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अवास्तविक दर

संपादकीय /  May 09, 2019

केंद्रीय वित्त मंत्रालय और श्रम एवं रोजगार मंत्रालय इन दिनों कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के वित्त को लेकर एक बार फिर आमने-सामने हैं। ईपीएफओ दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक सुरक्षा संस्थानों में से एक है। इसमें 17 करोड़ से अधिक खाते और 6 करोड़ से अधिक सक्रिय सदस्य हैं। इस वर्ष फरवरी में ईपीएफओ की सर्वोच्च निर्णय संस्था यानी उसके न्यासियों के केंद्रीय बोर्ड ने यह तय किया था कि वर्ष 2018-19 के लिए ईपीएफओ 8.65 फीसदी ब्याज देगा। यह वर्ष 2017-18 के 8.55 फीसदी ब्याज से अधिक है। यह दर अन्य पेंशन योजनाओं मसलन सार्वजनिक भविष्य निधि आदि से अधिक है। परंतु वित्त मंत्रालय ने अब ईपीएफओ से अधिशेष फंड की वास्तविक स्थिति के बारे में प्रश्न पूछे हैं। निश्चित तौर पर ब्याज दरों पर कोई भी निर्णय सीधे-सीधे अधिशेष को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए ऐसी रिपोर्ट हैं कि 8.65 फीसदी ब्याज दर के साथ अनुमानित अधिशेष 152 करोड़ रुपये होगा, परंतु यदि ईपीएफओ ब्याज दरों को 8.55 फीसदी के स्तर पर अपरिवर्तित रखता है तो अधिशेष राशि करीब 771 करोड़ रुपये रहेगी। 

 
वित्त मंत्रालय ईपीएफओ की वास्तविक वित्तीय स्थिति को लेकर भी काफी चिंतित है। गत सप्ताह उसने श्रम मंत्रालय से पूछा था कि क्या ईपीएफओ के पास इतना धन है कि वह वर्ष 2018-19 के लिए बढ़ी ब्याज दर चुका सके। यह प्रश्न उठाया गया था कि आखिर क्यों, 'अधिशेष' (ईपीएफओ के पिछले वर्ष ब्याज को चुकाने के बाद बची राशि) को केवल अनुमानित बताया गया है न कि वास्तविक। एक बात मामले को और अधिक जटिल बनाती है और वह ये कि ईपीएफओ ने ऐसी फर्मों में निवेश किया है जो आगे चलकर फंसी हुई या कर्जदार साबित हो सकती हैं। इसका एक उदाहरण इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) की प्रतिभूतियों के रूप में लिया गया जोखिम भी है। फरवरी में संसद के समक्ष प्रस्तुत श्रम मामलों की स्थायी समिति की 57वीं रिपोर्ट के मुताबिक आईएलऐंडएफएस में ईपीएफओ का अनुमानित निवेश 575 करोड़ रुपये था। उस वक्त स्थायी समिति ने श्रम मंत्रालय को सचेत किया था कि अगर यह निवेश फंसा तो ईपीएफओ के लाभार्थियों को नुकसान उठाना होगा। सच तो यह है कि अगर नुकसान की भरपाई ईपीएफओ के अधिशेष से नहीं होती है तो वित्त मंत्रालय को दखल देकर कमी की भरपाई करनी होगी। 
 
ऐसे में वित्त मंत्रालय का श्रम मंत्रालय से स्पष्टीकरण मांगना सही है और ईपीएफओ को जवाब देना चाहिए। परंतु बड़ा मुद्दा यह है कि क्या ईपीएफओ उस दर पर ब्याज देना जारी रख सकता है जो बाजार के साथ तालमेल में नहीं है और अस्थायी भी है। ईपीएफओ जिस प्रकार अतीत में उच्च भुगतान करता आया है, वह अस्पष्ट रहा है और उसकी आय के अनुरूप भी नहीं रहा है। यह सिलसिला जारी नहीं रह सकता। दूसरा मुद्दा यह है कि क्या ईपीएफओ के पास यह प्रबंधन क्षमता है कि वह इतनी अधिक धनराशि का प्रबंधन कर सके। ईपीएफओ के फंड का करीब आधा फिलहाल केंद्र और राज्य सरकारों की प्रतिभूतियों में निवेश किया हुआ है। अगर इसे परिपक्वता तक बरकरार रखा जाए तो यह अपेक्षाकृत सुरक्षित है। शेष राशि बैंक डेट, वित्तीय संस्थानों और कॉर्पोरेट संस्थानों में निवेश की गई है। एक छोटा हिस्सा एक्सचेंज ट्रेडेड फंड की सहायता से प्रतिभूतियों में निवेश किया गया है। इसके लिए पेशेवर फंड प्रबंधकों की आवश्यकता है जिनमें तमाम जोखिम भरे परिसंपत्ति वर्ग में भारी पूंजी निवेश करने की क्षमता हो। यह निवेश इस प्रकार होना चाहिए कि जोखिम कम से कम हो और प्रतिफल अधिक से अधिक। मौजूदा दौर बाजार में अस्थिरता का है। ऐसे में यह कमी ईपीएफओ को भारी पड़ सकती है। 
Keyword: EPFO, ETF, pension,,
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