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लोकतंत्र, डिजिटल इंडिया और नेटवर्क

श्याम पोनप्पा /  May 06, 2019

डिजिटलीकरण और लोकतांत्रिक व्यवस्था अनिवार्य तौर पर नेटवर्क के माध्यम से संचालित होते हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम पोनप्पा

 
देश में डिजिटलीकरण से जो भी लाभ या नुकसान हुए हैं, उनको नकारा नहीं जा सकता है। इनका प्रत्यक्ष संबंध लोकतंत्र के समक्ष आई चुनौतियों और उससे जुड़े लाभों से भी है। डिजिटलीकृत नेटवर्क को लेकर जो अनियंत्रित हड़बड़ी देखने को मिल रही है, उससे अलग-अलग तरह से ही सही लेकिन पहुंच और किफायत के मामले में जबरदस्त लाभ सामने आए हैं। ये लाभ व्यक्तिगत स्तर पर भी हैं और सामूहिक स्तर पर भी।  उदाहरण के लिए परिवार के स्तर पर, मित्रों के स्तर पर, समुदाय के स्तर पर, राष्टï्र स्तर पर, राजनीति में, कार्यस्थल में आदि। हालांकि इसका एक अंधेरा पक्ष भी है। यानी सामाजिक, धार्मिक अथवा राजनीतिक स्तर पर उपद्रव, कट्टïरता, निरंकुशता, फासीवाद, अराजकता और सामाजिक निष्क्रियता आदि इसके कुछ उदाहरण हैं। बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अपनी तमाम जरूरतों, प्रतिभाओं और विरोधाभास के बीच डिजिटलीकरण ने हमें बहुत सक्षम बनाया है।  
 
लोकतंत्र की बात करें तो इससे जुड़ी रूमानियत विशुद्घ रूप से सतही बात है। वास्तव में इसकी हकीकत कहीं अधिक कठोर रही है और अब भी है। यह वास्तव में वरीयता वाले बुर्जुआ वर्ग के व्यवहार की चीज रही है।  अगर देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था की बात करें तो हमारी राजनीतिक तैयारी अधूरी है और इसलिए यह स्थान उन राजनेताओं ने कब्जा लिया है जिनमें से अधिकांश अवसरवादी हैं। यह प्रशासन के लिए आवश्यक जटिल विश्लेषण और निर्णय क्षमता के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। अधिकांश नागरिकों को भ्रम है कि उन्हें चयन की स्वतंत्रता है जबकि उनकी यह स्वतंत्रता सत्ताधारी दल को चुनने या नकारने अथवा एक जैसे नेताओं में से किसी का चयन करने तक सीमित है। यहां डिजिटलीकरण की प्रत्यक्ष भूमिका है। मीडिया के तमाम स्वरूपों की बदौलत इसका प्रभाव भी व्यापक है। कैंब्रिज एनालिटिका मामले में हम देख चुके हैं कि पैसे और राजनीति का गठजोड़ किस प्रकार काम कर रहा है। 
 
मैकिंजी की डिजिटल इंडिया रिपोर्ट 2019 के मुताबिक देश के डिजिटलीकरण के तमाम लाभ हैं लेकिन केवल 40 फीसदी आबादी की पहुंच ही इंटरनेट तक है और सुधार की बहुत अधिक गुंजाइश है। इसके बावजूद नए डिजिटलीकृत हुए क्षेत्रों को जबरदस्त लाभ हासिल हुए हैं। उदाहरण के लिए लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में बेड़ों के पलटाव में लगने वाला समय 50 से 70 फीसदी कम हुआ है। डिजिटलीकृत आपूर्ति शृंखला ने कंपनियों की इन्वेंटरी में 20 फीसदी तक कमी की है। सवाल यह है कि इसका कैसे प्रबंधन किया जाए कि लाभ अधिक हों और नुकसान कम हों तथा निजता बची रह सके। 
 
सचेत नियमन के निहितार्थ
 
नेटवर्क विज्ञान हमें बताता है कि वास्तविक दुनिया के नेटवर्क में दो गुणधर्म होते हैं। पहला समय के साथ वृद्घि और दूसरा, नए नोड अक्सर अधिक जुड़े हुए नोड या हब के साथ जुड़ जाते हैं। वृद्घि और प्राथमिकता आधारित संबद्घता के चलते कुछ उच्च संपर्क वाले हब लगभग सभी नेटवर्क में तैयार हो जाते हैं। फिर चाहे वह हमारे शरीर में कोशिकाओं का नेटवर्क हो, कंप्यूटर चिप का, परिवहन से जुड़े लोगों का या इंटरनेट का। सभी नेटवर्क में ऐसे गुणधर्म समान होते हैं।  फेसबुक, एमेजॉन, नेटफ्लिक्स और गूगल जैसी कंपनियों ने जो दबदबा दिखाया है, वह बताता है कि नेटवर्क में नियमन और ढांचे की कितनी अहमियत है और यह उनके विकास और नतीजे सामने लाने में कितना योगदान दे सकता है। यही बात लोकतंत्र पर भी लागू होती है। हमारे देश में हाल के दिनों चुनावी फंडिंग को लेकर कई बदलाव किए गए हैं। इससे अस्पष्टïता बढ़ी है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाए जाने की आशंका में भी इजाफा हुआ है। अब राजनीतिक दल अबाध ढंग से विदेशी या घरेलू फंडिंग हासिल कर सकते हैं। चुनावी बॉन्ड के जरिए फंड को गोपनीय रखा जा सकता है। राजग और कांग्रेस दोनों ने पुरानी तिथि से लागू इस नई व्यवस्था का लाभ उठाया है। ऐसे में समाचार और सोशल मीडिया में नियमन और समुचित नियंत्रण की आवश्यकता भी सामने आई है। 
 
प्रमाण आधारित नीतियां
 
डिजिटलीकरण का एक सकारात्मक पहलू नेटवर्क विज्ञान के प्रयोग से संबंधित है। इसका इस्तेमाल विभिन्न कारकों और कार्रवाई योग्य नीतियों के बीच संबंध को आंकने में किया जाता है। मिसाल के तौर पर प्रभावी उपचार के लिए जीन और बीमारियों के बीच का रिश्ता समझना या विभिन्न देशों को निर्यात के लिए किसी उत्पाद को उन्नत करना। अगर गौर किया जाए तो यह पता चलता है कि अधिकांश उन्नत उत्पाद गहन संबद्घता वाले नेटवर्क से आते हैं जबकि कमजोर गुणवत्ता के उत्पाद कम घनत्व वाले क्षेत्र से। विभिन्न देश उन उत्पादों को वरीयता देने की प्रवृत्ति रखते हैं जो उनके विशिष्टï कौशल के अनुरूप हों। दरअसल हमें बेहतर नियोजन और क्रियान्वयन वाले एक उपयुक्त नियमन की आवश्यकता है। इस नियमन में शासन, स्वास्थ्य सुविधाओं और औद्योगिक नीति आदि को लेकर गहन अंतर्दृष्टिï होनी जरूरी है। वास्तविक राजनीति और रुढि़वादिता, धार्मिकता, जातीयता आदि को लेकर अन्मयस्कता के चलते आवश्यकता यह है कि राजनीति और फंडिंग के गठजोड़ में बदलाव लाया जाए और एक पारदर्शी, सरकारी फंडिंग वाली व्यवस्था लागू की जाए। क्या ऐसा बदलाव संभव है? हाल के दिनों में कुछ प्रयास किए गए हैं जो अतीत में गोस्वामी समिति (1990) और वोहरा समिति (1993) द्वारा किए गए चुनावी सुधार के प्रयासों से आगे के हैं, वे तात्कालिक आवश्यकता जाहिर करते हैं। परंतु क्या सार्वजनिक विचार और अवसरवादी विपक्ष के हित, राजनीतिक फंडिंग में उचित और प्रभावी बदलाव ला सकते हैं? 
 
प्रश्न यह भी है कि स्वास्थ्य, विनिर्माण, कृषि, वित्त निर्माण और निर्यात आदि क्षेत्रों से संबंधित नीतियों को लेकर सरकार व्यवस्थित पेशकदमी कर सकती है? यह उम्मीद कुछ ज्यादा ही है। अधिक से अधिक यह उम्मीद की जानी चाहिए कि ब्रेक्सिट जैसी अवधारणाएं अधिक समान व्यवहार की जमीन तैयार करती हैं। 
Keyword: india, digital, democracy,,
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