बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत बन सकता है कृषि क्षेत्र की ताकत
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भारत बन सकता है कृषि क्षेत्र की ताकत

अजय शाह /  May 13, 2019

हममें से कई लोगों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया होगा कि कृषि क्षेत्र का निर्यात वाहन क्षेत्र या कपड़ा एवं परिधान क्षेत्र के निर्यात से अधिक है। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह 

 
खाद्यान्न के अभाव की मानसिकता काफी हद तक आधुनिक भारत से मेल नहीं खाती। उपज बढऩे के साथ स्थानीय कीमतों में गिरावट रोकने का एकमात्र तरीका यह है कि इस क्षेत्र को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया जाए। हमारा देश हर वर्ष कृषि क्षेत्र में करीब 4,000 करोड़ डॉलर का निर्यात करता है। यह निर्यात कपड़ा एवं वस्त्र क्षेत्र के कुल निर्यात से भी अधिक है। कृषि क्षेत्र को लेकर हमको अपना वैश्विक नजरिया और अधिक अंतरराष्ट्रीय बनाना होगा। भारत में खुद ही देश को लेकर ऐसा नजरिया बन चुका है कि यह अत्यधिक आबादी और खाद्यान्न की कमी वाला देश है। कई दशक पहले ऐसा था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। देश में खेती की जमीन की कमी नहीं है। मौसम भी एक वर्ष में कई फसल लेने में सहायक है। शुरुआत में हमारी उपज बहुत कम थी लेकिन अब उसका स्तर बहुत सुधर चुका है।
 
उपज में सुधार के साथ ही आबादी का बढऩा निरंतर धीमा हो रहा है। हमारे लिए यह संभव नहीं है कि जितना अन्न उपज रहा है उसकी खपत कर सकें। शायद घरेलू बाजार में खाद्यान्न कीमतों में गिरावट की यह भी एक वजह है। इन बातों ने कृषि उत्पादों के निर्यात की बुनियाद तैयार की। वर्ष 2013 तक भारत कृषि निर्यात के क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया को पछाड़ चुका था। उसने इस क्षेत्र में बीते दशक के मुकाबले सबसे ऊंची वृद्धि दर हासिल की। कृषि क्षेत्र का व्यापार/जीडीपी अनुपात 2008-09 के 11.8 फीसदी से बढ़कर 2018-19 तक 15.2 फीसदी हो गया। देश के श्रम आधारित निर्यात की चर्चा अक्सर वाहन और वस्त्र उद्योग तक सीमित रहती है। हममें से कई लोगों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया है कि कृषि क्षेत्र का निर्यात अब वाहन, कपड़ा और वस्त्र उद्योग से अधिक है। इसके बावजूद हाल के वर्षों में इसकी वृद्धि में ठहराव देखा गया है। वर्ष 2001-2004 और 2011-2014 के बीच हमने कृषि क्षेत्र के निर्यात में हर साल 3,400 करोड़ डॉलर जोड़े। उसके बाद के वर्षों में वृद्धि देखने को नहीं मिली। यह देश के मौजूदा कृषि संकट का एक तत्त्व हो सकता है। निरंतर निर्यात बाजार से जुड़ाव हमें एक खास न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना सुनिश्चित करता है।
 
अन्य देशों के संरक्षणवाद या सब्सिडी से परे एकतरफा वैश्विक एकीकरण हमारे लिए अवसर लाया है। ऐसे अंतरराष्ट्रीयकरण को लेकर कुल चार थीम हैं। इन्हें अन्य उद्योगों के क्षेत्र में समझा जा चुका है और अब कृषि की बारी है।  पहली थीम है विशेषज्ञता की। भारत सॉफ्टवेयर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करता रहा है लेकिन हार्डवेयर अथवा डेटा सेंटर चलाने के क्षेत्र में उसका प्रदर्शन उल्लेखनीय नहीं रहा है। ऐसे में भारत के लिए बेहतर यही होगा कि वह सॉफ्टवेयर बनाए और निर्यात करे जबकि डेटा सेंटर दुनिया में अन्य स्थानों पर किराये से ले। 
 
इसी प्रकार विश्व अर्थव्यवस्था में एकीकरण से देश के कृषि क्षेत्र में भी बदलाव आएगा। व्यापारिक शर्तों के अधीन हम उन चीजों के उत्पादन से दूरी बनाएंगे जो अन्य जगह बेहतर उत्पादित हो रही हैं। मिसाल के तौर पर गन्ना और गेहूं आदि। इसके स्थान पर हम उन चीजों पर ध्यान दे सकते हैं जिनमें हमारी विशेषज्ञता है। उदाहरण के लिए फल और सब्जियां।  दूसरी थीम है राजनीतिक अर्थव्यवस्था। घरेलू नीति प्रक्रिया निष्क्रिय राजनीतिक अर्थव्यवस्था में तब्दील हो रही है जहां विशेष हित वाले समूहों का दबदबा है। 
 
अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ाव एक नया परिदृश्य रचने में सहायता करता है। हमारे देश में गठबंधन करना आसान है। कई विशिष्ट हित समूह मिलकर सफलतापूर्वक निर्यात कर रहे हैं। कृषि क्षेत्र बहुत लंबे समय से नीतिगत प्रगति के क्षेत्र में ठहरा हुआ है। अब जबकि व्यापार और जीडीपी अनुपात 15 फीसदी है और निर्यात 4,000 करोड़ डॉलर हो चुका है तो कृषि नीति को लेकर नई संभावनाएं उत्पन्न हो चुकी हैं।  अंतरराष्ट्रीयकरण कई घरेलू पहेलियां हल करता है। उदाहरण के लिए देश में जिंस वायदा बाजार का क्रियान्वयन आसान नहीं है लेकिन एक बार अंतरराष्ट्रीयकरण होने के बाद देश के बाहर इन बाजारों में कारोबार किया जा सकेगा। भारत के लोग देश के बाहर वायदा बाजार की कीमत के आधार पर भंडारण या बुआई के निर्णय लेंगे। अंतरराष्ट्रीयकरण घरेलू नीति की समस्याओं को दूर करने में सहायक होता है। 
 
तीसरी थीम है दक्षिण एशिया में व्यापार। भौतिक नजदीकी अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए अत्यंत आवश्यक है। हमारे लिए सबसे अहम व्यापारिक अवसर आसपास के क्षेत्र में ही हैं। कृषि पर यह बात और अधिक लागू होती है क्योंकि इसमें परिवहन लागत की अहम भूमिका है। हमें ऐसा माहौल बनाना होगा ताकि दक्षिण एशिया में सुगमता से व्यापार का लाभ हासिल किया जा सके।  चौथी थीम है निरंतर संबद्घता। कई लोगों ने इस बात पर टिप्पणी की है कि कैसे भारत को अविश्वसनीय विक्रेता माना जाता है क्योंकि समय-समय पर इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगते रहे हैं। समस्या कहीं अधिक गहरी है। निर्यात सामान्य मसला नहीं है। इसके लिए जटिल संगठनात्मक पूंजी और कारोबारी रिश्तों की आवश्यकता होती है। अगर वस्त्र या वाहन क्षेत्र के निर्यात पर आए दिन प्रतिबंध लगे तो जाहिर है इसका असर निवेशकों पर पड़ेगा। इसमें सांस्थानिक, प्रक्रिया डिजाइन, कारेबारी रिश्ते आदि सभी क्षेत्रों के निवेश पर पडऩे वाला असर शामिल है। भारतीय कंपनियों की बात करें तो अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों में शामिल होना जटिल नियोजन की मांग करता है। इसके लिए कई वर्ष की तैयारी चाहिए।
 
यही बात उन विदेशी कंपनियों पर भी लागू होती है जो भारत के साथ कारोबार करना चाहती हैं। ऐसे प्रतिबंध भारत में निवेश की कंपनियों की इच्छा पर रोक लागते हैं। इससे भारत की निर्यात क्षमता प्रभावित होती है। हमारा आधा वैश्विक कारोबार बहुराष्ट्रीय निगमों के साथ होता है। निर्यात के लिए हमें ऐसी वैश्विक कंपनियों की आवश्यकता है जो हमारे यहां निवेश की प्रतिबद्घता जताएं।  प्रतिबंध लगने और उठने का दौर खाद्य असुरक्षा की उपज रहा है। अब हालात बदल चुके हैं। देश की आबादी कुल उत्पादित खाद्यान्न की खपत नहीं कर सकती। भविष्य में उपज में लाभ समस्या को हल करने वाले साबित होंगे। हम कृषि नीति को उपभोक्ताओं और किसानों के बीच एक प्रतिस्पर्धा के रूप में देखते हैं। अगर हम एक बार अपना नजरिया बदलकर वैश्विक कारोबार में शामिल हो गए तो हालात में बदलाव आ जाएगा। अगर हम कृषि जिंसों का आयात बढ़ाने में कामयाब रहे तो इसका लाभ हर भारतीय को मिलेगा। भूमि का इस्तेमाल भी कम मूल्य वाली वस्तुओं से उच्च मूल्य वाली उपज की ओर होगा।
Keyword: agri, farmer, crop, monsoon, IMD, export,,
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