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हिंदू युवा वाहिनी से मिलती रही है योगी को राजनीतिक ऊर्जा

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  May 03, 2019

लोगों को पहला बदलाव भोजन में दिखा था। योगी आदित्यनाथ एक महंत हैं और पवित्रता पर विशेष ध्यान देते हैं। सात्विकता और पवित्रता जैसे कारणों से वह कहीं भी भोजन नहीं करते थे। लेकिन सांसद होने के नाते उन्हें क्षेत्र के लोग खाने का न्योता भी देते थे। लेकिन योगी के समर्थक पहले ही आगाह कर देते थे कि 'महाराज जी खाना नहीं खाएंगे।' वह खाने के नाम पर केवल फल या मेवा ले लेते थे। लेकिन अब गोरक्षनाथ पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के साथ हर जगह खा लेते हैं। आप उन्हें यादवों या दलितों के साथ खाते हुए देख सकते हैं जबकि पहले इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। लेकिन अब उन्हें यह करना पड़ रहा है। उनके समर्थकों को यह लग रहा है कि एक अहम नियम टूट रहा है। एक समर्थक से योगी ने कहा था कि अब वह केवल गोरक्षनाथ पीठ के महंत ही नहीं बल्कि समूचे राज्य एवं उसके निवासियों के मुख्यमंत्री भी हैं। जब उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया था तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक समर्थक ने इसकी वजह पूछी थी। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, 'इन लोगों में सबसे अच्छे वही हंै।' उस समय केशव प्रसाद मौर्य थे जिन्हें उप मुख्यमंत्री बनाया गया और उनकी कथित तौर पर योगी से बात भी नहीं होती थी। दूसरे विकल्प मनोज सिन्हा थे जो रेल राज्यमंत्री होने के साथ संचार मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार भी देख रहे थे। वहीं आदित्यनाथ क्षितिज पर बहुत दूर नजर आते थे। गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र को 'मंदिर की सीट' माना जाता है। 

 
लेकिन पीठ के पुराने महंतों-दिग्विजयनाथ और अवैद्यनाथ ने कभी भी 'सच्चे हिंदू' होने का दावा नहीं रखा। हिंदू महासभा के प्रतिनिधि रहे दोनों महंत हिंदू धर्म से जुड़े मसलों पर भाजपा को कुछ हद तक चुप्पी साधने वाला ही मानते थे। मंदिर और संसदीय क्षेत्र की कमान संभालने के बाद आदित्यनाथ को यह अहसास हुआ कि गंभीरता से लिए जाने के लिए उन्हें भाजपा के भीतर अपनी छाप बनानी होगी। वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने गोरखपुर से शिव प्रताप शुक्ला को उम्मीदवार बनाया था। इससे नाखुश आदित्यनाथ ने राधामोहन दास अग्रवाल को हिंदू महासभा के टिकट पर मैदान में उतार दिया। और अग्रवाल ने शुक्ला को मात भी दे दी। इस घटना ने आदित्यनाथ को पूर्वांचल में भाजपा के निर्विवाद नेता के तौर पर स्थापित कर दिया। अपनी स्थिति को मजबूती देने के लिए उन्होंने हिंदू युवा वाहिनी नामक गैर-राजनीतिक संगठन भी खड़ा कर दिया।
 
सवाल है कि भाजपा के युवा संगठनों- अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एवं भारतीय जनता युवा मोर्चा के रहते हुए युवा वाहिनी की जरूरत क्या थी? इस पर एक भाजपा समर्थक ने कहा कि हिंदू युवा वाहिनी थोड़ा अलग संगठन है। जहां विद्यार्थी परिषद और युवा मोर्चा 'प्रबुद्ध एवं वैचारिक' मिजाज वाले संगठन हैं, वहीं युवा वाहिनी को 'लंपट' माना जाता है जो विचारधारा के बजाय 'दंगा' करने में अधिक रुचि लेती है। दूसरे शब्दों में, हिंदू युवा वाहिनी एक लड़ाकू संगठन है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2002 में महज 200 सदस्यों वाली युवा वाहिनी की सदस्य संख्या वर्ष 2014 में 15 लाख तक पहुंच गई थी। इस इलाके में बेरोजगारी की समस्या काफी गंभीर है। ऐसे में इलाके के युवाओं को युवा वाहिनी के रूप में एक रुतबा मिल गया। 
 
अकेले गोरखपुर मंडल में ही करीब 5 लाख लोगों ने सदस्यता हासिल की और इसका विस्तार गांव-गांव तक हो गया। इसके कार्यकर्ताओं को इस इलाके में हर साल सैकड़ों लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार बीमारी इनसेफेलाइटिस के बारे में जागरूकता भी फैलानी होती थी। भाजपा के एक नेता के मुताबिक इसका नतीजा यह हुआ कि जिन युवाओं के पास अपने कामकाज के बारे में बताने के लिए कुछ नहीं होता था, अब वह बड़े गर्व से कहता था, 'मैं हिंदू युवा वाहिनी का पदाधिकारी हूं।' भाजपा ने बड़ी चुप्पी के साथ युवा वाहिनी का विस्तार होते हुए देखा लेकिन उसकी नजर हमेशा बनी रही। जब आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो बहुतों ने इस उम्मीद में खूब जश्न मनाया था कि अब उनकी किस्मत भी पलटेगी। लेकिन उनके हाथ निराशा ही लगी। मुख्यमंत्री बनने के बाद आदित्यनाथ के उठाए गए पहले तीन कदम अवैध बालू खनन पर रोक, ट्रकों की ओवरलोडिंग रोकने और कच्ची शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के थे। एक भाजपा कार्यकर्ता कहते हैं, 'इन फैसलों ने युवा वाहिनी कार्यकर्ताओं के दो नंबर के कारोबार को पूरी तरह ठप कर दिया।' उनका दावा है कि अवैध खनन इन कार्यकर्ताओं का साइड-बिज़नेस था और ट्रकों को आगे जाने की इजाजत 'टैक्स' चुकाने के बाद ही मिलती थी। 
 
इसका असर यह हुआ कि लोग युवा वाहिनी का साथ छोडऩे लगे। प्रदेश अध्यक्ष सुनील सिंह अलग हुए और फिर दलित बिरादरी से आने वाले राम लक्ष्मण भी चले गए। सुनील सिंह ने गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में भाजपा को मिली हार की वजह युवा वाहिनी कार्यकर्ताओं के प्रचार से अलग रहने को ही बताया था। एक भाजपा नेता के मुताबिक खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने आदित्यनाथ से कहा था कि अब उन्हें हिंदू युवा वाहिनी की नकेल कसनी चाहिए। लेकिन आदित्यनाथ इसे जल्दी खत्म नहीं होने देना चाहते। इसीलिए आम चुनावों की अधिसूचना जारी होने के दिन ही उनकी सरकार ने युवा वाहिनी के कई पदाधिकारियों को कई बोर्डों एवं निगमों में लाभकारी पदों पर नियुक्त करने का आदेश जारी कर दिया। भले ही आचार संहिता के चलते इन लोगों को लाभ एवं सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं लेकिन चुनाव खत्म होते ही वे पद संभाल लेंगे। एक भाजपा कार्यकर्ता कहते हैं, 'पार्टी में निचले स्तर से आने वाले नामों को आगे बढ़ाने की प्रणाली है लेकिन इस मामले में हमारी तरफ से भेजे गए नाम सूची में नजर ही नहीं आए।'  यह रचनात्मक तनाव क्या असर दिखाएगा? भाजपा समर्थक कहते हैं कि आदित्यनाथ और हिंदू युवा वाहिनी चाहे जो कहें लेकिन सत्ता की कीमत चुकानी ही होती है। उनका मानना है कि आदित्यनाथ के प्रभाव का जरिया रही हिंदू युवा वाहिनी एक दिन खत्म हो जाएगी। 
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