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अनुचित हस्तक्षेप

संपादकीय /  April 30, 2019

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के रूप में नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था लागू हुए करीब दो वर्ष हो चुके हैं। जीएसटी के अधीन स्थापित एंटी-प्रॉफिटीयरिंग अथॉरिटी (मुनाफाखोरी रोधी प्राधिकार) विभिन्न मूल्यों के मामलों की सुनवाई के साथ लगातार सक्रिय नजर आ रहा है। हाल में उसने कहा कि स्टारबक्स ने नवंबर 2017 में रेस्तरों पर कर दरों में कटौती के बाद अपनी एक कॉफी की किस्म का आधार मूल्य इस तरह बढ़ाया कि उपभोक्ताओं को पहले जितनी ही कीमत चुकानी पड़ रही थी। प्राधिकार के मुताबिक टाटा स्टारबक्स ने ऐसा करके अनुचित मुनाफा कमाया। इसके अलावा उसने कम से कम तीन बड़ी उपभोक्ता वस्तु कंपनियों के खिलाफ कदम उठाए और माना जा रहा है कि वह अपने दायरे का विस्तार करते हुए अन्य कंपनियों के खिलाफ भी पेशकदमी करेगा। अचल संपत्ति का कारोबार भी एक अन्य ऐसा क्षेत्र है जो मुनाफाखोरी रोधी महानिदेशालय (डीजीएपी) के दायरे में आ रहा है। डीजीएपी कम से कम 50 बड़े प्रॉपटी्र डेवलपरों की जांच करके यह पता लगाने का प्रयास कर सकता है कि क्या वे इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ ग्राहकों को देने में नाकाम रहे? जानकारी तो यह भी है कि सरकार ने डीजीएपी का कार्यकाल बढ़ाने पर भी विचार किया है जो फिलहाल दो वर्ष है। 

 
सरकार का दावा है कि ऐसा इसलिए कि जीएसटी परिषद लगातार कर दरों में बदलाव कर रही है और इसलिए मुनाफाखोरी रोधी प्राधिकार की भी आवश्यकता है। इस बीच डीजीएपी ने खुद ही अपने कार्य की प्रकृति का विस्तार किया है। पहले वह उपभोक्ताओं की शिकायतों के आधार पर जांच शुरू करता था परंतु अब यह खरीद और रद्द कराने के इनवॉयस मांगकर यह तय करेगा प्रथत दृष्टïया सवाल उठाने की गुंजाइश बनती है या नहीं। इसी आधार पर वह स्वयं जांच शुरू करता है। जैसी कि कई लोगों ने चेतावनी भी दी थी, राज्य के हस्तक्षेप का एक नया मंच तैयार करना खतरनाक साबित हो सकता है क्योंकि एक बार नौकरशाही का हस्तक्षेप हो जाने के बाद वह अपने विस्तार की गुंजाइश और संभावना तलाश लेती है और सामान्य वाणिज्यिक गतिविधियों में उसका हस्तक्षेप बढ़ता ही जाता है। फिलहाल हालात कुछ ऐसे ही नजर आ रहे हैं। 
 
मुनाफाखोरी रोधी प्राधिकार का विचार न तो सैद्घांतिक रूप से बेहतर था और न ही इसका व्यावहारिक रूप से बेहतर क्रियान्वयन किया गया। इसका क्रियान्वयन इसलिए कमजोर रहा क्योंकि सरकार ने इस बारे में विस्तार से कोई जानकारी नहीं दी कि मुनाफाखोरी हुई या नहीं और इसका निर्धारण कैसे होगा। अन्य मुल्क जो जीएसटी को अपना चुके हैं, उदाहरण के लिए ऑस्टे्रलिया में यह बताया गया है कि कैसे समकक्ष प्राधिकार को किसी वस्तु के विशुद्घ मार्जिन की जांच करनी चाहिए। परंतु भारत में केवल प्रक्रिया के बारे में जानकारी प्रदान की गई है। यह सैद्घांतिक रूप से भी बेहतर नहीं है। कंपनियों को यह आजादी होनी चाहिए कि वे कर में बदलाव पर अपने तरीके से प्रतिक्रिया दें, खासतौर पर जीएसटी जैसे जटिल करों के मामले में जहां लागत पर कई विरोधाभासी प्रभाव असर दिखाते हैं जो कि वाणिज्यिक और प्रतिस्पर्धी वजहों से संचालित होते हैं। अगर प्रतिस्पर्धी व्यवस्था कर कटौती के समुचित पारेषण की इजाजत नहीं देती तो यह प्रतिस्पर्धा आयोग का विषय क्षेत्र है। स्थायी प्राधिकार की भी कोई आवश्यकता नहीं। अस्थायी प्राधिकार की जरूरत हो सकती है क्योंकि जीएसटी की स्थापना ही उपभोक्ता पर प्रभाव न्यूनतम करने के लिए की गई थी। भविष्य के तमाम कर बदलावों का आकलन जीएसटी के शुरुआती मानक पर ही नहीं किया जा सकता। जरूरी नहीं कि हर बार उनका तात्पर्य उपभोक्ता के लिए कम कीमत ही हो। अन्य आर्थिक कारक भी हो सकते हैं। ऐसे में प्राधिकार का कार्यकाल बढ़ाने की बताई गई वजह समझ से परे है। उसे तय अवधि में समाप्त किया जाना चाहिए।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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