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वित्तीय बचत की पूरी जानकारी आए सामने!

नीलकंठ मिश्रा /  May 03, 2019

अगर रीपो दर, टर्म प्रीमियम और ऋण का विस्तार आदि सभी सामान्य होते हैं तो ऋण दर में दो फीसदी से अधिक की गिरावट आ सकती है। विस्तार से बता रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
क्या हमारी बचत पर्याप्त है? यह सवाल आम परिवारों के साथ-साथ अर्थव्यवस्था की दृष्टिï से भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। बचत में कमी का अर्थ होगा निवेश के लिए कम पूंजी। इसके दो विपरीत परिणाम हो सकते हैं: इससे पूंजी महंगी होती है और अर्थव्यवस्था की विदेशी पूंजी पर निर्भरता बढ़ती है। इनमें बाद वाली स्थिति अर्थव्यवस्था को अस्थिर बनाती है। आम परिवारों की वित्तीय बचत गहन विश्लेषण का विषय है क्योंकि वह अर्थव्यवस्था में सहजता से विचरण करती है और फंड की लागत का अहम वाहक है। निजी कंपनियों और सार्वजनिक उपक्रमों की बचत आमतौर पर उन्हीं में निवेशित हो जाती है। 
 
ऐतिहासिक तौर पर आम परिवारों की वित्तीय बचत अर्थव्यवस्था की कुल बचत का तिहाई रही है। बीते तीन दशकों से यह जीडीपी के नौ फीसदी से 12 फीसदी के बीच रही। इस अनुपात में गिरावट आई और वित्त वर्ष 2017 में यह 9.4 फीसदी रहा। यह दो दशक का निचला स्तर था। इससे अतिशय खपत और अर्थव्यवस्था के निवेश का भुगतान न कर पाने की आशंका उत्पन्न हुई है। ऐसे समय में जबकि वास्तविक ब्याज दर बहुत ऊंची है, यह आंकड़ा विचित्र लगता है क्योंकि आमतौर पर यही वित्तीय बचत को बढ़ावा देता है। वित्त वर्ष 2018 में इसने 11.1 फीसदी के साथ मजबूत वापसी की लेकिन इसकी अधिक चर्चा नहीं हुई। माना जा रहा है कि 2019 में यह 11.3 फीसदी के साथ 9 वर्ष के उच्चतम स्तर तक पहुंचेगी। ऐसा तब है जबकि आरबीआई की अनुमान प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है जिसके बारे में अब अनुमान जताया जा रहा है कि वह सीमित है। 
 
मौजूदा लेखा में अर्थव्यवस्था की कुल बचत को शामिल किया जाता है: यानी उत्पादन पर खपत की अति। परंतु सकल घरेलू वित्तीय बचत का आकलन करना इतनी सीधी सपाट बात नहीं है। हालांकि परिभाषा के आधार पर देखा जाए तो यह औपचारिक है और इसके आकलन के लिए अन्य वृहद आर्थिक चरों की तुलना में कम ही अनुमान की आवश्यकता होती है।  वित्तीय बचत के घटकों को खंगालते हुए हमारा सामना दो बड़े क्षेत्रों से होता है जिनके अनुमान से कम आकलन की संभावना है। पहला, म्युचुअल फंडों की आवक में इजाफा और अल्प बचत योजनाओं के संग्रह में उछाल। वित्त वर्ष 2017 में म्युचुअल फंडों में 3.5 लाख करोड़ रुपये की राशि आई। इसमें से 1.7 लाख करोड़ रुपये की राशि आम परिवारों से आई। जो आंकड़े प्रस्तुत किए गए, उनमें केवल 12,800 करोड़ रुपये की जानकारी दी गई जो 1.7 लाख करोड़ रुपये का 7.5 फीसदी था। म्युचुअल फंड जिन शेयर और डिबेंचर का हिस्सा हैं, उनकी हिस्सेदारी वर्ष 2018 में 1.5 लाख करोड़ रुपये रही। परंतु तब तक मजबूत म्युचुअल फंड आवक के अलावा शेयर बाजार में बढ़ती खुदरा हिस्सेदारी ने वैकल्पिक निवेश फंडों के परिसंपत्ति प्रबंधन को गति दी थी और यह 1.8 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया था। यानी उल्लिखित वित्तीय बचत और उसके अनुमान में जीडीपी के एक फीसदी के बराबर अंतर है। 
 
दूसरा, अल्प बचत योजनाओं में आवक एक वर्ष पहले की 50 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर दो लाख करोड़ रुपये हो चुकी है। परंतु दी गई जानकारी में अभी भी इसे 82,000 करोड़ रुपये बताया जा रहा है जो कि कुल आवक की करीब आधी है।  हमने अनुमान लगाया कि बचत के अनुमान में यह कमी वित्त वर्ष 2017 में जीडीपी के 2 फीसदी के बराबर हो सकती है जबकि वित्त वर्ष 2018 में यह जीडीपी के एक फीसदी से भी अधिक हो सकती है। काफी हद तक यह संभव है कि उपरोक्त तमाम आवक में कुछ हिस्सा ऐसी समायोजन राशि का भी हो जिसे हमने ध्यान में नहीं रखा है।
 
दूसरी बड़ी चिंता पर्यवेक्षकों की यह है कि राज्य और केंद्र सरकारें देश की वित्तीय स्थिति को विसंगतिपूर्ण बना रही हैं। बहरहाल, आम आशंकाएं हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र की बचत का स्वीकरण करता है जबकि बीते कुछ वर्ष के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की बचत की बात करें जीडीपी के प्रतिशत के रूप में उसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है। गैर सरकारी सार्वजनिक संस्थानों की बचत अवश्य सरकारी राजस्व घाटे की भरपाई में काम आई है। विशुद्घ स्तर पर भी देखें तो सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों के ऋण के समायोजन के पश्चात निजी बचत में आ रही कमी में गिरावट आई है। बीते दो वर्ष में संभवत: बजटोतर व्यय के मोर्चे पर हालत खराब हुई हो लेकिन यह गिरावट भी जीडीपी के आधा प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। यह इस अवधि में आम परिवारों की वित्तीय बचत में सुधार से कम होगी। 
 
ये केवल सांख्यिकीय आंकड़े भर नहीं हैं बल्कि इनका अर्थव्यवस्था में फंड की लागत पर भी अहम प्रभाव हो सकता है। जिस ब्याज दर पर कोई संस्था ऋण लेती है, उसे तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है। रीपो दर, टर्म प्रीमियम और ऋण का विस्तार। इनमें से पहला हिस्सा वह दर है जो मौद्रिक नीति समिति द्वारा तय की जाती है, दूसरा है 10 वर्ष के सरकारी बॉन्ड और रीपो दर के प्रतिफल के बीच का अंतर और तीसरा है कंपनी द्वारा लिए गए ऋण की दर और सरकारी प्रतिभूति के प्रतिफल की दर का अंतर। ये तीनों फिलहाल बढ़े हुए हैं। अर्थव्यवस्था के धीमेपन पर गौर करें तो वास्तविक रीपो दर काफी बढ़ी हुई है। टर्म प्रीमियम दशक के उच्चतम स्तर के करीब है। वित्तीय तंत्र में क्षमतागत मसले के चलते ऋण का दायरा भी ऊंचा बना हुआ है। अगर रीपो दर, टर्म प्रीमियम और ऋण का विस्तार, सामान्य होते हैं तो उधार दर में दो फीसदी से अधिक की गिरावट आएगी। मुद्रास्फीति में कमी आने से रीपो दर में गिरावट आ सकती है, लेकिन ऋण का विस्तार जल्दी नहीं सिमटने वाला क्योंकि वित्तीय तंत्र में क्षमता का मसला बरकरार है। परंतु टर्म प्रीमियम अनुचित ढंग से ऊंचा है और इन दोनों में स्पष्टïता आने के साथ उसमें गिरावट आनी चाहिए। इससे यह भी स्पष्टï होगा कि सरकार द्वारा स्वीकृत वित्तीय बचत का स्तर अनुमान से काफी कम होता है। आर्थिक वृद्घि पर निस्संदेह असर पड़ा है क्योंकि सरकार ने राजकोषीय सख्ती अपनाने की कोशिश की है, परंतु उसका लाभ मौद्रिक स्थितियों में परिलक्षित नहीं हो रहा है और वे अत्यंत सख्त बनी हुई हैं। 
 
(लेखक एशिया पैसिफिक स्ट्रैटेजी के सह-प्रमुख और क्रेडिट सुइस के भारत संबंधी नीतिकार हैं।)
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