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इस चुनावी मौसम में काम की खबरें क्यों हैं नदारद

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  May 07, 2019

मैं जिस संगठन के साथ काम करती हूं, वह पर्यावरण एवं विकास पर केंद्रित पाक्षिक पत्रिका 'डाउन टु अर्थ' प्रकाशित करता है। इस पत्रिका के प्रकाशन का उद्देश्य पैसे कमाना नहीं है और न ही यह बाजार या वाणिज्य की पैदाइश है। यह हमारे आसपास की दुनिया, रोजमर्रा की जिंदगी और जीवन के बारे में जानकारी साझा करने का जरिया है ताकि हमें ऐसा ज्ञान हासिल हो जो हमें बदलाव लाने की शक्ति दे सके। जब हम कोई रिपोर्ट तैयार करते हैं तो हम अपना मिशन छिपाने की कोई कोशिश नहीं करते हैं लेकिन पत्रकार के रूप में हम जमीनी स्तर से आने वाली खबरों एवं घटनाओं को रिपोर्ट करने की दक्षता में तटस्थता कायम रखते हैं। हमारा आग्रह और राजनीति पूरी तरह मुक्त है, कॉर्पोरेट चमक-दमक के पर्दे में छिपी नहीं है। लेकिन हम दुनिया में जो बदलाव लाना चाहते हैं उन्हें अंजाम देने के बारे में हम खुलकर चुनौती देते हैं।

 
आज मैं आपसे आज के भारत और आज की दुनिया में डाउन टु अर्थ और ऐसे दूसरे प्रकाशनों की प्रासंगिकता के बारे में चर्चा करना चाहती हूं। आज की दुनिया दूसरों के दोष ढूंढने वाली है और पहले कभी भी इस तरह नीचे गिरने की होड़ नहीं देखी गई है। देशों का बदतर रूप देखने को मिल रहा है, लोगों का ध्रुवीकरण करने के लिए नेता जहर उगल रहे हैं। इस द्वेषपूर्ण विमर्श के गर्द एवं गुबार में असली मुद्दे गुम होते जा रहे हैं। इस बहस में हम केवल इसी हद तक स्वतंत्र नजर आते हैं कि अब पूरी तरह स्वतंत्र नहीं रह गए सोशल मीडिया में हम भी अपना गुबार निकाल सकें। ऐसा कोई सामाजिक शिष्टाचार नहीं है जो सार्वजनिक रूप से कहने लायक और न कहने लायक बातों के बीच रेखा खींच सके। 
 
ऐसी स्थिति में हमें खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या हम नाकाम हो चुके हैं? क्या हमें अब भी यह उम्मीद रखनी चाहिए कि हम सार्वजनिक मत में कोई बदलाव ला सकते हैं? मायने रखने वाले असली मुद्दों पर ध्यान बनाए रखने की क्या वाकई हम उम्मीद कर सकते हैं? मुझे लगता है कि हमें ऐसा जरूर करना चाहिए। मेरा इस पर भी यकीन है कि इस दुनिया में हम आज जो कुछ भी देख रहे हैं उन असली खबरों की सुगबुगाहट को भी चीख में बदलने के लिए कोशिश करना हमारा दायित्व और काम दोनों है। 
 
भारत में आम चुनावों की प्रक्रिया जारी रहने के बीच मैं इस बात को जोर देकर कह रही हूं। अगले कुछ दिनों में हमें एक नई सरकार मिलेगी या पुरानी सरकार को ही नया कार्यकाल मिल जाएगा। जो भी हो, सच यह है कि हमारे आज और आने वाले कल को प्रभावित करने वाले मसलों पर लिखने के लिए 'डाउन टु अर्थ' जैसी पत्रिकाओं का मौजूद होना जरूरी है। इस चुनाव में हमने देखा है कि लोगों के लिए मायने रखने वाले असली मुद्दे चर्चा से पूरी तरह बाहर हैं। मसलन, अजीबोगरीब मौसम लाकर फसलों को बरबाद करने वाला जलवायु परिवर्तन, इस चुनौती से निपटने में किसानों को राहत नहीं देने वाली बीमा कंपनियां, किसानों को उनकी मेहनत के बराबर उपज की कीमत न मिल पाना, आजीविका एवं स्वास्थ्य को नष्ट कर रहा प्रदूषण और देश के बड़े हिस्से में बनते सूखे के हालात जैसे मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। 
 
ऐसा लगता है कि कोई भी असली मुद्दा हमारी चिंता के केंद्र में ही नहीं रह गया है। असल में, इन मुद्दों को उठाने से लोगों को आकर्षित नहीं किया जा सकता है। सोशल मीडिया भी इन प्रवृत्तियों को नजरअंदाज करता है। नेता आज हमें यह यकीन दिलाना चाहते हैं कि वे क्षेत्र-विशेष के लिए अहम स्थानीय मुद्दों को भुलाकर भी चुनाव जीत सकते हैं। ऐसे में चुनाव भी जहरीले बयानों और ध्रुवीकृत समाज बनकर रह गए हैं। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि भले ही इस चुनावी मौसम में अहमियत रखने वाले ये मुद्दे सुर्खियों में नहीं आ रहे हैं लेकिन खबरों के शब्दों में ये सर्वव्यापी हैं। चुनाव के इस दौर में ही हमें जमीन से आने वाली आवाजें सुनने को मिलती हैं। सभी समाचारपत्र कृषि से लेकर कारखाने तक के जमीनी हालात का जायजा लेने के लिए अपने बेहतरीन संवाददाताओं को भेजते हैं। यह इकलौता समय है जब हम जनता का रुदन सुन पाते हैं और अगर आप गौर से पढ़ें तो आपको पता चलेगा कि रिपोर्ट-दर-रिपोर्ट, इलाका-दर-इलाका लोग यही कह रहे हैं कि उनकी जिंदगी के लिए मायने रखने वाले मुद्दे ही सबसे अहम हैं। रोजगार, आजीविका, पानी की कमी, सूखा, बेमौसम बरसात से फसलों का नुकसान और मुआवजे का अभाव, आवारा पशुओं की समस्या और जंगली जानवरों के हमले लोगों के लिए सबसे अहम मुद्दे हैं। कई रिपोर्टों में यह पढऩे को मिलेगा कि किस तरह रिहायशी बस्तियों के पास कचरे के ढेर बनते जा रहे हैं और स्थानीय कारखानों से होने वाले प्रदूषण के चलते आसपास के लोगों का जीना मुहाल हो चुका है या उन बस्तियों में साफ-सफाई या पानी निकासी का कोई इंतजाम ही नहीं है। 
 
लिहाजा 2019 के इस चुनाव में भले ही ये आवाजें कम सुनने को मिली हैं, लेकिन वे गुम नहीं होंगी। आजीविका और वजूद बचाए रखने के असली मुद्दे गायब नहीं होंगे। उन्हें न तो निगला जा सकता है और न ही बाहर फेंका जा सकता है। वे असली मुद्दे हैं। वे अहमियत रखते हैं। ऐसे में बदलाव के लिए काम करने वाले सभी लोगों के लिए इकलौता विकल्प यही है कि हाशिये पर धकेल दी गई खबरों को मुख्यधारा में लाना सुनिश्चित करें। दूसरा सवाल अधिक बुनियादी प्रकृति का है। समाज के अधिक ज्ञानपरक एवं सरकारों के अधिक असहिष्णु होते जाने के दौरान हम सूचना की तलाश किस तरह जारी रख पाते हैं? मुझे लगता है कि प्रासंगिक बने रहने के लिए हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम तथ्यों की विश्वसनीयता और स्थिति की स्वतंत्रता बनाए रखें। यह हमारी साझा चुनौती है जिसमें सफलता की मैं उम्मीद करती हूं।
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, congress,,
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