बिजनेस स्टैंडर्ड - उच्च वृद्घि पर दें ध्यान
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उच्च वृद्घि पर दें ध्यान

संपादकीय /  May 13, 2019

स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के अर्थशास्त्रियों ने सन 2030 तक की वैश्विक वृद्घि को लेकर एक अनुमान प्रस्तुत किया है। उसके मुताबिक एशिया की सात अर्थव्यवस्थाएं इस अवधि में 7 फीसदी की दर से बढ़ेंगी। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत इनमें से एक होगा लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि यह कुछ अन्य प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में धीमी गति से विकसित होगा। उदाहरण के लिए अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि सन 2030 तक बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय भारत से अधिक होगी। इस बीच वियतनाम, जिसकी प्रति व्यक्ति आय भारत से केवल 30 फीसदी अधिक है, उसकी प्रति व्यक्ति आय सालाना 10,000 डॉलर से अधिक हो जाएगी। इस प्रकार वह प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत से दोगुनी समृद्घि वाला देश हो जाएगा। 

 
भारत के दृष्टिकोण से देखें तो इन देशों से तुलना बहुत आश्वस्त नहीं करती। ऐसे समय में जबकि छोटे देश कहीं अधिक बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, चीन को पीछे छोडऩे या अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को पछाडऩे की बात बहुत आश्वस्त नहीं करती। इस अवधि में भारत प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ सके, इसके लिए क्या करना होगा? अब से लेकर 2030 तक वृद्घि के लिए स्थायी राह पर विचार करते हुए स्टैंडर्ड चार्टर्ड के अर्थशास्त्री अनुमान जताते हैं कि जो अर्थव्यवस्थाएं जिंस या विनिर्मित वस्तुओं का निर्यात कर सकती हैं उनका प्रदर्शन बेहतर रहेगा। यह बात ध्यान देने वाली है कि बीते वर्षों के दौरान निर्यात के मोर्चे पर बांग्लादेश और वियतनाम दोनों का प्रदर्शन भारत से बेहतर रहा है। इसकी एक वजह भारतीय विनिर्माण का प्रतिस्पर्धी न होना भी है। प्रतिस्पर्धा की यह कमी वस्त्र क्षेत्र के अलावा भी है। हाल के वर्षों में संरक्षणवादी रुख अपनाया गया है लेकिन वह भी मददगार नहीं साबित हुआ क्योंकि इसके कारण देश को वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बनाने में दिक्कत आती है। ई-कॉमर्स क्षेत्र में भारी भरकम निवेश करने वाले निवेशकों समेत अन्य निवेशकों के साथ मनमाना व्यवहार भी इस क्षेत्र में हमारे पिछडऩे की एक वजह है। अगली सरकार को यह छवि बदलनी होगी और ऐसी धारणा विकसित करने की दिशा में काम करना होगा कि विदेशी निवेश और विदेशी व्यापार के लिए देश में स्थिर माहौल है। साथ ही यह भी कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला के घटकों के केंद्र के रूप में भी भारत सुरक्षित है। 
 
व्यापक प्रश्न यह है कि निजी निवेश में इजाफे के बिना वृद्घि दर में बढ़ोतरी कैसे लाई जा सकती है। फिलहाल निवेश अतीत के वर्षों की ऊंचाई से काफी कम है। बीते चार-पांच वर्ष से इसमें ठहराव भी देखने को मिल रहा है। बीती कुछ तिमाहियों में अवश्य थोड़ा सुधार देखने को मिला है। निवेशकों का यकीन नए सिरे से बहाल करना बहुत अहम है। निजी कारोबारी बचत में इजाफा भी आवश्यक है क्योंकि तभी ऐसा निवेश संभव हो पाएगा। अभी भी काफी पूंजी तंत्र में फंसी हुई है। तेजी और प्रोत्साहन वाले वर्षों का ऋण अभी तक पूरी तरह निपट नहीं सका है। कई बैलेंसशीट अभी भी कर्ज के बोझ में दबी हैं। परंतु जरूरत यह है कि निर्यात के जरिये निवेश और आय के नए अवसर और संभावनाएं तलाश किए जाएं। नया पूंजीगत व्यय अक्सर रोजगार तैयार करने और आम घरों की वित्तीय बचत बढ़ाने में मदद करता है। अगर भारत को उभरती अर्थव्यवस्थाओं में श्रेष्ठ बनना है तो इन बातों को प्राथमिकता देनी होगी। यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि कामगार वृद्घि और अवसरों का लाभ लेने के लिए तैयार हों। दूसरे शब्दों में शिक्षा, कौशल और स्वास्थ्य क्षेत्र को प्राथमिकता में रखना अनिवार्य है। 
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