बिजनेस स्टैंडर्ड - फिर छिड़ी कारोबारी जंग
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फिर छिड़ी कारोबारी जंग

संपादकीय /  May 07, 2019

अमेरिका और चीन के बीच कारोबारी जंग की आग फिर भड़क उठी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह चीन से होने वाले करीब 20,000 करोड़ डॉलर मूल्य के आयात पर शुल्क को दोगुने से भी अधिक बढ़ाकर 10 फीसदी से 25 फीसदी कर देंगे। इसके अतिरिक्त 32,500 करोड़ डॉलर मूल्य के अतिरिक्त आयात पर भी जल्दी ही शुल्क दर को बढ़ाकर 25 फीसदी किया जा सकता है। ट्रंप लंबे समय से कहते रहे हैं कि चीन से होने वाले आयात पर शुल्क दर बहुत कम है। उन्होंने ट्विटर पर एक बार फिर इस बात को दोहराते हुए कहा कि अब चीन को इन दरों के चलते अमेरिकी राजकोष में सैकड़ो करोड़ डॉलर की राशि जमा करनी पड़ रही है। हालांकि यह बात सही नहीं है। यह शुल्क, आयात करने वाली कंपनियों द्वारा सीमा पर चुकाया जाता है। अधिकांश आर्थिक अध्ययन बताते हैं कि इसका ज्यादातर बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं को बढ़ी हुई कीमत के रूप में चुकाना पड़ रहा है या फिर अमेरिकी कंपनियां अपना मार्जिन कम करके इसकी भरपाई कर रही हैं। अभी यह निश्चित नहीं है कि ट्रंप अपनी चुनौती पर आगे कार्रवाई करेंगे या नहीं।

 
यद्यपि बाजार का मानना है कि कि चीन-अमेरिका के बीच कारोबारी युद्ध जल्द समाप्त नहीं होने वाला है। उसने इसे लेकर नकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। बहुत संभव है कि यह बातचीत की शर्तें तय करने का ट्रंप का तरीका हो लेकिन भविष्य में विसंगति उत्पन्न होने की आशंका तो है। यह सही है कि अमेरिका में अब आम राजनीतिक समझ यही है कि चीन पर दबाव बनाया जाए ताकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर उसका रवैया बदले, खासतौर पर अमेरिकी कंपनियों की बौद्धिक संपदा की चोरी को लेकर हाल के दिनों में काफी चिंता जताई गई है। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि एक ओर जहां टैरिफ का इस्तेमाल अमेरिका के सहयोगी और साझेदार मुल्कों में लोकप्रिय नहीं है, वहीं कई देशों में इस बात पर व्यापक सहमति है कि व्यापारिक व्यवस्था को और अधिक बराबरी वाली बनाना होगा ताकि चीन इसका अनुचित लाभ न ले सके।
 
भारत के लिए यह जोखिम और अवसर दोनों साथ लाया है। अगर भारतीय निर्यातक चीन के गलत व्यवहार से प्रेरित तरीकों में उलझते रहे तो यह जोखिम की बात है। खेद की बात है कि भारत, जिसकी चीन के साथ कारोबार को लेकर अपनी अलग दिक्कतें हैं, उसने न तो अमेरिका को संतुष्ट किया है और न ही यूरोपीय संघ या जापान को। संभव है कि विकसित विश्व की ओर से ऐसा दबाव बने कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था के तहत मिल रहे लाभ की पेशकश खत्म कर दी जाए। भारत पर इसका नकारात्मक असर होगा, भले ही वह चीन से पांच गुना गरीब है। इस मसले को हल करने के लिए तत्काल व्यापारिक कूटनीति की आवश्यकता है। भारत को आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अमेरिका में बदलता माहौल भारतीय निर्यात को प्रभावित न करे। पहले ही प्राथमिकता की व्यवस्था समाप्ति की प्रक्रिया में है और एच-1बी वीजा पाना और भी कठिन हो गया है।
 
भारत को अपने यहां संरक्षणवादी उपायों को लेकर भी सजग रहना होगा। घरेलू मोबाइल विनिर्माण, ई-कॉमर्स पर कड़ाई, सरकारी सोर्सिंग नियमन और डेटा का स्थानीयकरण ऐसे ही मुद्दे हैं। अमेरिकी वाणिज्य मंत्री विलबर रॉस ने अपनी भारत यात्रा के दौरान कहा है कि भारत ने निरंतर अनुरोध के बाद भी प्रतिबंधात्मक व्यापार नीतियों को शिथिल करने की पहल नहीं की है। अगर भारत इस नए माहौल का लाभ वैश्विक स्तर पर अपनी छाप छोडऩे में कर सकता है तो उसके पास नए रोजगार तैयार करने के अवसर हैं। बीते कुछ वर्ष में इसकी भारी कमी महसूस की गई।
Keyword: america, china, iindia, iran, trump,,
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