बिजनेस स्टैंडर्ड - कताई मिलों में जान डाल रहा फाइबर
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कताई मिलों में जान डाल रहा फाइबर

दिलीप कुमार झा / मुंबई May 13, 2019

कताई मिलों ने अपनी कपड़ा लागत को कपास की बढ़ती कीमतों के प्रभाव से बचाने और कारोबार को लाभदायक बनाने के लिए मानव निर्मित फाइबर का उपयोग करना शुरू कर दिया है। इससे सिंथेटिक कपड़ा भागीदारों को काफी मदद मिल रही है। उद्योग के सूत्रों का अनुमान है कि पिछले कुछ महीनों से कपड़ा उत्पादन में मानव निर्मित फाइबर का उपयोग बढ़कर 45 प्रतिशत हो गया है जो पहले 40 प्रतिशत था। इस प्रकार कपड़ा मिश्रण में कपास का उपयोग 60 प्रतिशत से घटकर 55 प्रतिशत हो गया। इस बदलाव के बावजूद भारत कपड़ा मिश्रण के वैश्विक औसत से काफी पीछे है जहां 70 प्रतिशत मानव निर्मित फाइबर को 30 प्रतिशत प्राकृतिक फाइबर के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है।
 
कपास के दाम उछलकर 13,200 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर पहुंच चुके हैं जो एक महीने पहले लगभग 11,800 रुपये प्रति क्विंटल थे। मानव निर्मित फाइबर तुलनात्मक रूप से 30-40 प्रतिशत सस्ता है। इस बदलाव की वजह से भारत धीरे-धीरे मानव निर्मित और प्राकृतिक फाइबर के मिश्रण की वैश्विक राह पर बढ़ रहा है। इस परिवर्तन से भारत को विशेष रूप से खेल क्षेत्र के कपड़ा निर्यात में बढ़ावा मिलने वाला है जहां देश लगभग अनुपस्थित रहा है और वियतनाम जैसे छोटे देश वैश्विक बाजार में बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर रहे हैं।
 
फिलाटेक्स इंडिया के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक मधुसूदन भगेरिया ने कहा कि कैजुअल और स्पोट्र्स वियर की मांग बढऩे के कारण उपभोक्ताओं की प्राथमिकता कपास से हटकर पॉलिएस्टर जैसे मानव निर्मित फाइबर की ओर बढ़ रही है। देश में कपास की खेती का घटता रकबा भी इसमें योगदान दे रहा है। सिंथेटिक कपड़ा उद्योग के भागीदारों द्वारा किया गया हालिया क्षमता विस्तार घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों ही बाजारों से पॉलिएस्टर की मांग वृद्धि का सबसे बड़ा सबूत है। सेंचुरी टेक्सटाइल ऐंड इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष आरके डालमिया की भी यही प्रतिक्रिया है। वह कहते हैं कि अनुकूल उष्णकटिबंधीय मौसम के कारण भारत कपास की खेती करने वाला देश है। इसलिए शेष विश्व की तुलना में भारत में कपास का उपयोग अधिक होता है। अब सिंथेटिक वस्त्रों की मांग उन उपभोक्ताओं से आ रही है जो मिलों को मानव निर्मित फाइबर मिश्रित उत्पादों के अधिक उत्पादन के लिए प्रेरित करते हैं।
 
उद्योग की शीर्ष संस्था भारतीय कपास संघ (सीएआई) ने 2018-19 (अक्टूबर-सितंबर) के लिए इस साल चौथी बार कपास उत्पादन का पूर्वानुमान संशोधित कर 14 प्रतिशत घटाकर 3.15 करोड़ गांठ (प्रति गांठ 170 किलोग्राम) कर दिया है जबकि पिछले साल उत्पादन 3.65 करोड़ गांठ दर्ज किया गया था। इसने भारत में कपास की उपलब्धता कम कर दी है।  सीएआई के अध्यक्ष अतुल गनात्रा ने कहा कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में पानी की कमी तथा किसानों द्वारा तीसरे दौर की बिनाई का इंतजार किए बिना लगभग 70-80 प्रतिशत क्षेत्र में कपास के पौधे उखाडऩा इस साल कपास की फसल में कमी के मुख्य कारण बताए जा रहे हैं। 
 
पिछले वर्ष महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश सहित कपास के प्रमुख खेती वाले राज्यों में सूखे के बाद देश में कम उत्पादन के कारण भारतीय कताई मिलों के लिए गुणवत्ता वाली कपास की उपलब्धता एक प्रमुख मसला रही है। नमी की कमी के कारण किसान खेतों में दूसरे दौर के बाद ही बिनाई स्थगित करने के लिए विवश हो गए थे। सामान्य रूप में यह बिनाई चार दौर की होती है। सूखाग्रस्त राज्यों के कुछ हिस्सों में तीसरे दौर में जो छिट-पुट बिनाई हुई थी उस कपास की गुणवत्ता बहुत खराब थी। 
 
इसके उलट मानव-निर्मित फाइबर कच्चे तेल से उत्पन्न किया जाता है और इसलिए भारत सहित दुनिया भर में यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता है। इसके अलावा मानव निर्मित फाइबर कपास की तुलना में काफी सस्ता भी होता है। सिंथेटिक मिश्रण वाले उत्पाद सस्ते होने की वजह से उपभोक्ता कपड़े के लिए सिंथेटिक मिश्रण का चुनाव कर रहे हैं। सूती वस्त्र निर्यात संवर्धन परिषद (टेक्सप्रोसिल) के चेयरमैन उज्ज्वल लाहोटी ने कहा कि तमिलनाडु सहित दक्षिण भारतीय राज्यों में कुछ कताई मिलों ने कई वर्षों के बड़े अंतराल के बाद फिर से मानव निर्मित फाइबर का उपयोग करना शुरू कर दिया है। परंपरागत रूप से वे मानव निर्मित फाइबर का उपयोग कर रही थीं लेकिन एक दशक पहले उन्होंने कपास का रुख कर लिया था। अब वे दोबारा मानव निर्मित फाइबर का इस्तेमाल करने लगी हैं।
Keyword: cotton, textiles, fiber,,
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