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समाचारपत्रों की लोकप्रियता और विश्वसनीयता बरकरार

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  May 10, 2019

सबसे पहले अच्छी खबर। वर्ष 2019 की पहली तिमाही में 42.5 करोड़ से भी ज्यादा हिंदुस्तानियों ने समाचार पत्र पढ़े। यह तादाद वर्ष 2017 की पहली तिमाही के 40.7 करोड़ लोगों से अधिक है। यह आंकड़े इंडियन रीडरशिप सर्वे (आईआरएस) 2019 ने अप्रैल के पहले सप्ताह में जारी किए। दुनिया के अधिकांश बाजारों के उलट भारत में समाचार पत्रों के पाठकों की तादाद और उनका प्रसार बीते दशक में लगातार बढ़ा है। वर्ष 2016 के अंत तक अगर ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन के 10 वर्ष के आंकड़ों का अध्ययन किया जाए तो औसत प्रसार 4.87 फीसदी बढ़कर 6.3 करोड़ के स्तर तक पहुंच गया। प्रिंट मीडिया 1,67,400 करोड़ रुपये के कारोबार वाले मीडिया और मनोरंजन उद्योग का सबसे अधिक मुनाफे वाला क्षेत्र बना रहा। 

 
प्रश्न यह है कि बीते तीन वर्ष से उसका राजस्व ठहरा हुआ क्यों है? यहां पर अवश्य चिंतित होने की बात है। वर्ष 2018 तक के 10 वर्ष में मीडिया के कुल राजस्व में प्रिंट की हिस्सेदारी 30 फीसदी से घटकर 18 फीसदी से थोड़ी ज्यादा रह गई है। चूंकि इसका आधार बढ़ रहा था इसलिए वास्तव में देखें तो प्रिंट मीडिया का आकार करीब दोगुना हो गया। परंतु इन 10 वर्षों में से बीते तीन वर्ष वास्तव में कठिन रहे। आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2016 के 30,330 करोड़ रुपये (विज्ञापन एवं सब्सक्रिप्शन ) से बढ़कर समाचार पत्रों और पत्रिकाओं का राजस्व 2018 तक केवल 30,550 करोड़ रुपये तक ही पहुंचा। दिलचस्प बात यह है कि इसकी वजह इंटरनेट कतई नहीं रहा है। बल्कि इसके लिए काफी हद तक यह उद्योग स्वयं जिम्मेदार रहा। 
 
सबसे बड़ी जिम्मेदारी पाठकों की संख्या पर आती है। समाचार पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञापनों के लिए निर्धारित स्थान, इस उद्योग के 70 फीसदी राजस्व के लिए उत्तरदायी होता है। वर्ष 2013 से 2017 तक चार वर्ष की अवधि में प्रकाशकों ने जमकर कमाई की और उसके बाद वे इस राजस्व लक्ष्य को हासिल करने की जद्दोजहद में लगे रहे। उस दौर में आंकड़ों की इस कदर उपलब्धता नहीं थी और विज्ञापनदाताओं ने अपनी राशि अन्य मीडिया माध्यमों में व्यय करनी शुरू कर दी। इसमें डिजिटल मीडिया भी शामिल है। नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर के प्रिंट मीडिया उद्योग पर बुरे असर के बावजूद यह सिलसिला जारी रहा। रिलायंस ने जियो की शुरुआत की और डेटा कीमतें औंधे मुंह गिर पड़ी। इस कारण डेटा खपत में इजाफा हुआ। वर्ष 2016 में जहां प्रति व्यक्ति प्रति माह 0.8 जीबी डेटा खपत होती थी वहीं 2018 में यह बढ़कर 8 जीबी प्रति व्यक्ति प्रति माह हो गई। 
 
इसे दूसरी तरह से देखें तो एक फिल्म एक जीबी डेटा लेती है। यानी करीब 5.5 करोड़ भारतीय ब्रॉडबैंड उपभोक्ता हर महीने कम से कम 8 फिल्म डाउनलोड करने के बराबर डेटा इस्तेमाल करते हैं। डाउनलोड की जाने वाली सामग्री में फिल्म, टीवी शो, खेल या समाचार के कार्यक्रम कुछ भी हो सकती है। कुछ ओटीटी या वीडियो स्ट्रीमिंग ऐप के पास फिलहाल 10 से 20 करोड़ उपभोक्ता हैं। अब उपभोक्ताओं के पास ध्यान बांटने के लिए 2013 की तुलना में कहीं अधिक उपाय मौजूद हैं।  वर्ष 2018 में जब सबको स्वीकार्य आईआरएस आंकड़े सामने आए तब तक संभवत: बहुत अधिक देर हो चुकी थी। विज्ञापनों से मिलने वाले राजस्व में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। विज्ञापन से जुड़े लोगों का कहना है कि इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि आईआरएस कुल पाठक संख्या की बात करता है बजाय कि औसत पाठक संख्या के। औसत पाठक संख्या में बहुत अधिक इजाफा नहीं हुआ है। विज्ञापनदाता अभी भी औसत पाठक संख्या के आधार पर ही विज्ञापन के लिए स्थान खरीदते हैं।
 
आप यह दलील दे सकते हैं कि विज्ञापनदाता काफी हद तक ऐसे मानक इस्तेमाल करने में रुचि रखते हैं जिनके चलते कम दर पर विज्ञापन दिए जा सकें। फिर चाहे मामला टेलीविजन पर प्रति रेटिंग प्वाइंट लागत की हो या प्रिंट में एआईआर की। इसके अलावा एआईआर सभी विज्ञापनदाताओं के लिए काम नहीं करता। लंबी अवधि के दौरान ब्रांड तैयार करने के लक्ष्य की दृष्टि से समग्र पाठक संख्या बेहतर विकल्प है। अधिकांश प्रकाशक और विज्ञापनदाता इस बात से परिचित होते हैं। मानक के नहीं होने से उनको यह अवसर मिल जाता है कि वे दरों को कम रखें। वे ऐसा चाहते भी हैं।
 
कुल पाठक संख्या में हो रहा इजाफा और ऑनलाइन में आ रही उछाल उम्मीद बंधाती है। आईआरएस 2019 के अनुसार करीब 5.4 करोड़ लोग ऑनलाइन समाचार पत्र पढ़ते हैं। कॉमस्कोर जो डिजिटल मीडिया पर ध्यान केंद्रित करता है, उसके मुताबिक करीब 27.9 करोड़ लोग ऑनलाइन समाचार पत्र पढ़ते हैं। देश के शीर्ष 20 ऑनलाइन प्रकाशकों में से 11 मुख्य धारा के मीडिया संस्थान हैं। उदाहरण के लिए टाइम्स इंटरनेट, एचटी मीडिया, इंडिया टुडे समूह और इंडियन एक्सप्रेस समूह आदि। प्रकाशक डिजिटल माध्यम पर बहुत अधिक ध्यान दे रहे हैं। मैंने हाल ही में ऑनलाइन राजस्व और मुनाफे के आंकड़ों का विश्लेषण किया और ये दोनों ही काफी बेहतर नजर आए। डिजिटल क्षेत्र के सब्सक्रिप्शन के शुरुआती रुझान भी बहुत उत्साहित करने वाले हैं। 
 
ऑनलाइन और ऑफलाइन पाठकों की तादाद में हो रहे इजाफे से राजस्व में भी बढ़ोतरी होनी चाहिए, खासतौर पर इस चुनावी वर्ष में। ऐसे में राजस्व वृद्घि दोबारा 7 से 9 फीसदी के स्तर पर वापस आ सकती है।   उम्मीद की जा सकती है कि आईआरएस 2020 समाचार पत्रों के कारोबार के लिए और बेहतर साबित होगा। 
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