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हकीकत से दूर

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  May 10, 2019

देश के सबसे बड़े और कटुता से भरे हुए आम चुनाव अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहे हैं। अधिकांश लोगों ने यह उम्मीद की होगी कि इन अंतिम कुछ सप्ताह में मतदाताओं के समक्ष नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल की उपलब्धियां प्रस्तुत की जाएंगी, भविष्य को लेकर उसके वादे सामने रखे जाएंगे और विपक्ष अपनी ओर से विकल्प की पेशकश करेगा। प्रचार अभियान की शुरुआत इसी तर्ज पर हुई। भाजपा ने 'नामुमकिन अब मुमकिन है' का नारा दिया। राहुल गांधी ने न्याय योजना प्रस्तुत की और मजबूत सरकार और गठबंधन सरकार के संभावित लाभ और हानि पर चर्चा हुई। परंतु ऐसा लगता है कि कम ही लोगों ने न्याय के बारे में सुना है जबकि विपक्ष एकजुट नजर आ रहा है। भाजपा को संभवत: यह अहसास हुआ कि उसका विकास संबंधी प्रदर्शन उतना उत्साहजनक नहीं है। उसने पुलवामा हमले और बालाकोट में की गई बदले की कार्रवाई को एजेंडा बनाया और पूरी बहस राष्ट्रीय सुरक्षा की ओर मोड़ दी। यही वह वक्त था जब हकीकत और प्रचार अभियान में अंतर पैदा होने लगा। मोदी की खासियत है कि वह अपनी कमजोरियों को खूबी में बदल देते हैं। यह देखने को भी मिला। चौकीदार सेना पर आतंकी हमले को लेकर मिल रही खुफिया विभाग की चेतावनियों पर कार्रवाई करने में नाकाम रहा, एक लड़ाकू विमान को मार गिराने से शर्मिंदगी झेलनी पड़ी, इससे भी बुरी बात कि एक हेलीकॉप्टर अपने ही हमले में मार गिराया गया, यह सच सामने आया कि भारतीय वायुसेना की तुलना में अत्यंत मामूली बजट से संचालित पाकिस्तानी वायुसेना के पास बेहतर लड़ाकू विमान और बेहतर मिसाइलें तो हैं ही, उसका संचार लिंक भी हमसे अधिक सुरक्षित है। इन तमाम असहज करने वाली हकीकतों को एक तेजतर्रार अभियान के नीचे दबा दिया गया। यह अभियान दो बातों पर केंद्रित था: बालाकोट हमला और मसूद अजहर को आतंकी घोषित करवाना। कांग्रेस ने बहुत देर से यह घोषणा शुरू की कि उसने भी सर्जिकल स्ट्राइक समेत अन्य सफलताएं हासिल की हैं लेकिन वह हमेशा की तरह डरपोक साबित कर दी गई। 

 
राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को एक अन्य दिलचस्प मोड़ देते हुए कहा गया कि इस बात का खतरा है कि देशद्रोहियों का 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' देश को तोड़ सकता है। राष्ट्रवादियों को अपने मुल्क की ताकत में कहीं ज्यादा भरोसा होना चाहिए था। अगर कोई खतरा है भी तो इससे निपटने की सरकार की नीति क्या है? नक्सल प्रभावित इलाकों और जम्मू और कश्मीर में हिंसा का बढ़ता स्तर नीतिगत नाकामी को दर्शाता है। चीन की ओर से सुरक्षा को जो चुनौती मिल रही है, उसका उल्लेख तक नहीं है जबकि चीन हमारे पड़ोस में पहुंच रहा है। अब पूरी चर्चा हास्यास्पद स्तर तक गिर चुकी है। एक ऐसे प्रधानमंत्री पर आरोप लगाए जा रहे हैं जिसका निधन हुए चौथाई सदी बीत चुकी है। इससे पहले एक ऐसे प्रधानमंत्री के कदमों पर सवाल उठाया जा रहा था जो 50 वर्ष से भी अधिक पहले गुजर गए। नेहरू और राजीव गांधी की जो भी गलतियां या चूक रही हों, क्या वे 2019 के चुनाव में मुद्दा हैं या फिर यह जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश है? 
 
यह ध्यान रहे कि भाजपा ने अर्थव्यवस्था की बात ही नहीं की है। बार-बार यही इल्जाम लगाया जाता रहा है कि मोदी के आने से पहले के 70 वर्ष में कोई विकास नहीं हुआ। कांग्रेस निष्प्रभावी तरीके से वृद्घि में धीमापन आने, निर्यात में ठहराव और निवेश में कमी का जिक्र करती है। आंकड़ों से छेड़छाड़ का मसला भी हाल में उठा है। रोजगार और ग्रामीण संकट को लेकर काफी कुछ कहा गया लेकिन मोदी ने अब तक इस पर प्रतिक्रिया नहीं दी है।  ये बातें मतदाताओं के लिए कितनी अहम हैं? दलगत राजनीति में लोग ऐसे तथ्य चुनते हैं जो उनके पूर्वग्रह या उनकी मान्यता पर सटीक बैठते हों, खासकर तब जब एक मजबूत नेता सामने हो। लाखों लोगों के लिए मोदी का प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ भले नहीं हो लेकिन वह उपलब्ध विकल्पों में सबसे बेहतर हैं। या कहें लोगों को उनका हिंदूवादी राष्ट्रवाद रास आया है। इस बीच मोदी ने एक बार फिर यह दर्शाया है कि कैसे वह अपने आलोचकों की बाजी पलट सकते हैं। उन्होंने उन अपशब्दों का जिक्र किया जो बीते सालों के दौरान उन्हें कहे गए। उन्होंने तंज भरे लहजे में राहुल गांधी की 'लव डिक्शनरी' का जिक्र किया। इस अभियान के दौरान एक बात स्पष्ट हो गई कि मोदी किसी भी विकेट पर बल्लेबाजी कर सकते हैं और गेंद को सीमारेखा के पार पहुंचा सकते हैं। इस काम में वे तथ्यों का चुनिंदा इस्तेमाल करते हैं, भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं और आलंकारिक शैली में नामदार और कामदार का जिक्र करते हैं। 
 
चुनाव विश्लेषकों का कहना है कि उनकी पार्टी बहुमत गंवा सकती है और उनके दोबारा प्रधानमंत्री बनने की संभावना कम होगी। अगर ऐसा हुआ तो यह विपक्ष के कारण कम और उनकी वजह से अधिक होगा क्योंकि पांच साल तक छवि निर्माण, आक्रामक सोशल मीडिया ट्रोलिंग और नाटकीय अंदाज में लोगों का ध्यान आकर्षित करने के बावजूद हिंदी प्रदेश के मतदाता उनके प्रदर्शन से निराश हैं। 
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, congress,,
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