बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत के लिए साझा आर्थिक कार्यक्रम
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भारत के लिए साझा आर्थिक कार्यक्रम

रथिन रॉय /  May 08, 2019

यदि कोई भी राजनीतिक दल या गठबंधन देश की अर्थव्यवस्था में बदलाव को लेकर गंभीर है तो उसे कुछ बातों पर विचार करना चाहिए। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं रथिन रॉय 

 
विकास संबंधी बदलाव में कई मोर्चों पर परिवर्तन देखने को मिलता है। परंतु सत्य यह भी है कि बिना उच्च, स्थिर और समावेशी आर्थिक विकास के किसी भी तरह का परिवर्तन देखने को नहीं मिल सकता।  किसी भी राजनीतिक दल या गठबंधन का आर्थिक कार्यक्रम अगर देश में बदलाव लाने के प्रति गंभीर है तो उसमें चार आर्थिक लक्ष्य अवश्य शामिल होने चाहिए। इस लिहाज से मैं यहां एक साझा आर्थिक कार्यक्रम की पेशकश कर रहा हूं। 
 
जीडीपी के घटक में ढांचागत बदलाव 
 
जैसा कि मैंने पहले भी अपने स्तंभों में कहा है, भारत मध्य आय वर्ग के जाल की ओर बढ़ रहा है। अब तक देश की वृद्घि को शीर्ष 10 करोड़ लोगों की मांग पूरी करके बढ़ावा मिलता रहा है। यही कारण है कि बॉम्बे के आर्थिक प्रदर्शन संंबंधी संकेतक कारों की बिक्री, दोपहिया वाहनों की बिक्री, एयरकंडीशनर और महंगे मकानों आदि से संचालित होते रहे हैं। 120 करोड़ भारतीय जिन पोषक खाद्य पदार्थों, कपड़ों, सस्ते मकानों और सस्ती स्वास्थ्य सुविधाओं एवं शिक्षा आदि पर निर्भर रहते हैं, वे इनमें नहीं आते। अगर जीडीपी वृद्घि के घटक में इन वस्तुओं की हिस्सेदारी नहीं बढ़ती है तो हम मध्य आय वर्ग के जाल में उलझ जाएंगे। आर्थिक गतिविधियों के ये क्षेत्र हर भारतीय के जीवन से संबद्घ हैं। इन्हें ही देश की आर्थिक गतिविधि का प्राथमिक संकेतक होना चाहिए और सरकार को इन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।  एक अरब लोगों के लिए सब्सिडी और आय समर्थन की मदद से खपत में इतना अधिक इजाफा करना संभव नहीं नजर आता। कम से कम आधी आबादी को इतनी आय अर्जित करनी चाहिए कि वह ये सब चीजें उचित मूल्य पर खरीद सके। ऐसी स्थिति में अधिकतम 50 करोड़ लोगों को जीवन स्तर सुधारने के लिए सब्सिडी दी जा सकती है।  यही वह चाबी है जिससे रोजगार, समावेशन और स्थायी और निरंतर वृद्घि का रास्ता खुलेगा। 
 
वृद्घि में ढांचागत बदलाव 
 
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) तथा कुछ अन्य क्षेत्रों को छोड़ दें तो बढिय़ा आर्थिक वृद्धि दक्षिण और पश्चिम भारत में नजर आई है। उत्तर और पूर्वी भारत को बढ़ा लाभ उन प्रवासियों से हुआ जिन्होंने दक्षिण और पश्चिम भारत से धन प्रेषित किया। कुछ प्रवासियों को आईटी, वाहन निर्माण, हीरा कटिंग आदि आर्थिक अवसरों का लाभ मिला लेकिन इनमें से अधिकांश को कम वेतन वाले और असुरक्षित रोजगार से संतोष करना पड़ा। ये प्राय: विनिर्माण श्रमिक, घरेलू नौकर और अमीरों के सुरक्षा गार्ड आदि की नौकरियां हैं। उत्तर भारत और पूर्वी भारत में गुणवत्तापूर्ण रोजगार मुहैया कराने वाली गतिविधियों को बढ़ावा देना महत्त्वपूर्ण है।  तकनीकी और विरासती पिछड़ेपन का मुकाबला करने के लिए ऐसी आर्थिक नीति की आवश्यकता है जो रोजगार दिला सके और धीरे-धीरे ही सही क्षमताओं में इजाफा कर सके। यह बात उन पांच क्षेत्रों को महत्त्व देने की बात को भी रेखांकित करती है जिनका जिक्र हम ऊपर कर चुके हैं।
 
विश्वसनीय वृहद आर्थिक नीति 
 
इसमें दो राय नहीं कि हमारे देश में पिछले तीन दशक में आर्थिक नीति की विश्वसनीयता में काफी सुधार हुआ है। परंतु अभी भी अल्पावधि का सोच और रक्षात्मकता ही इसकी पहचान बनी हुई है।  मध्यम अवधि के आर्थिक नीति ढांचे की बात करें तो वह सक्षम बनाने वाला ऐसा कारक है जिसकी कमी से हम जूझ रहे हैं। ऐसा संभवत: इसलिए है कि यह जो अनुशासन थोपता है वह विवेक से निर्णय लेने की क्षमता कम करता है और तदर्थ तथा अल्पकालिक संस्कृति को कम करता है जबकि वरिष्ठ पदों पर बैठे लोग इसके आदी होते हैं। एक के बाद एक अनेक सरकारों ने राजकोषीय अनुशासन कायम करने की बात कही है। उन्होंने ऐसा करने की क्षमता भी दिखाई है लेकिन इसके साथ साथ उनके रुख में कई बार इच्छाशक्ति की कमी भी नजर आई है।
 
कर नीति को ऐसे अनुमानों पर आधारित करना होगा जिसके लिए राजनेता जवाबदेह होते हैं। लक्ष्य तय करके कर दरों से बार-बार छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। यह वृहद आर्थिक नीति के लिए अच्छा नहीं होता।  विनिवेश को केवल राजकोषीय कमी दूर करने की खातिर तदर्थ ढंग से नहीं जारी रखा जा सकता है। बजटीय और वित्तीय क्षेत्र की नीतियां ऐसी नहीं हो सकतीं कि प्राधिकार अल्पकालिक लाभ के लिए सरकारी क्षेत्र के साथ छेड़छाड़ करे। मौद्रिक नीति की बात करें तो मौद्रिक नीति के ढांचे में सुधार करने की भी गुंजाइश मौजूद है। मुद्रास्फीति के प्रति रुख को विशिष्ट बनाकर और ट्रेडऑफ के जरिए ऐसा किया जा सकता है।
 
बेहतर सरकार, कम विवेकाधिकार, अधिक नियम
 
हमारे देश में सरकारी व्यय की उत्पादकता कम है क्योंकि हमारे यहां राजकोषीय गुंजाइश भी सीमित है। सरकारी व्यय बढ़ाने की दलीलों में बहुत अधिक वजन नहीं है क्योंकि किफायत में कमी स्पष्ट है और सरकारी व्यय का प्रभाव कमतर रहा है। इससे निजात पाने के लिए तकनीक का प्रयोग करने के प्रयासों को सीमित सफलता मिली है क्योंकि इसकी मूल वजह को हल करने का प्रयास नहीं किया गया है। सरकारी मशीनरी की बात करें तो वह भी पुरानी हो चुकी है। सामंती और औपनिवेशिक परंपरा में नीतिगत हस्तक्षेप अभी भी नौकरशाही के विवेकाधिकार के लिए काफी कुछ छोड़ देते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि जनहित के अलावा अन्य कारणों से भी हस्तक्षेप किया जाता है।
 
कुछ अपवादों के साथ नौकरशाही समय पर नीतियां प्रस्तुत करने और नीतिगत कमियों को तीव्र गति से दूर करने में नाकाम रही है। मीडिया और इवेंट मैनेजमेंट का इस्तेमाल इसे छिपाने और जवाबदेही से बचने के लिए किया जा सकता है लेकिन इससे उत्पादकता की समस्या दूर नहीं होती। यह आवश्यक है कि सरकार नियम आधारित आर्थिक प्रशासन की प्रतिबद्धता जाहिर करे। इतना ही नहीं ऐसा कोई सामाजिक आर्थिक आंदोलन भी नहीं नजर आ रहा है जो सरकार को नियम आधारित आर्थिक शासन अपनाने को बाध्य कर सके।
 
यह काम सक्षम राजनीतिक नेतृत्व ही कर सकता है। लंबी अवधि के लाभ के लिए अल्पावधि के लाभ को त्यागने का साहस दिखाना होगा और यही देश की अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाने वाला साबित हो सकता है। मेरी दृष्टि में शासकीय आर्थिक प्रशासन में सुधार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जैसे हालात हैं, उस नजरिए से देखें तो किसी भी सफलता के लिए यह एक पूर्व शर्त की तरह है। एक कमजोर राज्य अच्छा प्रदर्शन करने में कामयाब नहीं हो सकता।  बिना सक्षम राष्ट्र के बदलाव लाना संभव नहीं है। आर्थिक कार्यक्रम के जरिए देश में बदलाव लाने की दिशा में काम करने वाली सरकार इन लक्ष्यों को प्राथमिकता में रखेगी न कि केवल अतीत की गलतियों में सुधार करेगी।
Keyword: india, economy, GDP,,
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