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कड़ी चुनौती

संपादकीय /  May 06, 2019

तमाम ऐसे संकेतक हैं जो यह बताते हैं कि वृहद आर्थिक क्षेत्र में भारत की लंबे समय से चली आ रही बेहतर स्थिति अब समाप्त होने को है। बीते पांच वर्ष के दौरान अनुकूल वैश्विक परिस्थितियों और जिंस कीमतों के कारण भारत की वृहद आर्थिक स्थिति काफी भाग्यशाली रही। इन वैश्विक कारकों ने मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने में भी आंशिक रूप से अपनी भूमिका का निर्वाह किया। वैश्विक पूंजी की आसान उपलब्धता ने चालू खाते के घाटे की भरपाई करने में सहायता की। कमतर मुद्रास्फीति और कमजोर जिंस कीमतों ने राजकोषीय घाटे को कम करने में मदद की है। इससे सरकार को यह अवसर मिला कि वह मौद्रिक मोर्चे पर सख्ती न बरते। परंतु अब इस बात पर संदेह उत्पन्न हो गया है क्योंकि सरकार वर्ष 2018-19 के 11 फीसदी के राजस्व लक्ष्य को हासिल करने से चूक गई है। ऐसा इसलिए कि वस्तु एवं सेवा कर, आय कर और केंद्रीय उत्पाद शुल्क का संग्रह कम रहा है। परंतु सरकारी व्यय ने वृद्घि दर को बरकरार रखने में मदद की है। यह चक्र काफी हद तक उन बाहरी कारकों पर निर्भर करता है जो भारत के नियंत्रण से बाहर हैं। इन कारकों में से कई अब समाप्त हो रहे हैं। उदाहरण के लिए कच्चे तेल की कीमतें। ऐसा लगता नहीं कि ये कीमतें 2014 के पहले की तरह 100-130 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में वापस जाएंगी। ये कीमतें कुछ समय तक 70-80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर बनी रहेंगी। रुपया भी 70 प्रति डॉलर के आसपास पहुंच जाएगा। तेल कीमतें इस वर्ष पिछले साल की तुलना में एक तिहाई तक बढ़ी हैं। इन्हीं चिंताओं की बदौलत इंडिया वीआईएक्स, जो नैशनल स्टॉक एक्सचेंज में होने वाले उतार-चढ़ाव का आकलन करता है, हाल में तीन वर्ष के ऊपरी स्तर पर पहुंच गया। 

 
घरेलू स्तर पर भी कठिनाइयां दिख रही हैं। खासतौर पर कारोबारी आय अथवा निजी निवेश में सुधार का भी कोई संकेत नहीं दिख रहा। क्षमता के इस्तेमाल में सुधार के बावजूद नए परियोजनाओं में इजाफा नजर नहीं आ रहा। जाहिर सी बात है कि शहरी और ग्रामीण मांग के तमाम प्रमुख संकेतकों पर मांग कमजोर बनी हुई है। वर्ष 2018-19 में यात्री कार की बिक्री केवल 3 फीसदी बढ़ी। चौथी तिमाही के नतीजों की बात करें तो शुरुआती संकेत अर्थव्यवस्था में धीमेपन के हैं। विदेशों से हो रही डॉलर आवक ने बाजार को संभाल रखा है। परंतु यह स्थायी सिलसिला नहीं है। खासतौर पर लंबे समय से कमजोर बनी हुई आय, अवमूल्यित होता रुपया और अन्य उभरते बाजारों में सुधार के कारण यह आवक कमजोर हो सकती है। कुछ विरोधाभासी संकेतक भी हैं। मिसाल के तौर पर कॉर्पोरेट क्षेत्र को बैंक ऋण में सुधार। हालांकि ऐसा गैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र में गिरावट के कारण भी हो सकता है। वित्तीय क्षेत्र की दिक्कतों पर भी विचार किया जाना चाहिए। रेटिंग में गिरावट के बाद एनबीएफसी संकट एक बार फिर सुर्खियों में है। दिवालिया एवं ऋणशोधन प्रक्रिया का प्रदर्शन कमजोर बना हुआ है। इस बीच सरकार की ओर से सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों को ऋण समेत बैंकिंग क्षेत्र में संकट बरकरार है।
 
सरकार ने अपने व्यय की मदद से वृद्घि दर को बरकरार रखा है लेकिन लगातार दो वर्ष तक घाटे में कमी के बाद अब उसके पास सीमित राजकोषीय गुंजाइश है। सरकारी व्यय पर बढ़ते दबाव के चलते निजी निवेश में इजाफा आवश्यक है। नई सरकार को कार्य भार संभालने के तत्काल बाद इन कठिनाइयों का सामना करना होगा। अगर नई सरकार महत्त्वाकांक्षी सुधार योजनाओं पर जल्द अमल करे तो बेहतर होगा। इससे न केवल उपभोक्ताओं का उत्साह बढ़ेगा बल्कि निजी निवेश और निर्यात में सुधार का माहौल भी तैयार होगा।
Keyword: fiscal deficit, revenue, economy, car,,
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