बिजनेस स्टैंडर्ड - एनबीएफसी का संकट
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एनबीएफसी का संकट

संपादकीय /  May 05, 2019

गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) एक बार फिर चर्चा में हैं। बीते सप्ताह कई एनबीएफसी की रेटिंग में गिरावट आई। इनमें अनिल अंबानी के समूह की वित्तीय कंपनियों और पीएनबी हाउसिंग फाइनैंस शामिल हैं। बॉन्ड बाजार की बात करें तो वह वित्त वर्ष 2019 दूसरी तिमाही में इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) के डिफॉल्ट करने के बाद से ही जोखिम में था। ऐसे में ताजा गिरावट ने एनबीएफसी की पूंजी और वृद्धि की लागत पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। बीते कुछ वर्ष में एनबीएफसी क्षेत्र ने कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार की कुल उधारी का करीब 70 फीसदी हिस्सा लिया है। परंतु आईएलऐंडएफएस की घटना के बाद न केवल नकदी की किल्लत हुई है बल्कि इनकी मांग में भी कमी आई है। इस बीच क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने कमजोर कंपनियों की रेटिंग घटा दी तथा अन्य के पूर्वानुमान में संशोधन किया। आज, जो एनबीएफसी बॉन्ड जुटाने में सक्षम हैं, उनकी लागत बढ़ रही है। एएए रेटिंग वाली एनबीएफसी सरकारी बॉन्ड से करीब 150 आधार अंक तक ऊपर हैं। जबकि एएए रेटिंग वाली गैर वित्तीय कंपनियां 100 अंक के आधिक्य पर पूंजी जुटा रही हैं। 

 
आईएलऐंडएफएस की घटना के पहले यह विस्तार 50 आधार अंक तक था। नकदी की कमी ने एनबीएफसी क्षेत्र का संकट और बढ़ा दिया। नोटबंदी के कारण नकदी की किल्लत हुई। हालांकि केंद्रीय बैंक ने खुले बाजार में बिक्री तथा अन्य उपायों से इसे दूर करने का प्रयास किया। वर्ष 2019 में आरबीआई ने खुले बाजार में खरीद के जरिए करीब 3 लाख करोड़ रुपये की राशि डाली जो ऐतिहासिक है। इसके अलावा 1000 करोड़ डॉलर की का बैंकों के साथ विनिमय किया गया। इन कारणों से बॉन्ड प्रतिफल में कमी आई लेकिन दरों में दो बार कटौती के बावजूद एनबीएफसी के लिए उधारी की दर ऊंची बनी हुई है क्योंकि कर्जदाताओं की मांग नहीं है। म्युचुअल फंड एनबीएफसी के प्रमुख ग्राहक थे लेकिन अपने पोर्टफोलियों में गिरावट को देखते हुए वे भी जोखिम से बच रहे हैं। आईएलऐंडएफएस संकट के बाद वे बिना नुकसान के इससे बाहर नहीं निकल सके। 
 
म्युचुअल फंडों को उस समय भी झटका लगा जब उनको एस्सेल समूह के प्रवर्तकों और अनिल अंबानी समूह को ऋण देना रोकना पड़ा। सितंबर 2018 और मार्च 2019 के बीच इस उद्योग के डेट फंड से 68,000 करोड़ रुपये और डेट योजनाओं से 1.3 लाख करोड़ रुपये की निकासी की गई। विश्लेषकों के मुताबिक चिंता की बात यह भी है कि घरेलू थोक ऋण बाजार एनबीएफसी के बीच भेद करता नजर आ रहा है। आईएलऐंडएफएस संकट सामने आने के बाद से बॉन्ड बाजार में हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनैंस कॉर्पोरेशन और एलआईसी हाउसिंग फाइनैंस की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। जिन कंपनियों को मजबूत माना जाता रहा है कि वे घरेलू बॉन्ड बाजार से राशि जुटाने में सफल रहीं लेकिन शेष कंपनियों पर यह बात लागू नहीं होती। थोक डेट बाजार के दरवाजे बंद होने पर एनबीएफसी फंड के अन्य जरियों मसलन बाह्य वाणिज्यिक ऋण और खुदरा क्षेत्र की ओर निगाह कर रही हैं। 
 
बीते कुछ वर्ष में एनबीएफसी ने खुदरा और छोटे एवं मझोले उपक्रमों को ऋण देने में अहम भूमिका निभाई है। बैंक ऐसा नहीं कर सके हैं। इसके अलावा सरकारी बैंक फंसे कर्ज की समस्या से भी दो-चार हैं। कुछ एनबीएफसी नाकाम हो सकती हैं या फिर उन्हें मजबूत कंपनियों के साथ विलय करना पड़ सकता है लेकिन व्यापक तौर पर देखें तो कुल कारोबार में आ रही कमी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है। एसएमई पर नोटबंदी का असर पड़ा और उनको वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था के साथ तालमेल करने में भी दिकक्त हुई। उनको उचित लागत पर पूंजी चाहिए। खुदरा ऋण देश में खपत को गति देने के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि निवेश में सुधार की कोई संभावना नहीं दिख रही। 
Keyword: NBFC, bank, micro finance, RBI,
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