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एमएसएमई को उधारी से परहेज कर रहे बैंक

नम्रता आचार्य / कोलकाता May 12, 2019

उधारी को बढ़ावा देने के कई प्रयासों के बावजूद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) को ऋण देने से परहेज कर रहे हैं। एमएसएमई कंपनियों के मालिकों का कहना है कि बैंकों से कर्ज जुटाना पिछले कुछ वर्षों में काफी कठिन हो गया है। कई रिपोर्टों में यह भी संकेत दिया गया है कि पीएसबी उधारी में कमी आई है। 

उदाहरण के लिए, ट्रांसयूनियन सिबिल के आंकड़े के अनुसार, दिसंबर 2013 और दिसंबर 2018 के बीच, एमएसएमई के लिए पीएसबी उधारी की भागीदारी 19 प्रतिशत तक घटकर 39 प्रतिशत रह गई। समान समय में, निजी बैंकों की भागीदारी 10 प्रतिशत तक बढ़ी और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की उधारी में समान अवधि में 8 प्रतिशत तक की तेजी आई।

ओमिडयार नेटवर्क और बोस्टन कंसल्टिंग गु्रप की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, एमएसएमई के लिए 40 प्रतिशत उधारी अनौपचारिक स्रोतों के जरिये पूरी की जाती है, लेकिन इसकी ब्याज दर औपचारिक बाजार की तुलना में दोगुनी होती है।एसएमई चैम्बर ऑफ इंडिया के संस्थापक एवं अध्यक्ष चंद्रकांत सालुंखे का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में बड़ी तादाद में छोटी निर्माण कंपनियों के बंद होने की एक वजह बैंक ऋण का अभाव थी। सालुंखे का कहना है कि अन्य दो वजह नोटबंदी और जीएसटी रहीं। चैम्बर से प्राप्त आंकड़ों से संकेत मिलता है कि नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद से लगभग 10 लाख निर्माण इकाइयां बंद हुईं।

ऑल इंडिया एमएसएमई एसोसिएशन में बैंकिंग एवं फाइनैंस कमेटी के चेयरमैन सुरेश सुब्रमण्यनम का कहना है कि कई पीएसबी पिछले कुछ वर्षों से त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई (पीसीए) के दायरे में बने हुए हैं, एमएसएमई के लिए ऋण उपलब्धता प्रभावित हुई है और साहूकारों पर एमएसएमई की निर्भरता बढ़ी है। इसके परिणामस्वरूप, एमएसएमई के लिए कोष की लागत भी बढ़ी है।

सुब्रमण्यन का कहना है कि जहां एमएसएमई को बैंक उधारी के लिए कोष की औसत लागत 12 प्रतिशत और 15 प्रतिशत के बीच है, वहीं एनबीएफसी से यह 18 प्रतिशत, और साहूकारों से 24 प्रतिशत तक है। जनवरी 2019 में आरबीआई ने चूक की स्थिति में एमएसएमई के लिए 25 करोड़ रुपये तक के मौजूदा ऋणों के एकबारगी पुनर्गठन की अनुमति देने का निर्णय लिया था। हालांकि एमएसएमई के अनुसार ज्यादातर बैंकों ने पुनर्गठन में दिलचस्पी नहीं दिखाई।

बैकों से एमएसएमई के लिए कमजोर ऋण उपलब्धता का हाल के समय में एमएसमएई ऋणों में बढ़ते एनपीए स्तर का सीधा संबंध रहा है। ट्रांसयूनियन सिबिल की एक रिपोर्ट के अनुसार जहां एमएसएमई के लिए बकाया ऋण 2013 के 10.4 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2018 के अंत में 25.2 लाख करोड़ रुपये हो गए, वहीं इस सेक्टर में समेकित एनपीए भी 2013 और 2018 के बीच 7.3 प्रतिशत से बढ़कर 9 प्रतिशत पर पहुंच गया। 

यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी ए के प्रधान ने कहा, 'एमएसएमई सेक्टर में मौजूदा एनपीए स्तर लगभग दो अंक में है, जो एमएसएमई उधारी के लिहाज से अच्छा नहीं है।'

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