियादी चीजों के लिए अधिक कीमत चुकानी होगी जबकि प्रमुख वस्तुओं मसलन सोयाबीन आदि के अमेरिकी उत्पादकों के लिए मामला अहम है क्योंकि यह उत्पादन राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्यों में होता है। ये राज्य ट्रंप के दोबारा निर्वाचन की दृष्टि से अहम हैं। यानी चीन का प्रतिरोध ट्रंप के दोबारा निर्वाचन को प्रभावित कर सकता है। 
 
चीन में उत्पादन कर रही अमेरिकी कंपनियों को भी नुकसान पहुंचेगा और इसका असर चीनी स्वामित्व वाले उनके ठेकेदारों पर भी पड़ेगा। ये दोनों अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे से बहुत हद तक जुड़ी हुई हैं। इन हालात के बीच चकित करने वाली बात यह है क्या कारोबारी जंग किसी भी पक्ष के लिए राजनीतिक समझदारी वाली है भी या नहीं? अमेरिकी प्रशासन के लिए यह बात मायने रखती है। ऐसे में संदेह ही है कि ऐसा पूरी ताकत के साथ जारी रहेगा भी या नहीं।  हालांकि यह मानने की पूरी वजह है कि ट्रंप इस जंग को पुरजोर तरीके से जारी रखना चाहते हैं। इसकी अनुगूंज उनके चुनाव प्रचार में भी बार-बार सुनने को मिलती थी बल्कि राजनीति में आने के पहले भी वह यह बात दोहराते रहते थे। चीन के राष्ट्रपति पर भी अपने घर में इस बात का दबाव होगा कि वह पीछे हटते हुए नहीं नजर आएं। इन हालात में दोनों ही देश कुछ आर्थिक जोखिम बरदाश्त करेंगे।
 
लगता नहीं कि अब यह विवाद केवल कारोबारी क्षेत्र तक सीमित रहेगा। इस आर्थिक बोझ से अपने-अपने देश की जनता को अवगत कराने के क्रम में दोनों नेताओं को सामरिक प्रतिद्वंद्विता की भावना बढ़ानी होगी। अगर मामला व्यापक राष्ट्रीय हित का हो तो थोड़ा बहुत कष्ट तो राजनीतिक दृष्टि से बरदाश्त किया जा सकता है। ऐसे में वास्तविक चिंता अन्य क्षेत्रों में होनी चाहिए। खासतौर पर समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच का विवाद अब बढ़ सकता है।  उम्मीद की जानी चाहिए कि विभिन्न देशों से अपनी पक्षधरता तय करने को नहीं कहा जाएगा। फिर भी संभव है कि सामरिक स्वायत्तता को अपना मंत्र मानने वाले भारत को भविष्य में कहीं अधिक जटिल अंतरराष्ट्रीय हालात का सामना करना पड़े। इसके लाभ भी हो सकते हैं। चीन भारतीय निर्यात के लिए अपने बाजार कहीं अधिक तेजी से खोल सकता है, ताकि अमेरिका चीन की कारोबारी नीतियों से असहमत देशों के साथ गठजोड़ न बना सके। परंतु दक्षिण चीन सागर और यूरेशिया का विवाद अधिक स्पष्ट हो सकता है। एक नया शीतयुद्घ आकार ले रहा है। 
Keyword: america, china, india,,
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