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चुनाव बाद का गणित

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  May 03, 2019

इस समाचार पत्र में शुक्रवार को प्रकाशित कर राजस्व संबंधी आंकड़े झटका देने वाले हैं। यदि तीन महीने पहले संसद के समक्ष प्रस्तुत किए गए वर्ष 2018-19 के संशोधित राजस्व आंकड़ों से तुलना की जाए तो ताजा आंकड़े, कर राजस्व में 1.6 लाख करोड़ रुपये की कमी दिखाते हैं। यानी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 0.8 फीसदी। इस कमी के कुछ हिस्से की भरपाई व्यय में अंतिम क्षणों में की गई कटौती से होगी। वर्षांत में दी गई जानकारी के मुताबिक यह कटौती करीब 60,000 करोड़ रुपये की है। यदि इसे ध्यान में रखा जाए तो वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे का आंकड़ा, उल्लेख किए गए जीडीपी के 3.4 फीसदी से बढ़कर 3.9 फीसदी हो जाएगा। यह बीते दो वर्ष के आंकड़ों से स्पष्ट गिरावट है। 

 
ये आंकड़े एक और वजह से चौंकाते हैं : केंद्र सरकार की राजस्व वृद्घि केवल 6.2 फीसदी रही। अगर यह कमी 19.5 फीसदी के अत्यंत महत्त्वाकांक्षी राजस्व वृद्घि लक्ष्य की तुलना में रहती तो इसे समझा जा सकता था। ज्यादा चिंता की बात यह है कि सकल संग्रह में वृद्घि (राज्यों के हिस्से को मिलाकर) 8.4 फीसदी रही और यह 11.5 फीसदी की जीडीपी वृद्घि दर (मुद्रास्फीति को शामिल करके सांकेतिक रुप में) से कम है। दूसरे शब्दों में कर-जीडीपी अनुपात में इजाफे का रुझान पलट चुका है। कुछ कमी वस्तु एवं सेवा कर दरों में निरंतर की जा रही कमी की वजह से भी है। इस बीच यह संभवना है कि मुद्रास्फीति के समायोजन के बाद मुख्य आर्थिक वृद्घि दर 7 फीसदी की आधिकारिक तौर पर घोषित दर से कम रह सकती है। मौजूदा वर्ष के लिए इसके निहितार्थ अच्छे नहीं हैं। वर्ष 2019-20 के बजट के आंकड़े 14.9 फीसदी की राजस्व वृद्घि दर का अनुमान जताते हैं। यह अनुमान 2018-19 के लिए प्रकट किया गया था। वास्तविक राजस्व आधार की बात करें तो नए वर्ष के बजट के आंकड़ों को हासिल करने के लिए कर संग्रह में 29.1 फीसदी की गति से वृद्घि जरूरी है। 
 
चूंकि यह संभव नहीं नजर आता है। इसलिए चुनाव के बाद नई सरकार बनते ही सबसे पहले बजट को नए सिरे से आकलित करना होगा। राजस्व और व्यय दोनों ही आंकड़ों में कटौती करनी होगी। इसके बाद ही खपत में आए धीमेपन का आर्थिक गतिविधियों पर असर बेहतर ढंग से परिलक्षित होगा। चूंकि सरकार का अधिकांश व्यय ब्याज भुगतान, सब्सिडी, वेतन और पेंशन जैसी पूूर्व प्रतिबद्घता वाली चीजों से संबंधित है। इसलिए तलवार बुनियादी ढांचे में होने वाले निवेश पर गिरेगी। यह क्षेत्र अब तक वृद्घि का अहम वाहक रहा है। वृद्घि के पूर्वानुमान की बात करें तो कुछ कारकों में सुधार हुआ है। उदाहरण के लिए वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां और अमेरिका तथा चीन के बीच कारोबारी युद्घ में आ रहा धीमापन। तेल कीमतों में इजाफा हुआ है लेकिन कई तेल निर्यातक ईरान से तेल आपूर्ति रुकने के बाद भरपाई के लिए उत्पादन बढ़ा सकते हैं। घरेलू स्तर पर, मॉनसून के आशा के अनुरूप रहने की उम्मीद नहीं है जबकि विमानन और वाहन क्षेत्रों की स्थिति ठीक नहीं है। दूरसंचार क्षेत्र में भी मूल्यहस हो रहा है। 
 
निर्माण क्षेत्र भी सरकारी व्यय पर निर्भर है। वित्तीय और कॉर्पोरेट क्षेत्र फंसे हुए कर्ज और ऋण बोझ के दोहरे संकट से उबर चुके हैं और कर्ज में सुधार हुआ है। परंतु अभी काफी कुछ करना बाकी है और भविष्य में और झटकों की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। मौद्रिक नीति ने वृद्घि को समर्थन देने का प्रयास किया है लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से दरों में कटौती का बाजार में नकदी की स्थिति पर कोई खास असर देखने को नहीं मिला और वास्तविक ब्याज दर ऊंची बनी हुई हैं। इसकी एक वजह सरकारी व्यय का स्तर भी है। हमें चुनाव प्रचार अभियान में किए गए लोक लुभावन वादों को इस संदर्भ में देखना होगा। इनमें कर्ज माफी, नकद हस्तांतरण और संभवत: उच्च खाद्य सुरक्षा आदि शामिल हैं। जाहिर है इन बातों के लिए कोई राजकोषीय गुंजाइश नहीं है। ऐसे वक्त में जबकि मौद्रिक नीति की सीमाओं की परीक्षा हो रही है, तो राजकोषीय व्यय में कमी आनी स्वाभाविक है। खासतौर पर इसलिए चूंकि घाटे के आधिकारिक आंकड़े बैलेंस शीट से इतर ली गई उधारी को छिपाते हैं। सरकारी ऋण और जीडीपी का अनुपात वांछित स्तर से ऊंचा है। खतरे की बात यह है कि चुनाव के बाद बनी सरकार इससे अलग राह चुन सकती है। 
 
वह कमतर मुद्रास्फीति से राहत महसूस करते हुए विस्तारवादी नीतियां अपना सकती है ताकि अव्यावहारिक वादों को पूरा कर सके या फिर अवास्तविक वृद्घि लक्ष्यों को हासिल करने का प्रयास किया जा सके। यानी कुछ ऐसी नीतियां जिनके खिलाफ कुछ अन्य देशों में अलग-अलग मत सुनने को मिल रहे हैं। 
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