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उत्तर प्रदेश में मुस्लिम उम्मीदवार असल में अल्पसंख्यक

वीरेंद्र सिंह रावत /  May 01, 2019

उत्तर प्रदेश में 7 अप्रैल को 'महागठबंधन' की पहली जनसभा को संबोाधित करते हुए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती ने बड़ी चतुराई से मुस्लिम कार्ड खेला। उन्होंने इस अल्पसंख्यक समुदाय से महागठबंधन के उम्मीदवारों को मत देने की अपील की, ताकि केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हराया जा सके।  मायावती ने सहारनपुर जिले के देवबंद में जो अपील की थी, उससे एक बड़ा संकेत यह मिलता है कि महागठबंधन ने भाजपा को हराने के लिए इस समुदाय पर बड़ा दांव लगाया है। देवबंद में मुस्लिम आबादी काफी बड़ी है और देवबंद शिक्षण संस्था है। महागठबंधन में बसपा, समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) शामिल हैं। 

 
मायावती के इन बयानों के कारण ही चुनाव आयोग ने उन पर 48 घंटे तक चुनाव प्रचार नहीं करने का प्रतिबंध लगाया था। ऐसी सूरत में यह विरोधाभास है कि एक ओर महागठबंधन मुस्लिमों के पूरे वोट हासिल करने की कोशिश कर रहा है। दूसरी तरह उसने इस अल्पसंख्यक समुदाय के उम्मीदवारों की संख्या 2014 की तुलना में घटाकर आधी कर दी है। हालांकि कांग्रेस औपचारिक रूप से महागठबंधन का हिस्सा नहीं है। लेकिन उसने और महागठबंधन ने एक-दूसरे के प्रति सहयोगात्मक रुख अपनाया है। लेकिन दोनों के बीच कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में कड़ा मुकाबला है। 
 
सपा और बसपा ने कांग्रेस के गढ़ रायबरेली और अमेठी में अपने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं। वहीं कांग्रेस ने सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उनकी (अखिलेश) पत्नी डिंपल यादव के खिलाफ मैनपुरी, आजमगढ़ और कन्नौज लोक क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है। कांग्रेस ने मुजफ्फरनगर और बागपत में भी अपने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं। मुजफ्फरनगर से रालोद अध्यक्ष अजित सिंह और बागपत से उनके बेटे जयंत चौधरी महागठबंधन के उम्मीदवार हैं। वर्ष 2014 में सपा, बसपा और कांग्रेस ने कुल 41 मुस्लिमों को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन इस बार यह संख्या आधी से भी कम (18) है। 
 
चुनाव पूर्व गठबंधन के तहत सपा, बसपा और रालोद क्रमश: 37, 38 और 3 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं। सपा ने वर्ष 2014 में 13 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन इस बार पार्टी ने अभी तक (इसने सभी सीटों के लिए उम्मीदवार घोषित नहीं किए हैं) केवल चार उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं। इसी तरह 2014 में बसपा के 19 मुस्लिम उम्मीदवार थे, लेकिन इस बार यह संख्या 6 है। रालोद का कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं है।  वर्ष 2014 में कांग्रेस ने 9 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, लेकिन इस बार अभी तक यह संख्या 8 है। हालांकि अभी पार्टी ने कुछ सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है। राजनीतिक पंडित इस बात को स्वीकार करते हैं कि यह महागठबंधन का एक रणनीतिक कदम है, ताकि मतों का विभाजन रोका जा सके और भाजपा को मतदाताओं के ध्रुवीकरण का मौका न मिले। सभी राजनीतिक दलों ने 2014 में अलग-अलग चुनाव लड़े थे। ऐसे में मुस्लिमों समेत मतों के विभाजन और मोदी लहर के कारण भाजपा और उसकी सहयोगी अपना दल राज्य की 80 सीटों में से 73 जीतने में सफल रहीं। सामाजिक इतिहासकार और जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान (इलाहाबाद) के निदेशक बद्री नारायण ने कहा कि सपा-बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवार चुनने में संतुलन साधने की कोशिश की है ताकि भाजपा को चुनावों के दौरान 'मुस्लिम-विरोधी' बयानबाजी तेज करने का मौका न मिले। 
 
उन्होंने कहा, 'निश्चित रूप से महागठबंधन' की मुस्लिम मतों पर नजर है, लेकिन वह भाजपा को अल्पसंख्यक उम्मीदवारों के मुद्दे को भड़काने का कोई हथियार नहीं देना और बहुसंख्यक मतदाताओं को अपने खिलाफ नहीं करना चाहता। उन्होंने कहा कि यहां तक कि कांग्रेस भी भाजपा से मुकाबले के लिए 'हिंदुत्व पर नरम रुख' की रणनीति अपना रही है।  उत्तर प्रदेश की आबादी में मुस्लिमों की तादाद करीब  20 फीसदी है। ज्यादातर मुस्लिम आबादी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में हैं। ऐसे करीब 36 निर्वाचन क्षेत्र हैं, जहां मतदान में मुस्लिमों में की अहम भूमिका होती है। यह धारणा है कि यह समुदाय एकतरफा मतदान करता है। उत्तर प्रदेश में करीब एक दर्जन ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं, जहां मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से अधिक है। इनमें सहारनपुर, बागपत, बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, रामपुर, बरेली, संभल, मुरादाबाद और बहराइच शामिल हैं। चुनावी मुकाबले के प्रमुख मुस्लिम उम्मीदवारों में सपा के आजम खान (रामपुर) और तबस्सुम हसन (कैराना), बसपा के मोहम्मद याकूब कुरैशी (मेरठ) तथा अफजल अंसारी (गाजीपुर) और कांग्रेस के इमरान मसूद (सहारनपुर), नसीमुद्दीन सिद्दीकी (बिजनौर), सलीम शेरवानी (बदायूं) और सलमान खुर्शीद (फर्रूखाबाद) शामिल हैं। वर्ष 2004 में उत्तर प्रदेश में 10 मुस्लिम उम्मीदवार जीते थे। लेकिन वर्ष 2009 में यह संख्या 7 और 2014 में शून्य हो गई। 
 
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के सदस्य जफरयाब जिलानी ने कहा, 'महागठबंधन ने उम्मीदवार उतारने में जीत की संभावना को आधार बनाया है और उसने इसे अन्य किसी नजरिये से नहीं देखा है।' उन्होंने कहा कि समुदाय में सपा-बसपा के टिकट वितरण को लेकर कोई नाराजगी नहीं है क्योंकि उन्होंने अपनी नीति जीत की संभावनाओं और ध्रुवीकरण रोकने को ध्यान में रखते हुए बनाई है। ध्रुवीकरण से भाजपा को मदद मिल सकती थी। 
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