बिजनेस स्टैंडर्ड - नरेंद्र मोदी की नई 'मंदिर' परियोजना
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नरेंद्र मोदी की नई 'मंदिर' परियोजना

शेखर गुप्ता /  May 12, 2019

बीते 15 वर्ष के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों की चुनावी यात्राओं के दौरान मैंने 'दीवार पर लिखी इबारत' रूपक को सही पाया है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप में चुनावों के दौरान त्योहारों से भी अधिक उत्सव का माहौल रहता है। इस दौरान लोगों के मन में क्या चल रहा है, उनकी आकांक्षाएं, उनकी खुशी, उनकी चिंताएं और आशंकाएं आदि सभी दीवारों पर लिखी इबारत से स्पष्ट होती हैं। ये इबारतें भित्तिचित्रों, विज्ञापन, बाड़ों यहां तक कि मलबों से भी प्रकट हो सकती हैं। आप वाराणसी में बदलाव देखना चाहते हैं तो वहां पड़े ताजा मलबे पर से गुजरिए, पास ही एक बुलडोजर नजर आएगा जो काम पर लगा है। दीवारों को केवल देखिए, उन्हें पढि़ए मत क्योंकि वहां पढऩे को कुछ नहीं है। बस देखिए कि वहां क्या हुआ करता था।

यह दरवाजों, खिड़कियों, रोशनदानों, अलमारियों आदि का मलबा है। ऐसा प्रतीत होता है मानो ये दीवार पर गोंद से चिपकाए गए थे और किसी ने उन्हें वहां से झिंझोड़कर अलग कर दिया है। अगर आपको अचानक आसमान से यहां उतार दिया जाए तो शायद आप सोचें कि आप किसी कलाकृति के बीच खड़े हैं। आपको यह फेवीकोल का विज्ञापन भी लग सकता है जहां बुलडोजर सबकुछ तोड़ देता है लेकिन फेवीकोल का जोड़ नहीं। यहां कमोबेश ऐसा ही हुआ है। केवल 11.4 एकड़ इलाके में करीब 300 घर, मंदिर और अन्य इमारतें खड़ी थीं, जिनमें अधिकांश एक दूसरे से सटी हुई थीं। इनके बीच ही बनारस की चर्चित गलियां थीं। कुछ तो इतनी संकरी कि एक साथ दो लोग भी बमुश्किल ही गुजर पाते। यह सब अब इतिहास हो गया है।

मोदी के आलोचक कहते हैं कि इस इलाके को इसलिए ढहा दिया गया ताकि हिंदुओं के सबसे पवित्र और पुराने काशी विश्वनाथ मंदिर को हिंदू समाज गंगा के घाट से सीधे देख सके। इतना ही नहीं अब लोग इस अपेक्षाकृत छोटे मंदिर के साथ ही ज्ञानवापी मस्जिद का गुंबद भी आसानी से देख सकेंगे। औरंगजेब ने सन 1669 में मूल काशी विश्वनाथ मंदिर को ढहाकर यह मस्जिद बनवाई थी। यह उग्र हिंदुत्ववादियों की आंख में चुभेगी और अगला निशाना बनेगी। परंतु मेरी नजर में यह कोई खतरा नहीं है। इसलिए नहीं कि काशी विश्वनाथ विकास प्राधिकरण के 36 वर्षीय सीईओ विशाल सिंह तथा अन्य अधिकारी मुझे बताते हैं कि मस्जिद को 30 फुट ऊंचे इस्पात के खंभों से सुरक्षित कर दिया गया है और सीआरपीएफ के हथियारबंद जवान उसकी सुरक्षा में हैं। मेरा नजरिया यह है कि भले ही मौजूदा दौर में सत्ता बहुसंख्यकवादियों के हाथ में हो और विभिन्न संस्थान इतने कमजोर हों कि संविधान की रक्षा न कर पा रहे हों लेकिन एक ऐसी इमारत को नुकसान पहुंचाना आसान नहीं होगा जो सबके सामने और सबकी पहुंच में हो।

केवल एक इलाके के पुनर्विकास और नदी के घाट से मंदिर और मंदिर से घाट को देखने के लिए 300 मीटर के हिस्से को साफ करने से ऐसा कोई जोखिम नहीं पैदा होता। कुछ स्थानीय मुस्लिम नेताओं ने अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद की ओर से ऐसी आशंका जताती हुई याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर की थी जो खारिज कर दी गई। इसका बड़ा विरोध वाराणसी के हिंदू रूढि़वादियों ने किया। मंदिर के नीलकंठ गेट से पवित्र मणिकर्णिका घाट की ओर जाने वाली गली से गुजरते हुए मेरी मुलाकात सुप्रसिद्ध स्थानीय लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी त्रिलोचन प्रसाद से हुई। वह बेहद खफा हैं। जो चीजें कभी नहीं बदलनी थीं उन्हें बदलने का दुस्साहस कौन कर सकता है? उन्होंने हमारी विरासत को नष्ट किया है।

हर पवित्र चीज को नष्ट किया है। सैकड़ों करोड़ रुपये बरबाद किए गए, इसके साथ ही एक पूरी जीवन शैली और तमाम अन्य चीजें नष्ट कर दी गईं। आप मोदी को पसंद करें या नहीं लेकिन वह जोखिम उठाते हैं। 4.6 हेक्टेयर के इस इलाके का पुनर्विकास, जिसमें 296 इमारतें गिराई गईं, उनके द्वारा लिया गया एक बड़ा जोखिम है। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे केवल उदारवादी ही नहीं बल्कि ब्राह्मïणों के गढ़ के रूढि़वादी नागरिक भी नाराज हुए। ये वे लोग हैं जो बदलाव को सही नहीं मानते। इस क्षेत्र से जिन लोगों को हटाया गया उनमें 90 फीसदी ब्राह्मïण हैं। अपने पुजारियों की तरह वाराणसी में राजनीतिक पंडितों की भी कमी नहीं। उनमें से कई पूरे यकीन से आपको बताएंगे कि मोदी और योगी का यह दुस्साहस उन्हें 60 से 75 हजार वोट का नुकसान पहुंचाएगा।

यह क्षेत्र कैसा था और अब कैसा है, यह समझने के लिए सीईओ कार्यालय में लगे चार्ट और प्लास्टिक मॉडल देखने होंगे। सीईओ खुद मैरीलैंड विश्वविद्यालय से एमबीए हैं। प्राधिकरण को 600 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई और कानून बनाकर पुरानी इमारतों का अधिग्रहण किया गया। घरों के मालिकों को सर्किल रेट से दोगुनी दर पर भुगतान किया गया और वे कमोबेश प्रसन्न नजर आए। उन्हें कुल 200 करोड़ रुपये की राशि चुकाई गई। 15 करोड़ रुपये की राशि उन लोगों को दी गई जिनके पास मालिकाना हक नहीं था लेकिन किरायानामा था। मंदिर के आसपास केवल 12 लोग ऐसे हैं जो अब भी काबिज हैं।

तोडफ़ोड़ काम पूरा हो चुका है। मोदी ने 8 मार्च को नए परिसर का भूमि पूजन किया और एक साल में काम भी पूरा हो जाएगा। अब तक 43 मंदिरों का पता चला है जो घरों के भीतर छिप गए थे। यह ज्यादातर अतिक्रमण का मामला था। काम पूरा होने के बाद यह परिसर साफ सुथरा, आधुनिक और पहुंच लायक हो जाएगा। यानी यह उस तरह का हो जाएगा जिसका दावा प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने के बाद भी पुराना वाराणसी शहर पांच साल में नहीं कर सका। क्या यह जोखिम उठाने लायक था?

शहरों के अंदरूनी हिस्सों का विकास बहुत बड़ी चुनौती है। हमारे अधिकांश नेता इससे दूर ही रहते हैं। ऐसा पहला प्रयास संजय गांधी ने तुर्कमान गेट और जामा मस्जिद इलाके में किया था। परंतु वह एक तानाशाही प्रकृति के व्यक्ति थे जो किसी से कुछ नहीं पूछते थे। ऐसे दूसरे व्यक्ति एक आधात्मिक गुरु हैं जिनसे कोई सवाल नहीं पूछेगा। बोहरा समुदाय के धर्मगुरु सैयदना, मध्य मुंबई के भिंडी बाजार में 4,000 करोड़ रुपये का पुनर्विकास कार्य करा रहे हैं। मोदी ऐसे तीसरे व्यक्ति हैं लेकिन कानून की मदद से और धनराशि वितरित करके ऐसा करने वाले वह पहले व्यक्ति भी हैं।

हम धर्मनिरपेक्षता को लेकर उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल उठाते हैं और सबका साथ, सबका विकास नारे के खोखलेपन को भी उजागर करते हैं लेकिन हमें यह मानना होगा कि उन्होंने हिंदुत्व की सामाजिक रूढि़वादिता को चुनौती भी दी है। स्वच्छ भारत और खुले में शौच से मुक्ति का अभियान इसके दो पहलू हैं। एक अन्य बात जिसे भुला दिया गया वह है गुजरात में सार्वजनिक स्थान का अतिक्रमण कर रहे मंदिरों को हटाया जाना। इसके चलते उन्हें विश्व हिंदू परिषद का दुश्मन बनना पड़ा। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनाकर वह वाराणसी के रूढि़वादी ब्राह्मणवाद से पंगा ले रहे हैं। कई ज्ञानी और प्रसिद्ध व्यक्तियों ने वाराणसी के बारे में यादगार बातें कही हैं। उनमें सबसे अधिक शायद मार्क ट्वेन को उद्धृत किया गया है जिन्होंने कहा था, 'बनारस इतिहास से भी पुराना, परंपराओं से भी पुराना और यहां तक कि किवदंतियों से भी पुराना है। अगर इन सबको मिला भी दिया जाए तो भी यह इन सबसे करीब दोगुना पुराना है।'

प्रश्न यह है कि क्या इसे उतना ही गंदा और उलझाऊ बना रहने दिया जाए? यकीनन हिंदुत्व को अपने पवित्रतम और सबसे पुराने शहर के लिए बेहतर हालात की आवश्यकता है। ट्वेन मंदिर की दीवारों के इर्दगिर्द उभरे नए खालीपन से चकित रह जाते। यह बदलाव की जुबान है। 

कुछ ही लोगों को संशय होगा कि मोदी वाराणसी से दोबारा जीतेंगे या नहीं। 23 मई को हमें यह भी अंदाजा लग जाएगा कि मोदी ने उन हजारों पंडितों के वोट गंवाए या नहीं। अगर वह एक वर्ष में परियोजना पूरी कर लेते हैं तो यह उनके देश भर के हिंदू समर्थकों के बीच बड़ी करामात हो सकती है। मैं यह कहते हुए प्रसन्न हूं कि मुझे इस परियोजना ने उत्साहित किया है। यह अन्य पुराने शहरों के सामने बहुत बड़ी नजीर होगी। आशा की जा सकती है कि इस तर्ज पर पुरानी दिल्ली के पैदल चलने वालों के लिए यह परियोजना उस क्षेत्र की पुरानी शान बहाल कर सकती है। अगर मोदी हिंदू हृदय सम्राट के रूप में इसी तरह प्रगति करते रहे तो बेहतर होगा कि उनकी छवि मध्यकालीन मस्जिदों को ढहाने के बजाय प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार करके मजबूत हो।
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