बिजनेस स्टैंडर्ड - दो चुनाव अभियानों की अलग कहानी
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दो चुनाव अभियानों की अलग कहानी

आदिति फडणीस /  May 03, 2019

गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी (सपा) के उम्मीदवार रामभुआल निषाद के चुनाव कार्यालय पर सुबह सात बजे पहुंचने पर थोड़ा अटपटा लगता है। यह कार्यालय किसी के खाली पड़े घर में बना हुआ है। वहां की हवा में एक अजीब तरह की गंध है। आधे-पूरे कपड़े पहने हुए लोग लगातार शौचालयों के भीतर आते-जाते दिखाई देते हैं। वहां पर कोई भी महिला नहीं दिखाई देती है।  गोरखपुर क्षेत्र में निषाद समुदाय के मतदाताओं की संख्या करीब तीन लाख है। नाव चलाने के परंपरागत पेशे से जुड़ा यह समुदाय यहां की नदियों के इर्दगिर्द बसा हुआ है। विरोधी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक अगड़ी जाति के नेता निषादों के बारे में पूछे जाने पर ठहाका लगाकर हुए कहते हैं, 'वे दिन में मछलियां पकड़ते हैं और रात में शराब पीते हैं।' निषाद खुद को अनुसूचित जाति का हिस्सा मानते हैं लेकिन कानून में उन्हें यादवों की तरह अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) माना गया है। लेकिन जातिगत श्रेणी में निषाद यादवों से काफी नीचे आते हैं।

 
सपा के चुनाव कार्यालय में मौजूद लोग एक मुद्दे पर एकराय रखते हैं। राम भुआल कहते हैं, 'निषाद समुदाय के लिए सबसे बड़ी लड़ाई सम्मान के अधिकार की है।' उनके आसपास खड़े तमाम लोग सिर हिलाकर इससे सहमति जताते हैं। मायावती के मुख्यमंत्री रहते समय मत्स्यपालन मंत्री रह चुके रामभुआल को अब भी उनके समर्थक मंत्रीजी ही कहकर बुलाते हैं। वह सपा से पहले बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में भी रह चुके हैं। इस तरह उन्हें सपा और बसपा दोनों ही दलों का ढांचा और कार्यशैली के बारे में अच्छी तरह पता है। वह आगे भी बातचीत करना चाहते हैं लेकिन उनके कार्यकर्ता प्रचार के लिए निकलने का वक्त होने का हवाला देने लगते हैं। जैसे ही वह अपने कमरे से बाहर निकलते हैं राजनीतिक मसलों पर बोलना शुरू कर देते हैं। मसलन, गोरखपुर में निर्माणाधीन एम्स अस्पताल को वह ईंटों का निरर्थक ढेर बताते हैं (यह अलग बात है कि अस्पताल में ओपीडी शुरू भी हो चुकी है।) वह कहते हैं कि इस अस्पताल का निर्माण भी सपा प्रमुख अखिलेश यादव की वजह से शुरू हो पाया है जिन्होंने मुख्यमंत्री रहते समय इसके लिए जमीन आवंटित की थी। बाहर उनका इंतजार कार्यकर्ताओं और गाडिय़ों की भीड़ कर रही है। वहां से वह चुनावी सभा के लिए रवाना हो जाते हैं। 
 
इसके उलट भोजपुरी फिल्म अभिनेता रविकिशन आफ्टर-शेव लोशन की तीखी महक से सराबोर नजर आते हैं। उनका चुनाव कार्यालय एक शॉपिंग मॉल के बेसमेंट में बना हुआ है और किसी बारात घर की तरह कागज के गुलाबों और भड़कीले रंगों से सुसज्जित है। उनके पीछे युवा कार्यकर्ताओं की भीड़ है। वह थके-मांदे नजर आते हैं और उनके चेहरे पर इसकी झलक भी दिख रही है। लोकसभा चुनाव में उनका मार्गदर्शन कर रहे स्थानीय विधायक राधाकृष्ण दास अग्रवाल जब प्रचार अभियान में कुछ खामियों की तरफ ध्यान दिलाते हैं तो रविकिशन गहरी सांस छोड़ते हैं। अग्रवाल उनसे कहते हैं, 'हमें शाम छह बजे से पहले शहरी इलाके में लौट आना होगा ताकि यहां के लोगों से मिला जा सके। गांवों में रात तक रुके रहना समय की बरबादी ही है।' 
 
शांत भाव से ये बातें सुनने के बाद रविकिशन बिज़नेस स्टैंडर्ड संवाददाता को बातचीत के लिए एक कमरे की तरफ चलने का इशारा करते हैं। वह कमरा भी जल्द ही लोगों से भर जाता है लेकिन वह उन्हें नजरअंदाज करते हुए बात जारी रखते हैं। उन्हें 14 अप्रैल को अपनी उम्मीदवारी के बारे में पता चला था। उस समय वह अमिताभ बच्चन और चिरंजीवी जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ किसी फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। लेकिन गोरखपुर से भाजपा उम्मीदवार बनाए जाने की खबर मिलते ही वह शूटिंग छोड़कर 'सेवा' करने गोरखपुर आ गए। जौनपुर में जन्मे और पले-बढ़े रविकिशन ने रामलीला में सीता का किरदार निभाते हुए अपने अभिनय का सफर शुरू किया था। इस तरह जो सिलसिला शुरू हुआ वह छोटे किरदारों से होते हुए बड़े किरदारों तक जा पहुंचा और फिर उन्हें एक दिन भोजपुरी सिनेमा का सबसे बड़ा स्टार भी माना जाने लगा। वह सेलिब्रिटी रियलिटी शो बिग बॉस में भी शिरकत कर चुके हैं और अब भोजपुरी फिल्मों के साथ ही हिंदी, तेलुगू एवं तमिल फिल्मों में भी काम करते हैं।
 
वह तो कहीं भी रह सकते थे, कुछ भी कर सकते थे, फिर उन्होंने राजनीति और चुनाव के इस थकाऊ काम के बारे में कैसे सोचा? उनका जवाब थोड़ा हटकर है। वह कहते हैं, 'मुझे राजनीति के बारे में नहीं पता है। मैं तो केवल लोगों के दुख-दर्द को जानता हूं। मैं एक देहाती लड़का हूं। मैं समाज को अपनी तरफ से कुछ लौटाना चाहता हूं।' आखिर रविकिशन क्या हैं? एक करोड़पति या अरबपति जो अब चुनावी मैदान में है? वह सहमति में सिर हिलाते हुए कहते हैं, 'कहीं-न-कहीं मुझे यह लग रहा था कि मैं भटक रहा हूं। भला हो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे महान व्यक्ति का। मुझे अब अपना रास्ता मिल गया है।' हालांकि उनके नामांकन के समय खुद योगी आदित्यनाथ मौजूद नहीं थे। इस पर रविकिशन कहते हैं, 'उनका आशीर्वाद मेरे साथ है। वह मेरे लिए प्रचार करने यहां आने वाले हैं।'
 
हो सकता है कि रविकिशन का इरादा नेक हो लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं की नजर में वह मनोरंजन का साधन हैं। चुनाव अभियान शुरू होने पर जब वह यहां के अपने अस्थायी ठिकाने पर गए तो एक खाली कमरे में जिम के उपकरण लगवा दिए। उन्हें कसरत की एक तरह की सनक रहती है। उन्होंने अपने मतदाताओं से भी जिम खोलने का वादा किया है। इसके अलावा कलाकारों के लिए गौरव का अहसास दिलाने वाली इमारत भी बनवाने की बात उन्होंने कही है। इसका जिक्र आने पर वह कहते हैं, 'हम रचनात्मक लोग हैं। हम कलाकार हैं। मैं लोगों की उस सोच को दूर करना चाहता हूं कि हम केवल नाचने-गाने वाले हैं। हर कोई डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस अफसर नहीं हो सकता है। कला का कोई भी रूप एक काम ही है। अभिनय से जुड़े लोग संवेदनशील होते हैं, बेवकूफ नहीं।'
 
उनके चुनाव अभियान की पंचलाइन है 'जिंदगी झंड बा, गठबंधन के मुंह बंद बा'। लेकिन यह नारा कई भाजपा कार्यकर्ताओं के गले नहीं उतर रहा। कुछ 'झंड' (यानी चौपट) को कोई शब्द ही नहीं मानते हैं। इसके बावजूद रविकिशन को देखते ही लोग उन्मादी होने लगते हैं। थोड़ा असहज दिख रहे रविकिशन कहते हैं, 'हर कोई मेरा एक हिस्सा चाहता है। कोई मेरे हाथ छूता है तो कोई मेरे कपड़े और जूते चाहता है। ये लोग छूकर मुझे महसूस कर रहे हैं।' लेकिन जब उनसे यह पूछते हैं कि निषाद समुदाय के लोग उनके बारे में क्या राय रखते हैं तो वह पक्के राजनीतिक अंदाज में कहते हैं, 'मैं एक अभिनेता हूं और मेरी कोई जाति नहीं हैं।' 
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