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दक्षिण में भी बनाया जा सकता है ग्रीष्म अवकाश का पीठ

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  May 08, 2019

अगले हफ्ते उच्चतम न्यायालय ग्रीष्मकालीन अवकाश के चलते करीब दो महीने के लिए बंद हो जाएगा। हालांकि इस दौरान तात्कालिक महत्त्व के मामलों की सुनवाई और पुराने मामलों के निपटारे के लिए एक-एक पीठ सक्रिय बने रहेंगे। कानून के लिए यह एक नासमझी भरा वक्त है। अब वक्त आ गया है कि गर्मियों में लंबे समय के लिए नियमित न्यायिक कार्यवाही बंद रखने की औपनिवेशिक काल से चली आ रही परंपरा की समीक्षा की जाए। जब यह परिपाटी शुरू हुई थी उस समय तपती गर्मी से बेहाल हुक्मरान दिल्ली छोड़कर दो महीने के लिए पहाड़ों या अपने पैतृक स्थानों की सैर पर चले जाया करते थे। उन दिनों न तो एयर कंडीशनर होते थे और न ही इंटरनेट, ई-लाइब्रेरी, ई-फाइलिंग या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की ही सुविधा मौजूद थी। लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। ऐसे में इतनी लंबी छुट्टियों को सही ठहराने वाले तर्क बहुत कम रह गए हैं। अब लाइब्रेरी इंटरनेट पर ही उपलब्ध है और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की लाइब्रेरी को भी दुनिया में कहीं से देखा जा सकता है। किताबों के ग_र को दूसरे शहरों में ले जाने की जरूरत नहीं रह गई है और इसकी अदालत या वादियों पर कोई लागत भी नहीं आती है। वकील अक्सर अपने सामने लैपटॉप रखकर बहस करते हैं। कुछ अदालतें तो अब बिना कागज वाली ई-कोर्ट हो चुकी हैं। लिहाजा प्रायोगिक तौर पर गर्मियों के दौरान उच्चतम न्यायालय की कार्यवाही को बेंगलूरु जैसे खुशनुमा परिवेश वाले शहर में स्थानांतरित किया जा सकता है। 

 
हाल में सर्वोच्च न्यायालय के इर्दगिर्द 'फिक्सरों' एवं पावर ब्रोकरों के सक्रिय होने के आरोप लगने के बाद ऐसे स्थानांतरण की जरूरत और ज्यादा लगती है। राजधानी होने के नाते दिल्ली सत्ता का केंद्र है जहां अलग-अलग हित समूहों के लिए लॉबी करने वाले और अनुकूल फैसलों के लिए सत्ता के गलियारों में दलालों की मौजूदगी ही एक मुद्दा रहती है। दो साल पहले एक व्हिसल ब्लोअर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के पूर्व निदेशक के सरकारी आवास पर रखी लॉगबुक को उच्चतम न्यायालय के संज्ञान में लाया था। उस लॉगबुक से पता चला कि कुछ चलता-पुर्जा लोग वहां रात के समय अक्सर आते रहते थे। पिछले हफ्ते अदालत के आसपास की घटनाओं के बाद एक पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति का गठन अभी तक अटकलें मानी जा रही घटनाओं की पुष्टि करता हुआ ही लग रहा है।
 
अदालत ने खुद भी विधिक प्रक्रिया में भौगोलिक दूरियों को कमतर करता आया है। पिछले हफ्ते उसने नाइजीरिया में रहने वाले एक गवाह को राजस्थान के चुरु की एक सत्र अदालत में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये पेश होने की इजाजत दी है। पहले भी एक भारतीय अदालत ने अमेरिका में रह रहे एक व्यक्ति तक पहुंचने के लिए ऐसा ही आदेश दिया था। बिहार में खतरनाक कैदियों की आपराधिक अदालतों में पेशी के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का सहारा लिया जाता है। इसका मतलब है कि अकेले दिल्ली में ही कानूनी कार्यवाहियां नहीं चलती हैं।
 
फिर भी उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश दिल्ली के बाहर पीठों के गठन को लेकर लगातार आपत्तियां जताते रहे हैं। उनकी मुख्य आपत्ति यह होती है कि इससे संवैधानिक अदालत की एकल प्रकृति प्रभावित होगी और सर्वोच्च न्यायिक संस्थान की संपूर्णता भी कम होगी। लेकिन आज के इलेक्ट्रॉनिक युग में यह दलील भी कमजोर हो चुकी है क्योंकि शोध समेत न्यायिक कार्यों का बड़ा हिस्सा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के हवाले किया जा सकता है। अगल-बगल के 14 अदालती कक्षों से विरोधाभासी फैसले आने से न्यायाधीशों का रुख भी थोड़ा विडंबनापूर्ण हो जाता है और सैकड़ों मामले बड़े पीठों को भेजे जाते हैं। किसी भी सूरत में अदालत की संपूर्णता पर इससे कोई असर नहीं पड़ेगा अगर एक अवकाशकालीन पीठ दो महीनों के लिए दक्षिण भारत में काम करता है।
 
एक-दो न्यायाधीशों से बनने वाला अवकाशकालीन पीठ तात्कालिक महत्त्व के मामले सीमित संख्या में ही सुनता है। ऐसे पीठ हफ्ते में एक या दो दिन ही बैठते हैं लेकिन अब इनकी संख्या थोड़ी बढ़ी है। उनके सामने लंच तक करीब 30 नई याचिकाएं सूचीबद्ध होती हैं। उनमें से आधी याचिकाओं को तो पीठ 'अत्यावश्यक नहीं' कहते हुए सिरे से खारिज कर देते हैं। पीठ मुख्य रूप से अंतरिम आदेश पारित करता है। इस ग्रीष्मकालीन गतिविधि को किसी दूसरे शहर में भी अंजाम दिया जा सकता है। आगे चलकर इन पीठों को स्थायी पीठ या सर्किट पीठों केे रूप में भी तब्दील किया जा सकता है। इससे दक्षिणी राज्यों को होने वाली असुविधा भी कम होगी।
 
उच्चतम न्यायालय ने कम-से-कम आठ विधि आयोगों और एक संसदीय समिति की रिपोर्ट पर अब तक निष्ठुर रवैया अपनाया है जिनमें देश के दूसरे हिस्सों में भी पीठें बनाने की अनुशंसा की गई हैं। मुख्य न्यायाधीश ने वर्ष 2015 में दायर उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें सर्वोच्च न्यायालय से संविधान के अनुच्छेद 130 के तहत दूसरे शहरों में पीठों के गठन की मांग की गई थी। दक्षिण भारत के उस याची से मुख्य न्यायाधीश ने कहा था, 'इस प्रावधान का इस्तेमाल फिर कभी किया जा सकता है। अभी नहीं।' ऐसे अडिय़ल रवैये की वजह से याचियों को गलत फैसलों की भी मार और पीड़ा सहनी पड़ती है क्योंकि वे उच्च न्यायालयों के खिलाफ दिल्ली आकर अपील करने का भारी-भरकम खर्च नहीं वहन कर सकते हैं। कई स्वतंत्र अध्ययनों से यह बात साबित हो चुकी है कि दिल्ली के नजदीकी राज्यों से की जाने वाली अपीलों की संख्या सर्वाधिक होती है। वहीं पूर्वोत्तर के राज्यों से की जाने वाली अपीलें तुलनात्मक रूप से कम होती हैं। दिल्ली के सुल्तान को दिया सूफी संत का 'दिल्ली अभी दूर है' अभिशाप उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाने वाले आम लोगों पर बखूबी लागू होता है। 
Keyword: supreme court, justice,,
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