बिजनेस स्टैंडर्ड - बीआरआई पर चीन ने बदली चाल
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बीआरआई पर चीन ने बदली चाल

हर्ष वी पंत /  May 01, 2019

ढांचागत विकास को लेकर चीन की महत्त्वाकांक्षी पहल बीआरआई को लेकर दुनिया भर में बढ़ती चिंताओं के बीच उसने अपने रुख में नरमी लाने के संकेत दिए हैं। बता रहे हैं हर्ष वी पंत 

 
पिछले हफ्ते चीन ने बेल्ट एवं रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) पर दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी की है। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अपनी इस ढांचागत विकास पहल को पूरी दुनिया के लिए अच्छा बताते हुए कहा है कि 'भले ही बीआरआई की शुरुआत चीन ने की थी लेकिन इससे पैदा होने वाले अवसर और परिणाम सारी दुनिया के लिए हैं।' बीआरआई सम्मेलन में व्यक्त इस उद्गार में सबसे उल्लेखनीय बात चिनफिंग के वक्तव्य में विनम्रता का नजर आना था जबकि 2017 में हुए पहले सम्मेलन में मिजाज काफी हद तक अभिमान से भरा रहा था। पिछले कुछ वर्षों में चीन की परियोजनाओं को लगे अवरोधों ने चिनफिंग को इस साल यह मानने के लिए बाध्य कर दिया कि चीन बीआरआई की परियोजनाओं में मान्य नियमों एवं मानकों को लागू करेगा ताकि ऊंचा मानदंड, लोगों के लिए लाभदायक और टिकाऊ होना सुनिश्चित किया जा सके। उन्होंने कहा, 'हम यह तय करेंगे कि निर्माण, परिचालन, बिक्री एवं निविदा प्रक्रिया से जुड़ी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय नियमों एवं मानदंडों का पालन करें और उन देशों के नियमों का सम्मान करें।'
 
बीआरआई फोरम में 36 देशों के शासन प्रमुखों ने शिरकत की। इस तरह चीन अफ्रीका एवं यूरोप जैसे दुनिया के बड़े हिस्सों तक अपनी पहुंच का दायरा बढ़ाने में सफल रहा है। गत मार्च में इटली इस पहल का हिस्सा बनने के साथ ही संपन्न देशों के समूह जी-7 का पहला सदस्य बन गया। उसके बाद लक्जमबर्ग और स्विट्जरलैंड भी बीआरआई में शामिल हो गए। चीन ने जी-17 प्लस ग्रीस समूह के साथ भी बड़े ढांचागत करार पर हस्ताक्षर कर पूर्वी एवं मध्य यूरोप को भी अपने दायरे में ले लिया है। चीन अप्रैल की शुरुआत में संपन्न दूसरे अरब सुधार एवं विकास फोरम के जरिये 'बेल्ट एवं रोड का निर्माण करो और विकास एवं समृद्धि साझा करो' के संदेश के साथ अरब दुनिया तक पहुंच चुका है। मार्च में चीन और रूस 'ध्रुवीय रेशम मार्ग' की दिशा में पहले गंभीर कदम बढ़ाते हुए नजर आए थे।
 
हालांकि मौजूदा समय में दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया क्षेत्र ही बीआरआई के केंद्र में हैं और उन्होंने इस परियोजना को पूरे मन से गले लगाया है। यूरोप महाद्वीप के बड़े सत्ता केंद्रों में चीन की इस पहल को लेकर बढ़ती आशंकाओं के बावजूद अब यूरोप भी अधिक महत्त्वपूर्ण बनकर उभरा है। चीन की तमाम कोशिशों के बावजूद अफ्रीका, लातिन अमेरिका और पश्चिम एशिया अब भी बीआरआई के लिए उतने अहम नहीं बन पाए हैं जितना उसके कर्ताधर्ताओं ने सोचा होगा। भारत की आपत्तियों को देखते हुए दक्षिण एशिया का इलाका अब भी दूर की कौड़ी लग रहा है। पिछले हफ्ते हुए बीआरआई सम्मेलन में दक्षिण एशिया से केवल पाकिस्तान एवं नेपाल की सरकारों के मुखिया ही शरीक हुए थे।
 
जहां चीन के राष्ट्रपति ने बीआरआई फोरम की बैठक में 64 अरब डॉलर मूल्य से अधिक के करारों पर दस्तखत होने को लेकर लंबे-चौड़े दावे किए वहीं उन्हें यह मानने के लिए भी बाध्य होना पड़ा कि वर्ष 2013 में इस पहल की संकल्पना रखे जाने के बाद से यह परियोजना विवादों में उलझी रही है। अमेरिका पहली बीआरआई बैठक में शिरकत करने के बावजूद इसकी परियोजनाओं में 'वित्त जुटाने के अपारदर्शी तरीकों, खराब कामकाज और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानकों एवं मानदंडों के प्रति असम्मान' को लेकर चिंताएं जताता रहा है। इस बार तो उसने बैठक में अपने किसी आला अधिकारी को भेजने से भी मना कर दिया। जिस एकतरफा ढंग से इस परियोजना की संकल्पना की गई और उसका खाका खींचा गया, उसे लेकर दुनिया भर में आलोचना होती रही है। आलोचकों का यह कहना रहा है कि बीआरआई असल में पूरी दुनिया पर चीन के प्रभाव को मजबूत बनाने की रणनीति का हिस्सा है जिसमें तमाम देश चीन के 'कर्ज के जाल' में फंसकर उस पर वित्तीय रूप से आश्रित हो जाएंगे। 
 
दरअसल बीआरआई के जरिये चीन जिस नियामकीय व्यवस्था को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है वह परियोजना की वित्तीय एवं पर्यावरणीय वहनीयता संबंधी सवालों को लेकर खासी समस्यापरक रही है। अब ये सवाल विमर्श के केंद्र में आने लगे हैं। दुनिया भर के देशों ने बहुत मजबूती से अपनी आपत्तियां रखी हैं और चीन को उनके साथ सामंजस्य बिठाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। दूसरे बड़े देशों ने भी अपने स्तर पर ढांचागत पहल शुरू करने के प्रस्ताव रखे हैं। इसी के साथ यह भी सच है कि चीन ने पूरी दुनिया को ढांचागत विकास के मोर्चे पर मौजूद बड़ी खाई की तरफ ध्यान आकृष्ट करने के लिए बाध्य कर दिया है। ढांचागत सुविधाओं की कमी ने वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को अपनी चपेट में लिया हुआ है और विकसित दुनिया भी यह मानने पर मजबूर हुई है कि एक वैश्विक आर्थिक दृष्टिकोण पेश करने में उसकी भी सीमाएं हैं। अगर चीन के इस मॉडल पर आज सवाल खड़े हो रहे हैं तो भारत समेत दूसरी बड़ी शक्तियों के लिए यह विश्वसनीय एवं टिकाऊ विकल्प पेश कर रिक्त स्थान की भरपाई करने के अवसर भी पैदा करता है। भारत ने इस दिशा में कुछ कदम बढ़ाए भी हैं। संपर्क एवं आधारभूत ढांचे की मांग काफी अधिक है और कोई भी अकेली ताकत उसे पूरा कर पाने की हैसियत में नहीं है। इसके लिए एक वैश्विक प्रयास की जरूरत होगी। भले ही चीन ऐसा न चाहे लेकिन बहुआयामी दृष्टिकोण ही इस समस्या से निपटने का इकलौता तरीका है। 
 
बीआरई फोरम की पिछले हफ्ते संपन्न बैठक में चिनफिंग ने इस पहल के पीछे अपने देश की अच्छी मंशा और पारदर्शिता के प्रति वचनबद्धता को रेखांकित करने की पुरजोर कोशिश की। उन्होंने कहा कि चीन उच्च गुणवत्ता वाला टिकाऊ, जोखिम-रोधी, किफायती लागत वाला और समावेशी ढांचा बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। ऐसा लगता है कि चिनफिंग को यह बात समझ में आ गई है कि बीआरआई को लेकर उनका शुरुआती रवैया उलटा पड़ गया है और अब वह उसमें सुधार करना चाहते हैं। सवाल यह है कि चीन की महत्त्वाकांक्षाओं के साथ तालमेल बिठाने में बाकी दुनिया कितनी दूर तक जा सकती है?
 
(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन नई दिल्ली में निदेशक-अध्ययन और किंग्स कॉलेज लंदन में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर हैं)
Keyword: india, china, BRI, infra,,
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