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आरटीआई अधिनियम की उलझन में फंस गया आरबीआई

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  May 01, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के लिए अप्रैल का महीना उच्चतम न्यायालय से संबंधित मामलों में बहुत सुखद नहीं रहा है। गत 2 अप्रैल और 26 अप्रैल को जारी शीर्ष अदालत के दो आदेश आरबीआई को यह सोचने पर मजबूर करेंगे कि बैंकों के नियमन की राह पर उसे किस तरह कदम बढ़ाना चाहिए?  उच्चतम न्यायालय ने 2 अप्रैल को आरबीआई के उस परिपत्र को निरस्त कर दिया जिसे 12 फरवरी 2018 को जारी किया गया था। उस परिपत्र में बैंकों के लिए कर्ज भुगतान में एक दिन की भी देरी करने पर कंपनियों के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने संबंधी मानक तय किए गए थे। इस परिपत्र को निरस्त करने का फैसला फंसी परिसंपत्तियों के खिलाफ जारी आरबीआई की मुहिम के लिए एक झटका था। 

 
आरबीआई इस फैसले के बाद अब संशोधित परिपत्र को अमलीजामा पहनाने में जुटा हुआ है। समझा जा सकता है कि केंद्रीय बैंक का शीर्ष प्रबंधन इस बात को लेकर फिक्रमंद होगा कि उसके संशोधित परिपत्र पर उच्चतम न्यायालय किस तरह देखेगा और भविष्य में किसी तरह की विपरीत टिप्पणियों से बचने के लिए उसे क्या एहतियात बरतनी चाहिए? यह भी देखना होगा कि नए परिपत्र को कर्जदार किस तरह देखते हैं और कहीं उसे भी अदालत में चुनौती तो नहीं दी जाएगी? शीर्ष अदालत के 26 अप्रैल को जारी आदेश ने भी आरबीआई को असहज कर दिया है। उच्चतम न्यायालय ने अदालत की अवमानना के मामले में आरबीआई को दोषी नहीं ठहराया है लेकिन बैंकों की वार्षिक पर्यवेक्षण रिपोर्ट (एआईआर) के बारे में जानकारियों को सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत लाने और इन रिपोर्टों के खुलासे से संबंधित अपनी नीति वापस लेने का उसे अंतिम मौका दिया है। आरबीआई ने दलील दी थी कि बैंकों की एआईआर की सूचनाओं को आरटीआई अधिनियम की धारा 8 के उपबंधों 1(डी) और 1(ई) के तहत छूट मिली हुई है। यह आरबीआई की अपनी ही खुलासा न करने की नीति का उल्लंघन होगा। उच्चतम न्यायालय ने यह माना है कि जानकारी देने से छूट के प्रावधान वाले ये उपबंध उन जानकारियों पर लागू नहीं होते हैं जिन्हें याचियों ने आरटीआई अधिनियम के तहत मांगा है।
 
आखिर गड़बड़ी कहां हो गई? पहली बात, आरबीआई का अपनी ही खुलासा नीति के तले शरण लेने की सोच गलत थी और उसे कानूनी समर्थन भी नहीं था। यह भी सच है कि आरबीआई अधिनियम की धाराएं 45-ई और 45-एनबी एक बैंक के ऋण एवं अन्य लेनदेन से संबंधित सूचनाएं किसी से भी साझा करने की इजाजत आरबीआई को नहीं देती हैं। लेकिन आरटीआई अधिनियम का अधिक बड़ा दायरा और प्रासंगिकता है। आरटीआई अधिनियम की धारा 22 आरबीआई अधिनियम की धारा 45ई और 45एनबी को अध्यारोपित कर देती है। धारा 22 कहती है, 'इस अधिनियम के प्रावधान सरकारी गोपनीयता कानून 1923 और उस समय लागू किसी भी अन्य कानून में निहित प्रावधानों के साथ असंगत होंगे।' ऐसा लगता है कि आरटीआई कानून के तहत सूचना देने से मना करने के अपने फैसले के बचाव में आरबीआई ने अपनी खुलासा नीति का हवाला देने में असावधानी दिखाई। आरटीआई अधिनियम की धारा 22 बाकी सभी कानूनों को अध्यारोपित करने की ताकत देती है।
 
बड़ा सवाल यह है कि सर्वोच्च अदालत का ऐसा क्यों मानना था कि एआईआर के खुलासे को 'वाणिज्यिक भरोसे समेत सूचना' या 'विश्वासपरक संबंध में उपलब्ध सूचना' के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि इस सूचना के जारी होने से तीसरे पक्ष की प्रतिस्पद्र्धी हैसियत प्रभावित हो सकती है और सामान्यत: उन्हें आरटीआई अधिनियम के दायरे से बाहर रखा गया है। इसी से जुड़ा सवाल है कि क्या आरबीआई ने बैंकों की एआईआर में संकलित सूचनाओं के उन हिस्सों को अलग रखकर बाकी जानकारियों को साझा करने के बारे में कभी सोचा जो वाणिज्यिक भरोसे एवं विश्वासपरक संबंध का उल्लंघन न करते हों?
 
अब भी यह साफ नहीं है कि आरबीआई ने सार्वजनिक हित के नजरिये से इस मामले को देखा था या नहीं। आरटीआई अधिनियम कहता है कि वाणिज्यिक भरोसा या विश्वासपरक संबंध को कमतर करने वाली सूचना फिर भी उस स्थिति में साझा की जा सकती है जब एक सक्षम प्राधिकारी यह तय करे कि व्यापक सार्वजनिक हित में ऐसा खुलासा किया जाना जरूरी है। ऐसे निर्णय कर सकने वाले सक्षम प्राधिकारी में राष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल, लोकसभा या विधानसभा का स्पीकर, उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश और केंद्रशासित क्षेत्र का प्रशासक शामिल होता है।
 
ऐसा लगेगा कि आरटीआई कानून के अनुपालन संबंधी सवाल पर आरबीआई का रवैया कानून के विभिन्न प्रावधानों की समुचित जानकारी से प्रभावित रहा है। अगर आरटीआई कानून की धारा 22 बाकी सब पर भारी पड़ती है तो फिर आरबीआई को अपने बचाव में खुलासा नीति का जिक्र क्यों करना चाहिए था?  अगर आरटीआई कानून के तहत मांगी गई कुछ जानकारी वाणिज्यिक भरोसे या विश्वासपरक संबंध को कम करती है तो उस हिस्से को अलग करने के लिए उपलब्ध कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल क्यों न किया जाए? आरबीआई ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अनमनीय रुख अपनाकर बैंकों और वाणिज्यिक रूप से संवेदनशील सूचना की गोपनीयता को लेकर न चाहते हुए भी समस्या खड़ी कर दी है।
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA,,
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