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किस्तों में लें दावे की रकम तो दुरुपयोग का डर होगा कम

संजय कुमार सिंह /  May 13, 2019

भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) ने हाल ही में कुछ दिशानिर्देशों का मसौदा जारी किया। इसमें पॉलिसीधारकों को दावों के निपटारे की राशि किस्तों में पाने की इजाजत देने का प्रस्ताव है। अभी तक बीमा दावे की राशि एकमुश्त मिलती है। जीवन बीमा में तो किस्तों में भुगतान का चलन पहले से ही है, लेकिन अब नियामक उन व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा और लाभ आधारित स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों में भी ऐसा करने की बात कह रहा है, जो पॉलिसी सामान्य बीमा और स्वास्थ्य बीमा कंपनियां जारी करती हैं। यदि ये दिशानिर्देश लागू हो जाते हैं तो बीमाधारकों को एकमुश्त रकम या किस्तों के विकल्प में से कोई एक चुनने या दोनों का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा चुनने की इजाजत मिल जाएगी।

इस विकल्प से पॉलिसीधारकों को कई तरह के फायदे मिल जाएंगे। मैक्स बूपा हेल्थ इंश्योरेंस के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्य अधिकारी आशिष मेहरोत्रा समझाते हैं, 'ग्राहकों को अपनी वित्तीय स्थिति के हिसाब से यह तय करने की गुंजाइश मिल जाएगी कि दावों के निपटारे के लिए उन्हें कौन सा विकल्प चुनना है। आज के दौर में दावा निपटारे में इस तरह के लचीलेपन की वाकई बहुत जरूरत है।'

इस विकल्प से उन पॉलिसीधारकों और उनके परिवारों को खास तौर पर लाभ होगा, जो वित्तीय मामलों में बहुत माहिर नहीं हैं। सिग्ना टीटीके हेल्थ इंश्योरेंस के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्य अधिकारी प्रसून सिकदर कहते हैं, 'जब लाभार्थी या उसके नॉमिनी को एक ही बार में ढेर सारी रकम मिल जाती है तो उसका दुरुपयोग होने की आशंका ज्यादा रहती है। जो ग्राहक रुपये-पैसे को ठीक तरीके से नहीं संभाल पाते हैं, उनके लिए बेहतर यही होगा कि भुगतान कई किस्तों में देर तक होता रहे।'

यदि परिवार का इकलौता कमाऊ सदस्य किसी दुर्घटना या गंभीर बीमारी का शिकार हो जाता है तो परिवार की माली हालत पर बड़ा असर पड़ेगा। जेएलटी इंडिपेंडेंट इंश्योरेंस ब्रोकर्स में लीड पार्टनर - कर्मचारी लाभ अरहन गोतड़के कहते हैं, 'जब तक पॉलिसीधारक ठीक नहीं होता है, तब तक आय के मोर्चे पर हुए नुकसान ही भरपाई किस्तों में हुए भुगतान से हो सकती है।' ग्राहक जो भी विकल्प चुनता है, हमेशा उसी पर टिके रहना उसके लिए जरूरी नहीं होता। पॉलिसीधारक के पास पॉलिसी अनुबंध के दौरान किसी भी समय और कितनी भी बार भुगतान के विकल्प बदलने का मौका होता है और वह परिस्थितियां बदलने पर वह भुगतान का विकल्प भी बदल सकता है।

किस्तों में भुगतान का विकल्प चुनकर लाभार्थी या उसका नॉमिनी ब्याज दर के जोखिम से बच जाता है। यदि बड़ी मात्रा में एकमुश्त रकम दी जाती है तो परिवार के ऊपर जिम्मेदारी रहती है कि वह उस रकम को ऐसे संभाले कि कम से कम अगले तीन से पांच साल तक वह रकम उसके काम आती रहे। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार तथा अरविंद राव ऐंड एसोसिएट्स के संस्थापक अरविंद ए राव की सलाह है, 'जब पॉलिसीधारक को एकमुश्त रकम मिलती है तो हो सकता है कि उस समय ब्याज दरें कम चल रही हों। उसके बाद उस धन को इस तरह संभालने की जिम्मेदारी पॉलिसीधारक या उसके नॉमिनी के कंधों पर होती है कि धन अगले कुछ साल तक काम आता रहे। भुगतान वाले विकल्प में लाभार्थी को पता होता है कि निश्चित अवधि में कुल कितनी रकम उसके हाथ में आएगी। उस स्थिति में धन को संभालने का जिम्मा उसका नहीं होता।'

समय के साथ धन के मूल्य के सिद्घांत पर चलें तो एकमुश्त रकम के मुकाबले भुगतान के विकल्प में अधिक धन हासिल हो जाता है। सिकदर समझाते हैं, 'चूंकि ग्राहक का धन बीमा कंपनी के पास लंबे अरसे तक रहता है, इसीलिए उसे ग्राहक को अतिरिक्त लाभ देने ही पड़ेंगे। कितना लाभ दिया जाता है, यह बीमा कंपनी पर निर्भर करता है।' बीमाकर्ता योजना की संरचना को देखते हुए पहले ही तय कर लेगा कि अतिरिक्त लाभ के रूप में क्या और कैसे दिया जाना है। इसका फैसला दावे के समय चल रही ब्याज दर पर निर्भर नहीं करेगा।

वित्तीय रूप से सजग पॉलिसीधारक अच्छी तरह से जानते हैं कि धन को किस तरह निवेश किया जाए और लंबे समय तक चलाया जाए। ऐसे लोगों को भुगतान विकल्प के तहत दिए जा रहे अतिरिक्त लाभों को अच्छी तरह से तोल लेना चाहिए। उन्हें यह भी देखना चाहिए कि उस समय ब्याज दरें किस स्तर पर हैं और भुगतान के बारे में अपना विकल्प उसके बाद ही चुनना चाहिए। जिन ग्राहकों को वित्तीय मामलों की अच्छी समझ नहीं है, उन्हें किस्तों में भुगतान का विकल्प ही चुनना चाहिए। जब इस तरह की बीमा योजना उपलब्ध हो जाएंगी तो ग्राहकों को भुगतान के विकल्प के अंतर्गत विभिन्न बीमा कंपनियों द्वारा दिए जा रहे अतिरिक्त लाभों की आपस में तुलना करनी चाहिए और उसके बाद सही फैसला करना चाहिए।
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