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फंसे हुए कर्ज के समाधान के दिलचस्प मामले

तमाल बंद्योपाध्याय /  May 07, 2019

इस हफ्ते कर्ज भुगतान में चूक करने वाली दो कंपनियों के दिवालिया समाधान के बारे में एनसीएलटी का फैसला आने की संभावना है। इससे अवगत करा रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय 

 
भारत के दिवालिया समाधान कानून के तहत गठित राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण (एनसीएलटी) अगले कुछ दिनों में 6,113 करोड़ रुपये के भारी-भरकम कर्ज से संबंधित दो मामलों का निपटारा कर सकता है। इन दोनों ही कंपनियों पर सबसे ज्यादा बकाया कर्ज भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) का है। पंजाब नैशनल बैंक, कैनरा बैंक और आंध्रा बैंक ने भी इन कंपनियों को अच्छा-खासा कर्ज दिया हुआ है। इन दोनों कंपनियों का नाम वाणिज्यिक बैंकों को भेजी 28 चूककर्ता कंपनियों की उस सूची में भी शामिल था जिन्हें भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने दिसंबर 2017 के अंत तक एनसीएलटी में ले जाने को कहा था। आरबीआई ने कहा था कि अगर दिसंबर 2017 के मध्य तक ये कंपनियां बकाया कर्ज का भुगतान नहीं करती हैं तो फिर उन्हें एनसीएलटी कार्यवाही का सामना करना होगा। आरबीआई ने जून 2017 में 12 बड़ी चूककर्ता कंपनियों की पहली सूची जारी की थी जिनके खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया तत्काल शुरू की जानी थी। उसके बाद आरबीआई ने अगस्त के अंत में संकटग्रस्त कंपनियों की दूसरी सूची भी सौंपी थी। ये ऐसे खाते थे जिनकी 60 फीसदी बकाया राशि को 30 जून 2017 तक बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्ति के तौर पर वर्गीकृत किया जा चुका था। इन दोनों सूचियों में शामिल कुल राशि भारतीय बैंकिंग प्रणाली में फंसे कर्जों का करीब आधा हिस्सा बन जाता है।
 
दिवालिया कानून के तहत किसी मामले का निपटान 180 दिन के भीतर करना होता है लेकिन उस सीमा को 270 दिन तक बढ़ाया जा सकता है। एनसीएलटी के मुंबई पीठ में उत्तम वैल्यू स्टील्स लिमिटेड और उत्तम गैल्वा मेटेलिक्स लिमिटेड कंपनियों के कर्ज समाधान की दो याचिकाओं को स्वीकृति दी थी। बैंकों को 270 दिनों की यह मियाद 3 अप्रैल को पूरी होने के बाद समाधान प्रक्रिया पूरी करने के लिए 20 दिन और मिले। एक बार चूककर्ता के चिह्निïत हो जाने के बाद ऋणदाताओं की समिति (सीओसी) समाधान प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए एक समाधान पेशेवर (आरपी) की नियुक्ति करता है। अगले चरण में एक सूचना ज्ञापन तैयार किया जाता है और संभावित बोलीकर्ताओं से अभिरुचि पत्र देने को कहा जाता है। बोलीकर्ताओं की योग्यता का परीक्षण करने के बाद उनकी बोलियों का मूल्यांकन किया जाता है और सबसे ऊंची बोली लगाने वाले की पहचान की जाती है और तब सीओसी इसकी जानकारी एनसीएलटी को देता है। इन दोनों कंपनियों के समाधान पेशेवर नियुक्त हुए राजीव चक्रवर्ती (पीडब्ल्यूसी के पार्टनर) को इसी हफ्ते एनसीएलटी से इस समाधान योजना पर स्वीकृति लेनी है। सवाल है कि समाधान योजना क्या है और निविदा में किसने बाजी मारी है? ये दोनों मामले एकल खिड़की वाली दिवालिया समाधान प्रक्रिया की प्रगति को रेखांकित करते हैं जिससे संकट में फंसी परिसंपत्तियों के समाधान की लागत एवं समय कम करने की संभावना होती है।
 
विजेता टीम में संकटग्रस्त परिसंपत्तियों में निवेश करने वाली फर्मों कारवाल इन्वेस्टर्स और नीतिया कैपिटल रिसोर्सेज एडवाइजर्स के नाम शामिल हैं। उनकी बोली में कहा गया है कि कारवाल आर्सिल ट्रस्ट एआरसी नाम से एक ट्रस्ट बनाएगा जिसका 15 फीसदी फिलहाल भारत की सबसे पुरानी परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी (इंडिया) लिमिटेड के पास है। इन संकटग्रस्त कंपनियों में उत्तम वैल्यू स्टील्स की महाराष्ट्र के वर्धा में हॉट-रोल्ड की उत्पादन क्षमता करीब 10 लाख टन है। इसके लिए वह उत्तम गैल्वा मैटेलिक्स से पिग आयरन खरीदती है।
 
कारवाल खाद्य एवं कृषि उत्पादों की दिग्गज कंपनी कारगिल की निवेश इकाई है। वर्ष 2010 में गठित नीतिया कैपिटल लंदन की एक निवेश कंपनी है जिसकी कुल हैसियत 1,000 पौंड है। वर्ष 2018 में उसने 2.76 लाख पौंड का घाटा उठाया था। विजेता बोलीकर्ताओं की तरफ से किए जाने वाले भुगतान के ढांचे एवं कार्यक्रम पर नजर डालते हैं। उन्होंने 2,541 करोड़ रुपये की बोली लगाई है जिसमें से 625 करोड़ रुपये अग्रिम दिए जाने हैं। कर्जदाताओं को एक रकम मिल जाएगी लेकिन ये दोनों कर्जदार कंपनियों को 15 फीसदी ब्याज पर कर्ज के रूप में दी जाएगी। बाकी 1,200 करोड़ रुपये पांच वर्षों के भीतर दोनों कंपनियों के आंतरिक स्रोतों से पूरी की जाएगी। बोलीकर्ताओं का महंगा कर्ज चुकाने के बाद क्या ये कंपनियां इतना कमा पाएंगी कि बैंकों का बकाया लौटा सकें?
 
इस पैकेज में 198 करोड़ रुपये की कम-से-कम तीन साल के लिए कारोबार प्राप्तियां और बकाया भी हैं। इसके अलावा 248 करोड़ रुपये आपूर्तिकर्ताओं को करीब दशक भर पहले अग्रिम भुगतान के तौर पर दिए गए हैं। ये आपूर्तिकर्ता प्रवर्तकों- लॉयड्स स्टील इंडस्ट्रीज और फ्रंटलाइन रॉल फॉम्र्स प्राइवेट लिमिटेड की समूह कंपनियां हैं। यह हिस्सा बैंकरों को किए जाने वाले भुगतान की योजना में शामिल है। अगर एक साल के भीतर बैंकों को यह रकम नहीं मिलती है तो उसे बट्टïे खाते डाल दिया जाएगा। कुछ व्यापार प्राप्तियां और अग्रिम कई वर्षों से लंबित हैं। आखिरकार 270 करोड़ रुपये राज्य सरकार से सब्सिडी के रूप में आएंगे। इस अनुदान की प्राप्ति को लेकर कई तरह की शर्तें जुड़ी हुई हैं।
 
परिचालक लेनदारों पर कंपनियों के 1,017 करोड़ रुपये बकाया हैं। उन्हें तीन करोड़ रुपये का उदार अंशदान का भी वादा किया गया है। बैंकों को 625 करोड़ रुपये का आश्वासन दिया गया है, 2,541 करोड़ रुपये का नहीं। ऐसे में बैंकों को करीब 90 फीसदी तक का नुकसान (हेयरकट) उठाना पड़ेगा जबकि पहले 60 फीसदी का अनुमान जताया गया था।  इस अंतिम बोली के पहले कई दावे एवं प्रतिदावे सामने आए थे। सिनर्जी मेटल्स ऐंड माइनिंग फंड्स, एआरटी स्पेशल सॉल्यूशन फाइनेंशेज और इन्वेस्टमेंट ऑपरच्युनिटीज प्राइवेट लिमिटेड के कंसोर्टियम ने 3,300 करोड़ रुपये का समाधान प्रस्ताव पेश किया था लेकिन उसे नकार दिया गया था। जेएसडब्ल्यू स्टील लिमिटेड और लिबर्टी हाउस ग्रुप ने भी बोली लगाने की मंशा जताई थी लेकिन उन्हें रोक दिया गया।
 
अब ये सवाल रह गए है:
 
करीब 10 अरब डॉलर की परिसंपत्ति का प्रबंधन करने वाली और तीन दशकों का अनुभव रखने वाली कारवाल ने महज 1000 पौंड परिसंपत्ति का प्रबंधन करने वाली नीतिया के साथ जोड़ी क्यों बनाई है?
 
क्या नीतिया ने कर्जदाता बैंकों को यह बताया कि उसके चेयरमैन जोहानस सिटार्ड ने अप्रैल में इस्तीफा दे दिया? आर्सेलरमित्तल के लक्ष्मी मित्तल के विश्वस्त सहयोगी सिटार्ड ने शायद समाधान योजना रखने के बाद इस्तीफा सौंपा है।
 
नीतिया कैपिटल के संस्थापक एवं सीईओ जय कृष्ण सराफ लंदन में रहते हैं। क्या वह 10 लाख टन क्षमता वाले स्टील संयंत्र को चला सकते हैं?
 
समाधान योजना में सबसे पहले निवेशकों का पुनर्भुगतान करने की बात कही गई है। इससे क्या बैंकों का बकाया लौटाने की कंपनियों की क्षमता प्रभावित नहीं होगी?
 
सबसे बड़ी लगाने वाले कंसोर्टियम को बेहतर पुनर्भुगतान प्रस्ताव रखने के बाद भी क्यों नकार दिया गया?
 
निविदा प्रक्रिया बंद होने के बाद भी नई बोलियां लेने से अनावश्यक देरी होती है और प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं। हालांकि इससे मूल्य आकलन में मदद मिलती है। मेरा मानना है कि बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया बैंक और कुछ अन्य इस समाधान प्रस्ताव से सहमत नहीं थे। इन दोनों कंपनियों का पूंजीकरण मूल्य करीब 1,350 करोड़ रुपये है जो समाधान प्रक्रिया के तहत बैंकों को दिए गए आश्वासन का करीब दोगुना है।
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्माल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA,,
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