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एनबीएफसी-बैंक विलय वक्त का तकाजा?

तमाल बंद्योपाध्याय /  April 29, 2019

दूरसंचार या गैस कारोबार की तरह बैंकिंग क्षेत्र में लाइसेंस सबसे बड़े बोलीकर्ता को ही नहीं मिलता है। उसके लिए मुफीद एवं उचित फर्म को तवज्जो दी जाती है। बता रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय 

 
इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनैंस लिमिटेड और लक्ष्मी विलास बैंक के विलय की घोषणा के एक दिन बाद जारी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की विज्ञप्ति ने यह साफ कर दिया कि फिलहाल इस विलय प्रस्ताव को उसने अनुमति नहीं दी है। इस विलय से बनने वाला इंडियाबुल्स लक्ष्मी विलास बैंक परिसंपत्ति के लिहाज से देश का आठवां बड़ा निजी बैंक बन जाएगा। यह विज्ञप्ति जारी करने के पीछे रिजर्व बैंक का मकसद उन अटकलों पर विराम लगाने का था जिनके मुताबिक इस विलय को उसने अनुमति दे दी है। लक्ष्मी विलास बैंक के बोर्ड में आरबीआई के नामित निदेशकों की मौजूदगी होने से इस अटकल को बल मिला। उसी तरह इंडियाबुल्स के बोर्ड में भी आरबीआई के दो पूर्व डिप्टी गवर्नर शामिल हैं। उनमें से एक एस एस मुंदरा प्रस्तावित विलय की निगरानी के लिए गठित पुनर्गठन समिति की अगुआई कर रहे हैं। 
 
बहरहाल आरबीआई ने कहा है कि जब भी उसे विलय प्रस्ताव मिलेगा तो वह नियामकीय दिशानिर्देशों के हिसाब से उस पर गौर करेगा। मुझे लगता है कि किसी भी कंपनी ने अभी तक आरबीआई को इस विलय योजना का प्रस्ताव नहीं भेजा है क्योंकि भारतीय वित्तीय प्रणाली इस सौदे को लेकर विभाजित नजर आ रही है। यह मतभेद दोनों कंपनियों की वित्तीय स्थिति या एक बीमार बैंक के विलय का इंडियाबुल्स पर पडऩे वाले असर को लेकर नहीं बल्कि इस बात पर है कि आरबीआई को क्या इसे मंजूरी देनी चाहिए?
 
वैसे एक बैंक एवं एक गैर-बैंकिंग वित्तीय इकाई (एनबीएफसी) का विलय होना कोई नया मामला नहीं है। भारत फाइनैंशियल इन्क्लूजन लिमिटेड (पुराना नाम एसकेएस लिमिटेड) का इंडसइंड बैंक लिमिटेड के साथ विलय हो रहा है जबकि पहले आईडीएफसी बैंक के साथ कैपिटल फस्र्ट का विलय हो चुका है। उधर बंधन बैंक के साथ गृह फाइनैंस लिमिटेड के विलय की प्रक्रिया जारी है। अगर कैपिटल फस्र्ट को आईडीएफसी बैंक में विलय के बाद बैंकिंग गतिविधियों का लाइसेंस दे दिया जाता है तो फिर इंडियाबुल्स को इस क्लब में शामिल करने में क्या आपत्ति है? आलोचकों का कहना है कि इंडियाबुल्स वर्ष 2014 में बैंकिंग लाइसेंस की प्रक्रिया में शामिल हुआ था लेकिन वह अंतिम सूची में जगह नहीं बना पाया था। सवाल है कि तब से अब तक क्या बदल गया है? इसके अलावा इंडियाबुल्स और कैपिटल फस्र्ट एक-दूसरे से काफी जुदा भी हैं।
 
कैपिटल फस्र्ट एक एनबीएफसी थी जिसका संचालन बैंकर से उद्यमी बने वी वैद्यनाथन कर रहे थे। इसकी तुलना में इंडियाबुल्स एक आवासीय वित्त कंपनी है जिसका समूह उपभोक्ता वित्त, बीमा, शेयर ब्रोकिंग और रियल एस्टेट में भी सक्रिय है।  वैद्यनाथन ने कैपिटल फस्र्ट में क्रेडिट अंडरराइटिंग और संग्रहण का एक गैर-परंपरागत मॉडल तैयार किया था। लेकिन मैकेनिकल इंजीनियर समीर गहलोत ने अपने कारोबारी सफर की शुरुआत 1999 में एक ऑनलाइन ब्रोकिंग फर्म से की थी। धीरे-धीरे इंडियाबुल्स समूह में कई कंपनियां जुड़ती गईं और आज यह परिसंपत्ति के मामले में देश की दूसरी बड़ी आवासीय वित्त कंपनी बन चुकी है। हालांकि बैंकिंग लाइसेंस के लिए अर्जी लगाने के बाद से काफी कुछ बदल चुका है। मसलन, वर्ष 2013 में समूह की कुल परिसंपत्तियों में रियल एस्टेट कारोबार का हिस्सा एक तिहाई था लेकिन अब वह घटकर दसवां हिस्सा रह गया है। गहलोत ने हाल में एक साक्षात्कार में कहा था कि बैंक में तब्दील हो जाने पर वह रियल एस्टेट कारोबार से पूरी तरह अलग हो जाना चाहते हैं। 
 
इसके अलावा बैंकिंग लाइसेंस संबंधी नए निर्देश भी कहते हैं कि किसी आवेदक फर्म की कुल परिसंपत्ति में गैर-वित्तीय गतिविधियों की हिस्सेदारी 40 फीसदी से कम नहीं होनी चाहिए। इंडियाबुल्स के मामले में यह 20 फीसदी से कम है। एक नए बैंक के प्रवर्तकों की शेयरधारिता 10 वर्षों तक 30 फीसदी और 15वें वर्ष तक 15 फीसदी रहने का भी जिक्र है। इंडियाबुल्स में फिलहाल 21.5 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले गहलोत की विलय के बाद बनने वाली नई इकाई में हिस्सेदारी 19.5 फीसदी रह जाएगी लेकिन वह विलय के पहले इसे 15 फीसदी पर लाने के लिए इच्छुक हैं। वह बेहतर परिचालन सुनिश्चित करने के लिए अपनी कार्यकारी भूमिका छोडऩे को भी तैयार हो सकते हैं। 
 
वर्ष 2014 में बैंकिंग लाइसेंस के लिए मना किए जाने के बाद इंडियाबुल्स ने नवंबर 2015 में ब्रिटेन के ओकनॉर्थ बैंक में करीब 40 फीसदी हिस्सेदारी ली थी। मेरा मानना है कि इंडियाबुल्स ने यह अधिग्रहण आरबीआई और बैंक ऑफ इंग्लैंड की अनुमति के बगैर नहीं किया होगा। नवंबर 2017 में इंडियाबुल्स ने इसमें से कुछ हिस्सा बेच दिया था और अपने निवेश से अधिक रकम बनाई थी।  अगर इंडियाबुल्स और लक्ष्मी विलास बैंक के बीच विलय प्रस्ताव को आरबीआई की अनुमति मिल जाती है तो भारत में भी इसे दोहराया जा सकता है। प्रस्तावित बैंक की परिसंपत्तियां असंगत तरीके से रियल एस्टेट की तरफ झुकी होंगी लेकिन पोर्टफोलियो में विविधता लाने के लिए इंडियाबुल्स उपभोक्ताओं के बड़े हिस्से को एसएमई योजनाएं बेच सकता है। गहलोत ने अपने साक्षात्कार में कहा है कि इंडियाबुल्स सरकारी प्रतिभूतियों और नकदी जमा करने संबंधी आरबीआई के मानकों में किसी तरह की ढिलाई की अपेक्षा नहीं करती है।
 
कई महीनों से इस प्रस्ताव पर चर्चा करने के बाद दोनों फर्मों के बोर्ड ने मुहर लगाई। सच कहें तो लक्ष्मी विलास बैंक के पास किसी मजबूत कंपनी के पास जाने के सिवाय बहुत कम विकल्प बचे थे और इंडियाबुल्स जैसी सभी एनबीएफसी को वजूद बचाए रखने और वृद्धि के लिए खुद को बैंक के रूप में तब्दील करना ही है। मैं इस मामले में आरबीआई के रुख को लेकर कोई अनुमान नहीं लगाना चाहूंगा क्योंकि दूरसंचार या गैस कारोबार की तरह बैंकिंग क्षेत्र में लाइसेंस केवल सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को ही नहीं मिलता है। आरबीआई बैंकिंग लाइसेंस उसी को देता है जिसे वह मुफीद और उपयुक्त पाता है। क्या इंडियाबुल्स इस मापदंड पर खरा उतरती है? हमें यह फैसला आरबीआई पर ही छोड़ देना चाहिए लेकिन कोई भी व्यक्ति इससे इनकार नहीं कर सकता है कि भारत को प्रतिस्पद्र्धा एवं उपभोक्ताओं की देखभाल के लिए अधिक बैंकों की जरूरत है। एनबीएफसी भी अपने मौजूदा स्वरूप में नहीं बनी रह सकती हैं। अगर लक्ष्मी विलास बैंक का किसी अन्य बैंक में विलय किया जाता है तो फिर एक बैंक कम हो जाएगा। 
 
भारत एनबीएफसी के लिए ऐतिहासिक रूप से स्वर्ग रहा है। वर्ष 1997 में आरबीआई अधिनियम को संशोधित कर एनबीएफसी के नियमन का व्यापक ढांचा बनाया गया था। उस समय देश में करीब 40,000 एनबीएफसी सक्रिय थीं। नए नियम आने के बाद करीब एक हजार एनबीएफसी के पास समुचित पूंजी नहीं होने से उनके लाइसेंस निरस्त किए जा चुके हैं। इस समय भी 9,000 से अधिक एनबीएफसी सक्रिय हैं। लेकिन बैंकिंग परिदृश्य काफी अलग है। अगर हम क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, स्थानीय क्षेत्र के बैंकों और भुगतान बैंकों को हटा दें तो भारत में 96 बैंक हैं यानी 1.38 करोड़ आबादी पर एक बैंक है। लेकिन सभी तरह के बैंकों को जोड़ दें तो एक बैंक 82 लाख भारतीयों को सेवा दे रहा है। अगर अमेरिका से इसकी तुलना करें तो वहां कुल 5,358 बैंक सक्रिय हैं यानी 59,724 लोगों पर एक बैंक का अनुपात है। हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका में भी एक बैंक औसतन 8.27 लाख लोगों को सेवा दे रहा है।
 
एनबीएफसी में जमा की व्यवस्था न होने से उन्हें बैंक की तुलना में व्यवस्थागत स्थायित्व के लिए कम खतरनाक मानने का तर्क एक छलावा भर है। बड़ी एनबीएफसी भी लोगों के पैसे से ताल्लुक रखने के नाते समान व्यवस्थागत जोखिम रखती हैं। भले ही यह पैसा सार्वजनिक जमा के रूप में नहीं होता है लेकिन बैंकों एवं म्युचुअल फंडों से उधार लिया गया पैसा क्या सार्वजनिक नहीं होता है?
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक एवं जन स्माल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)
Keyword: telecom, banking, license,,
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