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भारत-पाक सीमा पर राष्ट्रवाद पर भारी धार्मिक विश्वास

साई मनीष /  May 13, 2019

अगर इसमें दोनों तरफ बाड़ और बीच में वर्जित क्षेत्र न हो तो किसी को भी यह गलतफहमी हो सकती है कि यह भारत के किसी शहर में निर्माणाधीन फ्लाईओवर है। भारत और पाकिस्तान के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित डेरा बाबा नानक में सिख श्रद्घालुओं का एक दल उस जगह जमा है जहां से सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने एक ढांचे पर दूरबीन लगा रखी थी। इसके जरिये श्रद्घालु सीमा से चार किमी दूर पाकिस्तान के करतारपुर शहर में मौजूद गुरुद्वारे के दर्शन कर सकते थे। यह वही जगह है जहां गुरु नानक अपने जीवन में अंतिम दिनों में रहे थे। 

इस महीने की शुरुआत में बीएसएफ ने दूरबीन को हटा दिया। ढांचे को हटाने और करतारपुर गलियारे पर काम शुरू करने के लिए एक निजी कंपनी ने यहां भारी मशीनें तैनात की हैं। दूरबीन के बिना भी सिख श्रद्घालु नंगी आंखों से गुरुद्वारे को देख सकते हैं। बाड़ के पार पाकिस्तान की तरफ गलियारे पर हो रहे शानदार काम को भी साफ-साफ देखा जा सकता है। भारतीय श्रद्घालुओं को परमिट जारी करने के लिए बनाए गए तीन ढांचों को ढहा दिया गया है ताकि सड़क बिछाई जा सके।

इस गलियारे का काम पाकिस्तान की तरफ ज्यादा प्रगति पर दिख रहा है। भारत की तरफ काम की रफ्तार बहुत धीमी दिख रही है। सीमा की तरफ जाने वाली सड़क के दोनों ओर की कृषि जमीन का केंद्र सरकार ने अधिग्रहण कर लिया है। एक निजी कंपनी की जेसीबी मशीनें एक एलिवेटेड सड़क के निर्माण के लिए मिट्टी बिछाने का काम कर रही हैं जो बाड़ के ऊपर से जाकर पाकिस्तान में बन रही सड़क से मिलेगी। इस साल नवंबर में इस रास्ते भारतीय नागरिक वीजा के बिना पाकिस्तान जा सकेंगे। भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने दावा किया है कि इस साल नवंबर में गुरु नानक की 550वीं जयंती से पहले डेरा बाबा नानक को करतारपुर गुरुद्वारे से जोडऩे वाला करतारपुर गलियारा बनकर तैयार हो जाएगा। 

अधिकांश राजनीतिक दलों ने करतारपुर गलियारे पर हुई प्रगति को अपने फायदे के लिए भुनाने की कोशिश की है। पिछले साल नवंबर में जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इसकी आधारशिला रखी तो इस मौके पर कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्घू और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) की हरसिमरत बादल मौजूद थीं। इससे कुछ ही दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करतारपुर गलियारे के खुलने की तुलना बर्लिन की दीवार गिरने से की थी। 

अपनी दादी को करतारपुर गुरुद्वारे के दर्शन कराने आए बटाला के युवक अमनदीप सिंह ने कहा, 'कई वर्षों से हम करतारपुर में दरबार साहिब में मत्था टेकने की दुआ कर रहे थे। आखिरकार हमारी दुआ काम कर गई।' जब उनसे पूछा गया कि इसका श्रेय आप किसको देना चाहेंगे तो उन्होंने कहा, यह हमारे लिए विश्वास का मामला है। यह एक राजनीतिक फैसला था जो बहुत पहले ही ले लिया गया था। लेकिन हाल के महीनों में मैंने यहां मशीनें देखी हैं और सही मायनों में काम हो रहा है।'

बाड़ के इस तरफ भारतीय सीमा पर स्थित एक छोटे गुरुद्वारे के पंथी सुखदेव सिंह ने कहा, 'यहां 2002 में अरदास शुरू हुई थी। तबसे यहां आने वाले श्रद्घालुओं की संख्या काफी बढ़ चुकी है। भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव बढऩे पर भी यहां कोई असर नहीं होता है। श्रद्घालु दरबार साहिब की एक झलक पाने के लिए यहां आते हैं और आते रहेंगे। गलियारे के खुलने से पूरी दुनिया से सिख बाबा डेरा नानक आ सकते हैं और फिर यहां से आगे जा सकते हैं।'

श्रद्घालुओं की संख्या बढऩे की संभावना और सड़क निर्माण की प्रगति को देखते हुए उम्मीदें भी बढऩे लगी हैं। जिस जगह से करतारपुर गुरुद्वारा दिखता है वहां अभी खिलौनों की दो दुकानें और एक सॉवेनियर शॉप है। इसका संचालन डेरा बाबा नानक और आसपास के गांवों के बुजुर्गों द्वारा किया जाता है। इनमें करीब 80 साल के शफीक भी शामिल हैं जो खिलौने बेचते हैं। अपनी जिंदगी के अधिकांश समय वह सीमा चौकी पर आने वाले श्रद्घालुओं को खिलौने बेचते रहे हैं। उनकी कमाई से परिवार का गुजारा होता है और साथ ही उन्हें हर महीने 700 रुपये पेंशन मिलती है। किसी अच्छे दिन वह 250 रुपये की कमाई कर लेते हैं। शफीक ने कहा, 'सड़क बना रही कंपनी ने मुझे अपनी दुकान हटाने को कहा है। जब तक गलियारा नहीं खुलता है तब तक मैं क्या करूंगा? जब गलियारा खुल जाएगा तो सरकार दुकानों के लिए जमीन किराये पर दे देगी। जब तक मैं जिंदा हूं मुझे कुछ और काम धंधा करना पड़ेगा।'

Keyword: BSF, Indo Pak Border, Kartarpur Sahib, Gurudwara, Corridor, Company, Politics,
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