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मलेरिया के खिलाफ लड़ाई की दिशा में बढ़ते सबके हाथ

तकनीकी तंत्र
देवांग्शु दत्ता /  May 06, 2019

मलेरिया से बचाव के लिए पहली बार आए टीके के चौथे चरण का पिछले दिनों प्रायोगिक परीक्षण हुआ। घाना, केन्या और मलावी के करीब 360,000 बच्चों को आरटीएस,एस टीका लगाया जाएगा। दवा कंपनी जीएसके ने मॉसक्यूरिक्स नाम से यह टीका तैयार किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे 'कंप्लीमेंटरी मलेरिया कंट्रोल टूल' (मलेरिया के रोकथाम का पूरक उपाय) के रूप में परिभाषित किया है। वर्ष 2017 में मलेरिया से जुड़ी 435,000 मौतें हुई थीं और खास तौर पर युवा बच्चे इस बीमारी के निशाने पर थे। इस बीमारी ने सबसे अधिक कहर अफ्रीका के युवा बच्चों पर ढाया है। मलेरिया से हर साल 5 वर्ष से कम उम्र के  250,000 बच्चे काल कवलित हो जाते हैं। इस तरह, 2017 में मलेरिया के शिकार हुए 266,000 बच्चों की तादाद खासी अधिक कही जा सकती है। उस वर्ष 100 देशों में इस बीमारी के 2.19 करोड़ मामले सामने आए थे। यह टीका तैयार होने में 30 वर्षों से भी अधिक का समय लगा और करीब 50 करोड़ डॉलर रकम खर्च हुई है। हालांकि यह टीका मलेरिया से लडऩे में आंशिक रूप से ही असरदार है और यह केवल प्लाज्मोमिडयम फाल्सिपेरम परजीवी के खिलाफ काम करता है और दूसरा बड़ा मलेरिया परजीवी प्लाज्मोडियम विवेक्स इसकी जद में नहीं आता है। इस तरह, यह टीका केवल 40 प्रतिशत तक ही कारगर साबित होता है, लेकिन यह आंशिक सुरक्षा भी असुरक्षा से बेहतर तो जरूर कही जा सकती है। 

 
मलेरिया निरोधक टीका तैयार करने में आने वाली कठिनाइयों का जिक्र बिल गेट्स ने बखूबी किया है (बिल ऐंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने यह टीका विकसित करने और मलेरिया के खिलाफ अन्य उपाय करने में वित्तीय मदद मुहैया कराई है)। गेट्स ने मलेरिया परजीवी को ऐसा खतरनाक वायरस करार दिया है जो आकार बदलता रहता है। मलेरिया के कई परजीवी हैं, जो संक्रमित व्यक्ति के शरीर में कई बार रूप बदलते रहते हैं। प्रत्येक परजीवी कम से कम 60 तरह के प्रोटीन का स्राव करता है और ये बारी बारी से सामने आते रहते हैं। हमारी प्रतिरोधी क्षमता किसी एक खास प्रोटीन की पहचान कर बीमारी से लड़ती है। टीके भी कुछ इसी तरह काम करते हैं। श्रेष्ठï 'मल्टी-प्रोटीन' टीके (निमोनिया निरोधी) एक दर्जन विभिन्न प्रोटीनों से लड़ सकते हैं। मलेरिया शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को चकमा देने में सफल रहता है और ज्यादातर सुरक्षा परतों को पार कर जाता है। इसके अलावा बच्चों को ध्यान में रखकर बनाई गई किसी भी कोई भी दवा के दुष्प्रभावों की पड़ताल भी जरूर होती है। 
 
वर्ष 2009 से 2014 के बीच आरटीएस,एस का परीक्षण तीन चरणों में हुआ और बुरकिना फासो, गैबन, घाना, केन्या, मलावी, मोजांबिक और यूनाइटेड रिपब्लिक ऑफ तंजानिया के करीब 15,000 बच्चों एवं नवजात शिशुओं को इस प्रक्रिया में शामिल किया गया। इस टीके की चार खुराक दी जाती हैं। पहली खुराक शिशु के पांच महीने का होने के बाद और दूसरी और तीसरी खुराक एक महीने के अंतर पर और अंतिम खुराक दूसरे जन्मदिन के आस-पास दी जाती है। डब्ल्यूएचओ का दावा है कि 5 से 17 साल के जिन बच्चों को आरटीएस,एस की चार खुराक दी गई, उनमें चार वर्षों के दौरान मलेरिया के 10 में करीब 4 (39 प्रतिशत) मामलों की रोकथाम हो गई। मलेरिया के गंभीर मामलों में 10 में से करीब तीन की रोकथाम संभव हुई और रक्त चढ़ाने की जरूरत 29 प्रतिशत तक कम हो गई। मलेरिया के उन मामलों को गंभीर माना गया है, जिनमें शुरुआती संक्रमण जान लेवा साबित हो सकता है। 
 
यूरोपीय संघ की यूरोपीय मेडिसिन्स एजेंसी ने तीनों चरणों की समीक्षा के बाद टीके के सामान्य इस्तेमाल की अनुमति दे दी। इस टीके से जनित कुछ दिक्कतें भी हैं, जैसे शरीर के जिस हिस्से में टीका लगा है, उसके इर्द-गिर्द दर्द सूजन होना और कुछ मामलों में बुखार और दौरे पडऩा शामिल हैं। हालांकि ये दुष्प्रभाव अल्प अवधि के लिए होते हैं और दीर्घ अवधि में इनका असर खत्म हो जाता है। हालांकि दो चिंताएं अब भी बरकरार हैं। जिन बच्चों को टीके लगाए गए थे, उनमें दिगामी बुखार के मामले अधिक दिखे थे और मलेरिया के गंभीर मामले जरूर 29 प्रतिशत तक कम हुए थे, लेकिन जिन मामलों में ऐसा हुआ, उनमें दिमागी मलेरिया के अधिक मामले दिखे। हालांकि टीके और इसके दुष्प्रभाव में कोई संबंध नहीं दिखा। चौथा चरण 2022 तक चलेगा और नियमित इस्तेमाल के लिए टीका बाजार में उतारने से पहले सावधानी से नतीजों की समीक्षा की जाएगी।
 
वास्तव में जीएसके ने आरटीएस,एस का विकास 1987 में ही किया था। 2001 मेंं इसने सिएटल स्थित गैर-लाभकारी पैथ के साथ काम करना शुरू किया था। पैथ ने मलेरिया के टीके के लिए पहल की जिससे जीएसके को आरटीएस,एस का विकास जारी रखने में मदद मिली। तीसरे चरण में हुए परीक्षण को सात देशों के 11 अफ्रीकी शोध संस्थानों का समर्थन मिला था और इसमें इन्हें गेट्स फाउंडेशन का पूरा सहयोग प्राप्त था। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि चौथे चरण को भी वैक्सिन अलायंस गावी (गेल फाउंउेशन से संबंधित स्टार्टअप) और यूनिटाइड से वित्तीय सहयोग मिल रहा है। डब्ल्यूएचओ ने मलेरिया के कहर से निपटने के लिए जो रणनीति तैयार की है, उसके तहत कीटनाशक तकनीक से लैसे मच्छरदानी और घरों के भीतर छिड़काव के साथ लार्वा मारने वाली दवाओं और खास कपड़े जैसे व्यक्तिगत सुरक्षा के उपाय आदि शामिल हैं। मलेरिया के खिलाफ लड़ाई को कई सफलताएं मिली हैं। 
 
2000 से 2015 के बीच दुनियाभर में मलेरिया के मामलों में 41 प्रतिशत तक कमी आई और इससे होने वाली मौतें भी 62 प्रतिशत तक कम हो गईं। हालांकि 2015 की तुलना में 2017 में मलेरिया के अधिक मामले देखे गए। 2017 में दुनिया में मलेरिया के जितने मामले देखे गए, उनमें भारत में दर्ज ऐसे 4 प्रतिशत मामले भी शमिल हैं। हालांकि यह ऐसे मामले 2016 के बाद से 24 प्रतिशत तक घटाने में सफल रहा है। मलेरिया रोधी टीका इस बीमारी से लडऩे में एक अतिरिक्त हथियार साबित हो सकता है। 
Keyword: health, hospital, malaria,,
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