बिजनेस स्टैंडर्ड - दिवालिया निपटारे से जुड़ी आशंकाओं का सच होना
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दिवालिया निपटारे से जुड़ी आशंकाओं का सच होना

देवाशिष बसु /  May 02, 2019

आईबीसी प्रक्रिया में आई खामियों और उनको लेकर जताए गए पुराने संदेहों के सच होने को लेकर अपनी बात रख रहे हैं देवाशिष बसु

 
तीन वर्ष पहले, मैंने नई ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) पर नौ आलेखों की शृंखला का पहला आलेख लिखा था। उस समय मैंने अपने आलेख में जो दलील और तर्क प्रस्तुत किए थे उन्हें विचित्र बताया गया था क्योंकि उस वक्त एक प्रतिबद्घ दिख रही सरकार नया कदम उठा रही थी। माना जा रहा था कि नया अधिनियम अब तक इस क्षेत्र में हाथ लगी नाकामी को दूर करेगा और ऐसे कदमों का मार्ग प्रशस्त करेगा जो अब तक नहीं उठाए जा सके थे। यानी दिवालिया मामलों में राज्य का कहीं अधिक गहन हस्तक्षेप। आईबीसी का सफल क्रियान्वयन काफी हद तक सरकार के बढ़े हुए हस्तक्षेप पर निर्भर था। इसमे पंजीयन, प्रमाणन और निगरानी का व्यापक ढांचा शामिल था। 
 
उस वक्त मैंने संदेह प्रकट किया था कि यह पूरी प्रक्रिया बहुत जल्दी गड़बड़ा जाएगी और इसका स्थान अलग-अलग प्रकार की दिक्कतें ले लेंगी जो पहले से ही मौजूद हैं। आईबीसी की शुरुआत से पहले बैंकर, कर्जदार और परिसंपत्ति पुनर्गठन एजेंसियां एक ऐसे कानूनी ढांचे के अधीन काम करती थीं जिसका गठन तीन दशक तक छिटपुट हल और उपाय तलाशने के बाद किया गया था। इसमें ऋण वसूली करने वाले पंचाट और अदालतें आदि भी शामिल थे। इस दौरान सौदेबाजी भी होती थी, लंबे समय तक निष्क्रियता भी रहती थी, तमाम गतिरोधों के साथ निपटारे और हजारों अनसुलझे मामले। हर किसी को यह लगा कि अगर समयबद्घ तरीके से काम करने वाली और आईबीसी की निगरानी वाली निपटारा योजना आ जाती है तो राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट के अधीन एकदम अलग नतीजा देखने को मिल सकता है। 
 
तीन वर्ष बीत चुके हैं और मेरी आशंकाएं सच साबित हो रही हैं। आईबीसी के जल्द निस्तारण से जुड़ा उत्साह अब नदारद हो रहा है। कुल 898 चल रहे मामलों में से बमुश्किल 79 मामलों को ही नई व्यवस्था के तहत निपटाया जा सका। इस अधिनियम के अधीन ऋणशोधन का कोई भी मामला 270 दिन के भीतर निपटाया जाना आवश्यक है। अगर उस वक्त तक परिसंपत्ति का कोई खरीदार नहीं मिलता है तो निस्तारण पेशेवर कंपनी को बंद करके और बेचकर पैसे जुटा लेगा। बहरहाल, करीब 275 मामले ऐसे हैं जो 270 दिन की तय सीमा पार कर चुके हैं। इनमें एस्सार स्टील का मामला प्रमुख है जो करीब 50,000 करोड़ रुपये का है। यह मामला करीब 600 दिनों से भी अधिक समय से लंबित है और विभिन्न अदालतों के चक्कर काट रहा है। 
 
इस बीच निस्तारण के लिए जो भी मामले गए, उनमें से अधिकांश में बैंकरों, प्रवर्तकों और निस्तारण पेशेवरों का गठजोड़ अक्षुण्ण बना हुआ है। राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट के कई निर्णय ऐसे हैं जिन्होंने हर किसी को भ्रमित कर दिया है। अगर कुछ और नहीं तो भी कानून में निरंतर संशोधन, बैकों और अदालतों द्वारा उठाए गए मनमाने कदम और लंबे समय तक चलने वाले अदालती मामले तथा भ्रष्टाचार आदि आईबीसी को धता बता देंगे। जरा ऐसे ही कुछ मसलों पर विचार कीजिए जिनका हमने यूं ही चयन किया है:
 
आखिरकार जेट एयरवेज की स्थिति इस प्रकार अचानक खराब क्यों हुई जबकि उसकी हिस्सेदारी रखने वाले सरकारी बैंकों ने इस घटना की आशंका चार महीने से भी अधिक पहले जता दी थी। 
 
राष्ट्रीय कंपनी लॉ अपीली पंचाट ने हाल में एक आदेश पारित किया जिसके तहत प्रवर्तक उस वक्त भी कर्जदाताओं के साथ निपटारा कर सकेंगे जबकि कंपनी के नकदीकरण की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी हो। इससे धारा 29ए के संशोधन का क्या होगा जिसके तहत देनदारी में चूक करने वालों को कंपनियों का नियंत्रण वापस मिलने से रोकने की व्यवस्था की गई थी? क्या सरकार इस निर्णय को चुनौती देगी? 
 
करीब छह महीने पहले आईबीसी में संशोाधन करके धारा 12ए जोड़ी गई थी। यह धारा उस स्थिति में किसी कॉर्पोरेट कर्जदार के विरुद्घ ऋणशोधन प्रक्रिया को खत्म करने की इजाजत देती है जबकि कर्जदारों की समिति के 90 फीसदी हिस्सेदार इस बात पर अपनी सहमति जताते हों। तब से अब तक करीब 80 मामलों में इस प्रावधान का इस्तेमाल किया जा चुका है। यह आंकड़ा पिछले वर्ष से दोगुना है। सरकारी क्षेत्र के बैंकर और प्रवर्तक, जो जवाबदेह नहीं हैं, वे हालात का लुत्फ लेते रह सकते हैं। इन कंपनियों को शायद अब नया ऋण मिल सकेगा। यह कर्ज भी फंसे हुए कर्ज में तब्दील होगा। स्विस रिबन इन्सॉल्वेंसी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऋणशोधन प्रक्रिया केवल तभी तक रद्द की जा सकती है जब तक कि सीओसी का गठन न किया गया हो, भले ही मामला एनसीएलटी के अधीन जा चुका हो।  
 
गत वर्ष सितंबर तक के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय कर्जदाताओं को अपने दावे के 25 फीसदी तक ही राशि वापस मिल सकेगी। आईबीसी के पहले की व्यवस्था भी कुछ ऐसी ही थी। मुझे आशंका है कि अगर प्रवर्तक मालिकाना बरकरार रखने में कामयाब रहते हैं तो भविष्य में यह आंकड़ा और अधिक गिर सकता है। 
 
सर्वोच्च न्यायालय ने रिजर्व बैंक के 12 फरवरी 2018 के सर्कुलर को रद्द कर दिया है। यह सर्कुलर बैंकों से मांग करता था कि वे एक दिन की देरी होने पर भी कर्ज को फंसे हुए कर्ज के रूप में वर्गीकृत कर दें। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद कंपनियों पर बैंकों की राशि चुकता करने का दबाव काफी कम हो गया है। 
 
बैंकों और प्रर्वतकों के गठजोड़ के एक निर्लज्ज उदाहरण में आंध्र बैंक और अन्य कर्जदाताओं ने स्टर्लिंग बायोटेक के संदेसरा समूह के भगोड़े डिफॉल्टरों के साथ एकबारगी निस्तारण का प्रयास किया। जबकि स्टर्लिंग एसईजेड में भी ऐसे ही एक सौदे का प्रस्ताव रखा गया था लेकिन एनसीएलटी ने न केवल कंपनी का नकदीकरण कर दिया बल्कि सरकार को यह निर्देश भी दिया कि वह वरिष्ठ बैंकरों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करे क्योंकि उन्होंने पंचाट को गुमराह करने का प्रयास किया। 
 
आईबीसी के मुताबिक आवेदन 14 दिन के भीतर होना चाहिए। कानूनी ढांचा इतना कमजोर है कि अदालतों ने यह तय कर लिया है कि 15 दिन की अवधि अनिवार्य नहीं है और कई मामले एक वर्ष से अधिक समय से लंबित हैं। 
 
लिबर्टी हाउस एमटेक ऑटो और आधुनिक मेटल्स के लिए सफल बोलीकर्ता के रूप में उभरी लेकिन उसके राशि न चुकाने से प्रक्रिया को धक्का पहुंचा है। 
सरकार ने 27 दिवालिया अदालतों की योजना बनाई जिनमें से आधी ही संचालित हैं।  इस बीच आधे-अधूरे उपाय जगह बना रहे हैं। मसलन मध्यस्थता। मैंने दो वर्ष पहले ही कहा था कि आईबीसी की मूल कमी यह है कि यह प्रवर्तकों, अधिवक्ताओं और राजनेताओं द्वारा व्यवस्था को धता बताने की कोशिशों को ध्यान में नहीं रखता। मैं भ्रमित करने वाले अदालती निर्णयों का जिक्र करने से चूक गया था। ऐसी परिस्थितियों में सरकार हालात सुधारने की कोशिश में और गड़बड़ी कर देती है। फंसे हुए कर्ज के साथ भी यही हुआ था। आईबीसी के साथ भी यही होगा।
Keyword: IBC, code, IBBI, NCLT, RBI,,
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