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चुनाव नतीजों को लेकर अटकलों और संभावनाओं पर एक नजर

मिहिर शर्मा /  May 12, 2019

पिछले कई महीनों से तमाम लोग एक-दूसरे से एक ही सवाल पूछ रहे हैं। यह सवाल ऐसा है जो किसी अभिवादन या बातचीत शुरू करने का जरिया बन सकता है। असल में, इस सवाल को पूरा पूछने की भी जरूरत नहीं है। आप यह भी पूछ सकते हैं कि 'कितनी आ रही हैं?' 

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कितनी सीटें जीतेगी? इस सवाल का जवाब कोई भी नहीं जानता है और न तो इसके आसपास भी पहुंच सकता है। केवल मतदान सर्वे करने वाले ही कुछ बता सकते हैं लेकिन अब तक के एग्जिट पोल नतीजों को लेकर उन्होंने चुप्पी साधी हुई है। लेकिन उनके दिमाग में एक संख्या होने की संभावना है। लेकिन इस संख्या पर ही निर्भर करेगा कि अगले पांच वर्ष कैसे दिखेंगे? ऐसे में हम भाजपा की सीटों से जुड़े परिदृश्य पर गौर करते हैं।

272 प्लस: भाजपा के अकेले दम पर बहुमत हासिल करने का मतलब है कि उसने फिर से हिंदीभाषी राज्यों में विरोधियों का लगभग सफाया कर दिया है और वह बाकी हिस्सों में भी सफल रही है। इतिहास में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खास मुकाम मिल जाएगा। उनके पास अपने पहले कार्यकाल की तुलना में अपने एजेंडा पर आगे बढऩे के लिए अधिक समर्थन होगा। मोदी को पहले की ही तरह अपने सहयोगी दलों या अपने दल के भीतर भी किसी से सलाह की जरूरत नहीं होगी। अब उन्हें बखूबी पता चल चुका होगा कि नया कार्यकाल 'विकास' की चर्चा से कम, राष्ट्रवादी एवं ध्रुवीकरण विमर्श से अधिक मिला है। इससे उन्हें अपना एजेंडा तय करने में मदद मिलेगी।

230-272: अगर भाजपा बहुमत के आंकड़े से दो दर्जन सीटें दूर रह जाती है तो भी उसे मोदी की ही जीत माना जाएगा। उन्होंने वर्ष 2014 में पश्चिमी एवं उत्तरी भारत के छह बड़े राज्यों की 194 सीटों में से 90 फीसदी पर भाजपा को जीत दिलाई थी। ऐसे में इस बार 230-272 सीटें आने को मोदी की लोकप्रियता में आंशिक गिरावट माना जाएगा। ये इलाके काफी हद तक मोदी के प्रति निष्ठावान बने हुए हैं लेकिन दक्षिण एवं पूर्वी भारत में भाजपा को अधिक कामयाबी नहीं मिली होगी। सत्तारूढ़ गठबंधन में मोदी निर्विवाद नेता बने रहेंगे लेकिन मोदी मार्का हिंदुत्व को मानने वाले और दो बार इसे खारिज कर देने वाले इलाकों में विभेद गहराता जाएगा।

210-230: मेरा मानना रहा है कि भाजपा को इस बार करीब 230 सीटें मिलेंगी। यह तर्कसंगत भी है। इसका मतलब होगा कि उत्तर प्रदेश में विपक्षी एकता ने भाजपा को खासी चोट पहुंचाई है और इस राज्य में उसे अपनी आधी सीटें गंवानी पड़ी है। भाजपा को उत्तर एवं पश्चिम भारत के अन्य राज्यों में भी ठीकठाक नुकसान उठाना पड़ा है जो गत वर्ष तीन राज्यों में मिली नजदीकी हार की ही पुनरावृत्ति होगी। मोदी की लोकप्रियता को भाजपा से कहीं अधिक मान लिया जाएगा और मोदी अपना शिकंजा बरकरार रखने के लिए यही दलील देंगे। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में कुछ नए सहयोगी भी जुड़ेंगे। टीआरएस, बीजद और वाईएसआर कांग्रेस के जुडऩे की संभावना सबसे अधिक है। लेकिन मोदी प्रधानमंत्री होते हुए भी अपना सिक्का नहीं चला पाएंगे। सहयोगी दल अपने मतदाताओं को यह जताने की कोशिश करेंगे कि वे सरकार में लगभग बराबरी का दर्जा रखते हैं। केंद्र सरकार के भीतर पीएमओ में हुए सत्ता संकेंद्रण को भी शिथिल करना होगा।

190-210: यह परिदृश्य काफी खतरनाक होगा। अगर भाजपा महज 200 का आंकड़ा पार करती है या उससे नीचे रहती है तो मोदी के लिए प्रभावी जीत का दावा कर पाना मुश्किल होगा। वर्ष 2014 में भाजपा और कांग्रेस के बीच करीब 200 सीटों पर आमने-सामने की टक्कर हुई थी। अगर वर्ष 2019 में भाजपा 200 के आसपास रहती है तो इसका मतलब होगा कि कांग्रेस ने पिछली बार की तुलना में काफी बेहतर प्रदर्शन किया है। पिछली बार सीधी लड़ाई में कांग्रेस को ध्वस्त कर मोदी ने बहुमत हासिल किया था और उसमें उत्तर प्रदेश एवं बिहार के लगभग सफाये का मुख्य योगदान रहा था। अगर भाजपा 200 तक सिमटती है तो मतलब होगा कि भाजपा दोनों राज्यों में अपना प्रदर्शन दोहरा नहीं पाई है। फिर भी भाजपा के सबसे बड़े दल होने और पैसों की कोई कमी न होने से मोदी अगर चाहेंगे तो प्रधानमंत्री बने रहेंगे। लेकिन इसके लिए बड़े गठबंधन की जरूरत होगी जिसका हिस्सा उत्तर प्रदेश के महागठबंधन में शामिल बहुजन समाज पार्टी भी शायद बन सकती है। लेकिन इस बड़े गठबंधन को संभालना और व्यवस्थित रखना मुश्किल होगा और मोदी को अपनी कुछ ताकत गंवानी पड़ेगी।

170-190: मुझे इसकी संभावना नहीं दिख रही है लेकिन 200 से काफी नीचे रहने पर भी भाजपा वाजपेयी-शैली का गठबंधन बनाकर सत्ता का दावा कर सकेगी। मुझे शक है कि उस समय सहयोगी दल मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनाने की मांग रखेंगे। क्या वह ऐसा होने देंगे? या फिर वह विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे? उनकी सोच के बारे में कोई भी अंदाजा नहीं लगा सकता है। लेकिन कांग्रेस शायद सोचती है कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे तो राजग में टूट-फूट होगी और अगले दो साल में दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ जाएगी। उस समय तक मोदी की सशक्त नेता वाली छवि को भी काफी नुकसान हो चुका होगा। 

170 से कम: पहले इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था लेकिन अब कुछ लोगों को यह मुमकिन लगता है। इसका मतलब होगा कि राजग चुनाव हार चुका है और कांग्रेस गठबंधन उसके आसपास या आगे निकल चुका है। फिर क्या होगा? क्या 160 सीटें जीतने वाला कांग्रेस गठबंधन सरकार बना पाएगा? शायद नहीं। उस स्थिति में हमें तीसरा मोर्चा दिखाई देगा। लेकिन उसे बाहर से समर्थन कौन देगा- मोदी या राहुल गांधी? मैं तो मोदी पर ही दांव लगाऊंगा कि वह राजीव गांधी की तरह समर्थन देकर सरकार बनवाएं और फिर उसे अस्थिर करें। मोदी इस आस में सरकार गिराएंगे कि  स्थिरता के लिए वोट मांगकर वह सत्ता में लौट आएंगे।

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