बिजनेस स्टैंडर्ड - भू-अभियांत्रिकी में व्याप्त अनिश्चितता
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भू-अभियांत्रिकी में व्याप्त अनिश्चितता

अरुणाभ घोष /  April 30, 2019

जलवायु भू-अभियांत्रिकी पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था में जानबूझकर किया गया हस्तक्षेप है ताकि वैश्विक तापवृद्घि की समस्या को नियंत्रित किया जा सके। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अरुणाभ घोष

 
सन 2030 की कल्पना कीजिए। एक दशक की रिकॉर्ड तोड़ ताप वृद्घि और तीन वर्ष के लगातार सूखे के बाद चीन ने सूर्य की रोशनी को परावर्तित करने और तापवृद्घि में कमी लाने के लिए स्ट्रैटोस्फेयर में सल्फेट पार्टिकल डाल दिए हैं। एक वर्ष बाद भारत के मॉनसून को गहरा झटका लगता है और फसलों को भारी नुकसान होता है। यह स्पष्टï नहीं है कि मॉनसून पर यह नकारात्मक प्रभाव चीन के हस्तक्षेप के कारण हुआ या नहीं। यह मसला कैसे हल होगा? क्या यह केवल जलवायु परिवर्तन संबंधी वार्ताओं तक सीमित रहेगा? या इसके लिए कहीं अधिक गहरे राजनीतिक हस्तक्षेप की आवश्यकता होगी। 
 
मार्च में नैरोबी में संयुक्त राष्टï्र पर्यावरण सभा (यूएनईए-4) के चौथे सत्र में एक मसौदा प्रस्ताव वापस लेना पड़ा क्योंकि संबंधित पक्षकार किसी सहमति पर नहीं पहुंच सके थे। यह प्रस्ताव जलवायु भू-अभियांत्रिकी (सीजीई ) तकनीक की स्थिति के आकलन से संबंधित था और गहन वैश्विक जोखिम और विपरीत प्रभाव की चिंता से उपजा था। स्विट्जरलैंड समेत बुर्कीना फासो, मेक्सिको और दक्षिण कोरिया जैसे 10 देशों ने यह प्रस्ताव रखा था कि जलवायु भू-अभियांत्रिकी विज्ञान का आकलन किया जाए और इसमें शामिल कारकों और गतिविधियों पर भी ध्यान दिया जाए। इतना ही नहीं इसके संभावित प्रभाव और संचालन विकल्पों पर भी बात होनी थी। इसकी नाकामी यह बताती है कि सीजीई का वैश्विक संचालन अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। यह तकनीकी शोध, राजनीतिक हस्तक्षेप, विभिन्न मंचों की वैधता और आम जन के विश्वास आदि सभी बातों पर लागू होता है।
 
जलवायु भू अभियांत्रिकी यानी सीजीई पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था में किया गया व्यापक हस्तक्षेप है जो वैश्विक तापवृद्धि को सीमित करने से संबंधित है। इसमें दो श्रेणियां शामिल हैं: कार्बन डाई ऑक्साइड को कम करके वातावरण में सीओ2 का संघनन कम करना और सौर विकिरण प्रबंधन के माध्यम से पृथ्वी की परावर्तनत शक्ति में इजाफा करना और पृथ्वी की सतह से होने वाले इन्फ्रारेड विकिरण को कम करना ताकि ताप वृद्धि सीमित हो। विफल हुए समझौते से पहला सबक तो यही निकलता है कि अनिश्चितता के संचालन को लेकर कोई सहमति नहीं है। अनिश्चितताओं का संबंध प्रभाव, दूसरे दर्जे के प्रभाव, सुरक्षा और सीजीई तकनीक की व्यवहार्यता से है। कार्बन कम करने से जुड़े जोखिम सौर भू-अभियांत्रिकी से जुड़े जोखिम से अलग हैं। उदाहरण के लिए कार्बन युक्त जैव ईंधन और कार्बन निकासी का विचार जमीन की व्यापक आवश्यकता का प्रश्न उत्पन्न करता है। परंतु वातावरण में सल्फेट के कण डालने का असर अन्य क्षेत्रों में होने वाली वर्षा पर भी पड़ेगा।
 
अमेरिका ने जहां कार्बन खत्म करने और सौर भू-अभियांत्रिकी को एकजुट करने का विरोध किया वहीं यूरोपीय संघ ने दलील दी कि सीजीई तकनीक बेहतर है। प्रस्तावित समझौते में आकलन को लेकर सतर्कता भरा रुख अपनाकर सही किया गया था। सन 2010 में जैव विविधता को लेकर आयोजित सम्मेलन और अधिक सतर्कता भरा था। यह वह समय था जब विभिन्न पक्षों ने भू-अभियांत्रिकी गतिविधियों पर निषेध लगाया था क्योंकि उनसे जैव विविधता प्रभावित हो सकती थीं। परंतु स्विस प्रस्ताव का विरोध करने वालों, खासकर, अमेरिका और सऊदी अरब ने इस कमजोर ढंग से सीमा तय करने वाले ढांचे का भी विरोध किया। अगर कमियों को दूर करते हुए इस दिशा में शोध का सही संचालन करना है तो एक न्यूनतम समझ आवश्यक है।
 
दूसरी बात, उत्सर्जन में कमी, जलवायु अनुकूलन और भू-अभियांत्रिकी की सीमा स्पष्ट करने के भरपूर प्रयास होंगे। अकादमिक जगत और वैज्ञानिकों ने अलग कंप्यूटर मॉडलिंग, छोटे पैमाने के जमीनी अनुभव, बड़े पैमाने के अनुभव, व्यापक प्रयोग आदि को अपनाया है लेकिन कई देशों के असली चिंता यह है कि सीजीई का शोध कार्बन उत्सर्जन में कमी से जुड़े लाभ को सीमित कर देगा।  कुछ सूत्रों के मुताबिक अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध इसलिए किया क्योंकि उसके मुताबिक भू-अभियांत्रिकी उत्सर्जन में कमी का विकल्प नहीं है। यह बात बहुत गहरे तक समस्या वाली है। जलवायु परिवर्तन संबंध पेरिस समझौते के तहत जिन कदमों का वादा किया गया है वे ताप वृद्धि को स्थिर करने के लिए जरूरी कदमों से काफी कम हैं। अगर सबसे अधिक प्रदूषण पैदा करने वाले देश सीजीई को उत्सर्जन में कमी का संभावित विकल्प मानते हैं तो इससे गहन अन्याय का संकेत निकलता है और यह ऐतिहासिक जवाबदेही की भावना को खारिज करता है।
 
तीसरा, भूअभियांत्रिकी पर किस मंच पर चर्चा हो, यह भी तय नहीं है। न ही वैज्ञानिकों के स्वनियमन के लिए कोई आदर्श आचार संहिता है न ही राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कोई व्यवस्था है। अगर हमें विश्व स्तर पर तकनीकी हस्तक्षेप पर बात करनी है तो इसके लिए राजनीतिक चर्चा और संभावित विवादों पर बातचीत करना आवश्यक है। यूएनईए के समझौते का विरोध करने वालों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल या संयुक्त राष्ट्र का जलवायु परिवर्तन संबंधी खाका कहीं अधिक प्रासंगिक मंच थे। आईपीसीसी के पास संचालन विकल्पों का सुझाव देने का अधिकार नहीं था। कई अन्य बहुपक्षीय संधियां हैं जो प्रासंगिक हैं: मांट्रियल प्रोटोकॉल, लंदन प्रोटोकॉल, मारपोल आदि ऐसी ही संधियां हैं। परंतु प्रश्न यह है कि विभिन्न देश किस मंच पर प्रोत्साहन और प्रेरणा की बात करें या कुछ गलत होने पर कानूनी सहायता कहां पाएं? 
 
सीजीई के विरोधी उस संचालन का विरोध करेंगे जो आगे के शोध को संभव बनाता है, उसके हिमायती वैश्विक संचालन पर सवाल उठाएंगे जो वैज्ञानिक शोध को अत्यंत प्रतिबंधात्मक बनाते हुए नियमन करता है। ऐसा एक मंच मिलना मुश्किल है जो तकनीकी प्रासंगिकता और राजनीतिक वैधता दोनों को संतुष्ट करे। चौथा सबक यह है कि सीजीई को लेकर किसी भी चर्चा में पारदर्शिता का पूरा ध्यान रखा जाए। इसकी दोहरी भूमिका होती है: सार्वजनिक जोखिम कम करना और भरोसा कायम करना। समय पर और पर्याप्त जानकारी मिलने से सीजीई शोध प्रस्ताव, उसकी फंडिंग, प्रविधि आदि को लेकर अनिश्चितताएं समाप्त होंगी। किसी भी सुनियोजित प्रयोग के लिए पारदर्शिता की आवश्यकता है ताकि पूर्व निर्धारित सहमति कायम की जा सके। 
 
जलवायु भू-अभियांत्रिकी की बात करें तो इसका संबंध जलवायु विज्ञान और भूराजनीति दोनों से है। फिलहाल हमारे पास ऐसा कोई माध्यम नहीं है जो जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिम के विरुद्ध कदम न उठाने की वैधता पर प्रश्न खड़ा कर सके। यह केवल तकनीकी बहस नहीं है। यह काफी हद तक राजनीतिक है। फिलहाल हमारे पास इस अनिश्चितता से निपटने का कोई साधन नहीं है। 
 
(लेखक काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वॉयरनमेंट ऐंड वाटर के सीईओ हैं।)
Keyword: environment, world, india, global warming,,
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