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आरबीआई के लिए पारदर्शिता बनी जरूरी

सुदीप्त दे /  May 12, 2019

उच्चतम न्यायालय ने गिरीश मित्तल बनाम पार्वती बनाम सुंदरम ऐंड एएनआर मैटर मामले में सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के रुख को पिछले दिनों गलत ठहरा दिया। फैसले के कुछ दिन बाद बैंकिंग क्षेत्र के नियामक ने गोपनीय जानकारियों के खुलासे से संबंधित नई नीति 30 अप्रैल को जारी कर दी। उच्चतम न्यायालय के फैसले के मुताबिक यह खुलासा नीति और उसके हिसाब से उठाए गए कदमों को वर्ष 2015 के आरबीआई बनाम जयंतीलाल एन मिस्त्री वाद में दिए गए उसके फैसले के अनुरूप ही रखना होगा।

कानूनी फर्म सिरिल अमरचंद मंगलदास के पार्टनर एल विश्वनाथ का कहना है कि जयंतीलाल निर्णय ने बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ी सूचनाओं के खुलासे के संदर्भ में संतुलन की जरूरत पूरी कर दी है। वह कहते हैं, 'आरटीआई अधिनियम के तहत कोई जानकारी मांगी जाने की स्थिति में आरबीआई की इस खुलासा नीति से संतुलन बनाने में मदद मिलेगी।' इसके साथ ही आरबीआई ने 12 अप्रैल की अपनी खुलासा नीति वापस ले ली है।

आरटीआई विशेषज्ञ शीर्ष अदालत के उस आदेश से खासे उत्साहित हैं जिसमें व्यापक जनता और जमाकर्ताओं के हितों को संरक्षित करने वाले आरबीआई के वैधानिक दायित्व पर बल दिया गया है। पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त एवं बेनेट यूनिवर्सिटी में संवैधानिक कानून के प्रोफेसर एम श्रीधर आचार्यलु कहते हैं, 'एक दशक से अधिक समय तक बदलावों का प्रतिरोध करते रहे आरबीआई के लिए अब अपने नियामकीय प्रशासन में पारदर्शिता लाना अपरिहार्य हो चुका है। कोई भी सार्वजनिक निकाय अपने को अब बंद आलमारियों में छिपाकर नहीं रख सकता है।'

आचार्यलु कहते हैं कि अगर आगे देखें तो बैंकिंग नियामक पर सार्वजनिक हित का ध्यान रखने का दायित्व आ गया है ताकि बैंकों की खामियों को काबू में रख उन्हें वित्तीय धांधली एवं भ्रष्टाचार में लिप्त होने से रोका जा सके। जानकारों का कहना है कि उच्चतम न्यायालय के आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आरटीआई अधिनियम आरबीआई अधिनियम समेत बाकी सभी कानूनों पर अधिमान्यता हासिल करता है। लक्ष्मीकुमारन ऐंड श्रीधरन के पार्टनर एल चरण्या कहते हैं, 'इसका अपवाद केवल आरटीआई अधिनियम की धारा 8 में वर्णित विषय हैं जिसमें किसी सार्वजनिक प्राधिकरण के लिए मांगी गई जानकारी साझा करना जरूरी नहीं है।'

आरबीआई ने विभिन्न बैंकों के बारे में मांगी गई सूचनाएं साझा करने से इस आधार पर मना कर दिया था कि ऐसे खुलासे से देश के आर्थिक हितों और बैंकों की प्रतिस्पद्र्धी बढ़त को नुकसान पहुंचेगा। उसका यह भी कहना रहा है कि बैंकों से यह जानकारी विश्वासपरक संबंधों के नाते मिली होती है। लेकिन शीर्ष अदालत ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा है कि आरबीआई का विश्वासपरक संबंध अपने ग्राहकों से है।

विशेषज्ञों को लगता है कि आरबीआई की कानूनी टीम अब आरटीआई अधिनियम की धारा 8 पर बारीक निगाह रखेगी। इंडसलॉ के पार्टनर निशांत सिंह कहते हैं, 'दरअसल धारा 8 के दायरे में आने वाले मुद्दे बहस का विषय हैं।' उनके मुताबिक उच्चतम न्यायालय का आकलन आरबीआई की खुलासा नीति पर यह असर डाल सकता है कि ठेकों एवं विभागीय बजट जैसी निचले स्तर की आर्थिक एवं वित्तीय सूचनाएं इस छूट के दायरे में नहीं आएंगी।

बैंकिंग क्षेत्र के कानूनी जानकार राजीव देवल का मानना है कि नियामक को अपनी संचार रणनीति पर नए सिरे से गौर करने की जरूरत पड़ेगी। इसके अलावा बैंक निरीक्षण रिपोर्ट में इस्तेमाल होने वाली भाषा और बैंकों के साथ पत्राचार की भाषा पर भी गौर करना होगा।

देवल कहते हैं कि ऐसी रिपोर्ट तक आम जनता की पहुंच होने से बैंकों के सामने चुनौती भी खड़ी हो सकती है। अगर ऐसी रिपोर्ट एवं संचार का इस्तेमाल संदर्भ से परे होता है तो फिर बैंक के लिए वह नुकसानदायक हो सकता है। देवल के मुताबिक बैंकों के बारे में नियामक की रिपोर्ट एवं पत्राचार अधिक तथ्य-आधारित, न्यायपरक एवं सटीक होने चाहिए और उसमें अस्पष्ट एवं व्यापक टिप्पणियों से परहेज किया जाना चाहिए।

कानूनी जानकार इस बात पर सहमत हैं कि उच्चतम न्यायालय की दिशा असल में पारदर्शिता एवं जवाबदेही के विचार पर निर्भर है। एलऐंडएल पार्टनर्स के पार्टनर विजय सोंधी कहते हैं, 'इस फैसले से निश्चित रूप से जवाबदेही एवं पारदर्शिता बढ़ेगी। अब आरबीआई के सामने कोई विकल्प नहीं रह गया है।'

Keyword: RTI, SC, Supreme Court, RBI, Regulator,
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