बिजनेस स्टैंडर्ड - कर मुक्त निकासी है आजीवन यूलिप का सबसे बड़ा फायदा
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कर मुक्त निकासी है आजीवन यूलिप का सबसे बड़ा फायदा

तिनेश भसीन /  May 05, 2019

कम खर्च वाले यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान यानी यूलिप पिछले कुछ अरसे में काफी सफल रहे हैं। इसकी वजह से जीवन बीमा कंपनियों का हौसला बढ़ा है और उन्होंने सेवानिवृत्ति के लिए की जा रही बचत में भी यही फलसफा आजमाने की कोशिश की है। पिछले एक महीने के दौरान पांच बीमा कंपनियों ने ऐसी योजनाएं पेश की हैं, जिसमें पॉलिसी खरीदने वालों को एक दशक या उससे भी अधिक समय के दौरान मोटी राशि इक_ïा करने का मौका मिलता है और नियमित अंतराल पर (हर महीने, तिमाही या सालाना) एक निश्चित राशि निकालने की सुविधा भी हासिल होती है। इन योजनाओं को ऐसी बीमा पॉलिसी की शक्ल में पेश किया गया है, जिससे रिटायर होनके बाद नियमित तौर पर नकदी हाथ आती रहेगी। जीवन बीमा कंपनियों के इस प्रकार के यूलिप हैं - बजाज आलियांज लॉन्गलाइफ गोल, एचडीएफसी लाइफ क्लिक2वेल्थ, मैक्स लाइफ इंश्योरेंस - ऑनलाइन सेविंग्स प्लान (रिटायरमेंट), केनरा एचएसबीसी ओरिएंटल - इन्वेस्ट 4जी (होल लाइफ) और एडलवाइस टोकियो लाइफ - वेल्थ अल्टिमा

 
कम खर्च में जीवन बीमा भी
 
कम खर्च वाले यूलिप की ही तरह रिटायरमेंट से जुड़ी इन योजनाओं में भी प्रशासनिक शुल्क और पॉलिसी आवंटन शुल्क खत्म कर दिए गए हैं। केवल एडलवाइस टोकियो लाइफ पहले पांच साल तक दोनों तरह के शुल्क ले रही है। बाकी कंपनियां केवल मॉर्टेलिटी शुल्क और फंड प्रबंधन शुल्क वसूलती हैं। पॉलिसीबाजार डॉट कॉम में मुख्य कारोबार अधिकारी (जीवन बीमा) संतोष अग्रवाल कहते हैं, 'इन योजनाओं में निवेश, धन संग्रह पर कर संबंधी लाभ भी मिलते हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि आंशिक निकासी पर भी कोई कर नहीं लगता।'
 
इस तरह की पॉलिसी में जीवन बीमा कवर आजीवन बीमा योजना के जरिये दिया जाता है। इन यूलिप पॉलिसी में शुल्क तो कम होते हैं, लेकिन इन्हें समझना थोड़ा मुश्किल भरा होता है। बीमा कंपनियों ने इनमें कुछ शर्तें जोड़ दी हैं ताकि लोग लंबी अवधि तक बचत करने के लिए प्रोत्साहित हों। मगर पहला सवाल यह उठता है कि आजीवन यूलिप आखिर क्या है? आजीवन योजना का मतलब यह होता है कि जब तक पॉलिसीधारक 100 साल का नहीं हो जाता है तब तक उसे बीमा कवर मिलता रहता है। लेकिन इसमें बीमित राशि यानी सम ऐश्योर्ड निकालने का एक नुस्खा होता है। पॉलिसी लेने वाले की उम्र को 70 में से घटाया जाता है और इससे मिले आंकड़े को 2 से भाग दे दिया जाता है। आखिर में मिले आंकड़े को सालाना प्रीमियम से गुणा कर दिया जाता है। वही सम ऐश्योर्ड होती है। मिसाल के तौर पर किसी व्यक्ति की उम्र 40 साल है। उसे 70 में से घटाने पर मिले 30 के आंकड़े को 2 से भाग करने पर 15 आता है। इस तरह उसकी सम ऐश्योर्ड उसके सालाना प्रीमियम की 15 गुना होगी। 
 
बीमा कंपनियां सालाना प्रीमियम की कम से कम 10 गुना राशि को सम ऐश्योर्ड के तौर पर रखती हैं ताकि पॉलिसीधारकों को निकासी पर कर संबंधी फायदे मिल जाएं। टाइप-आई यूलिप भी होते हैं, जिनमें बीमा कराने वाले व्यक्ति या उसके नॉमिनी को पॉलिसी अवधि पूरी होने या मृत्यु होने पर सम ऐश्योर्ड और फंड वैल्यू में से जो भी राशि अधिक होती है, वह मिल जाती है।
 
महत्त्वपूर्ण शर्तें
 
चूंकि इस तरह की पॉलिसी में असली मकसद नकदी का प्रवाह बरकरार रखने के लिए धनराशि जमा करना है, इसलिए बीमा कंपनियां कुछ शर्तें भी रखती हैं। ज्यादातर योजनाओं में पॉलिसीधारक को 10 साल या अधिक समय तक प्रीमियम चुकाने का विकल्प चुनना होता है। एडलवाइस टोकियो लाइफ में उत्पादन प्रमुख राहुल बजाज का कहना है, 'इससे बड़ी रकम तो जमा हो ही जाती है, मॉर्टेलिटी शुल्क भी काफी कम हो जाता है। ऐसी पॉलिसी में यदि कुल धनराशि सम ऐश्योर्ड से अधिक हो जाती है तो बीमा कंपनियां मॉर्टेलिटी शुल्क नहीं वसूलतीं।' इन पॉलिसी में 11वें साल से ही आंशिक निकासी की सुविधा भी मिलने लगती है। लेकिन ज्यादातर बीमा कंपनियां 1 साल में 12 फीसदी से अधिक रकम नहीं निकालने देतीं।
 
मैक्स लाइफ इस मामले में कुछ अलग है और वह उस समय तक की फंड वैल्यू में से 50 फीसदी तक रकम निकालने देती है और यह रकम साल में अधिकतम दो किस्तों में निकाली जा सकती है। बजाज आलियांज लाइफ में मुख्य वितरण अधिकारी (इंस्टीट्यूशन) धीरज सहगल समझाते हैं, 'निकासी पर बंदिश यह सुनिश्चित करने के लिए होती है कि फंड वैल्यू यानी कुल जमा रकम सम ऐश्योर्ड से नीचे नहीं जाए। यदि ऐसा होता है तो बीमा कंपनी मॉर्टेलिटी शुल्क काटना शुरू कर देती हैं, जो उम्र बढऩे के साथ बढऩे लगता है।'
 
विशेषज्ञों की सलाह है कि निवेशकों को 6 फीसदी तक सालाना निकासी का विकल्प चुनना चाहिए ताकि बाजार की स्थिति कैसी भी रहे, उनकी रकम बढ़ती रहे। कई कंपनियां कुछ शुल्कों को वापस फंड यानी रकम में भी जोड़ देती हैं। बजाज आलियांज लाइफ को ही लें। पॉलिसी के 10 साल पूरे होने के बाद हर 5 साल में यह कंपनी मॉर्टेलिटी शुल्क का एक हिस्सा जोड़ देती है। एडलवाइस टोकियो लाइफ लॉयल्टी एडिशन, गारंटी एडिशन और बूस्टर के नाम पर नियमित अंतराल पर रकम जोड़ती रहती है। बहरहाल इस तरह की पॉलिसी में सबसे बड़ा फायदा यह है कि निकासी पूरी तरह कर मुक्त होती है और निवेशक अपनी जरूरत के हिसाब से तय कर सकता है कि उसे कितनी रकम निकालनी है।
 
बीमा पेंशन योजनाओं से बेहतर
 
पिछले कुछ अरसे से बीमा कंपनियों की पेंशन योजनाओं को शायद ही कोई ले रहा है। इनमें पॉलिसीधारक कुल जमा रकम का केवल एक तिहाई हिस्सा निकाल सकता है। बाकी दो-तिहाई राशि का इस्तेमाल उसे एन्युइटी योजना खरीदने में करना ही पड़ता है। एन्युइटी से होने वाली आय पर कर वसूला जाता है और उसका प्रतिफल भी इस समय बहुत आकर्षक नहीं है।
 
रिटायरमेंट योजनाओं में खामियां
 
पॉजिटिव वाइब्स कंसल्टिंग ऐंड एडवाइजरी में पार्टनर मल्हार मजूमदार कहते हैं, 'ढेर सारे विकल्प होने के कारण आम निवेशक के लिए ये पॉलिसी खासी पेचीदा हो जाती हैं। चूंकि मल्टीपल फंड के विकल्प लगातार बढ़ते जा रहे हैं, इसलिए योजनाओं की जटिलता भी बढ़ती जा रही है। इनमें से कई को ऑनलाइन तरीके से सीधे निवेशकों को बेच दिया जाता है। अगर अपनी वित्तीय योजना के मुताबिक सबसे सटीक पॉलिसी चुननी है तो निवेशक को इनकी पूरी समझ होनी चाहिए।' म्युचुअल फंड या राष्टï्रीय पेंशन योजना जैसी कई योजनाओं में निवेशक के पास योजना का प्रदर्शन खराब रहने पर फंड कंपनी बदलने का विकल्प होता है। मुंबई में रहने वाले वित्तीय योजनाकार अर्णव पांड्या बताते हैं, 'यूलिप की बात करें तो निवेशक कंपनी नहीं बदल सकता। उसके पास फंड बदलने का ही विकल्प है यानी वह लार्ज-कैप फंड छोड़कर मल्टी-कैप या मिड-कैप फंड और स्मॉल-कैप फंड या डेट योजना ही चुन सकता है।' उनका कहना है कि इन योजनाओं में लंबे समय तक प्रीमियम भी चुकाना पड़ता है।
 
दूसरे सलाहकारों का कहना है कि इन योजनाओं को चुनने से पहले निवेशक को कुछ पहलू अच्छी तरह समझ लेने चाहिए। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार और पर्सनल फाइनैंस प्लान के संस्थापक दीपेश राघव बताते हैं, 'यूलिप में फंड प्रबंधन शुल्क म्युचुअल फंड के खर्च अनुपात के समान नहीं होता है। म्युचुअल फंड के खर्च अनुपात में वितरण, मार्केटिंग, फंड प्रबंधन और अन्य प्रकार के शुल्क जुड़े होते हैं। लगभग 1.35 फीसदी फंड प्रबंधन शुल्क कम नहीं होता।' राघव का यह भी कहना है कि कम लागत वाले यूलिप में मॉर्टेलिटी शुल्क टर्म बीमा योजना में वसूले जा रहे मॉर्टेलिटी शुल्क से अधिक होता है।
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