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मकान खरीदने की कुव्वत बढ़ी मगर कीमतें भी चढ़ीं

संजय कुमार सिंह /  April 29, 2019

रियल एस्टेट सलाहकार फर्म जेएलएल इंडिया ने पिछले दिनों एक अध्ययन कराया, जिसमें पता चला कि भारत के सभी प्रमुख शहरों में 2011 से 2018 के बीच मकान खरीदना ज्यादा आसान हो गया है और इस मामले में खरीदारों की क्षमता बढ़ गई है। मगर इसमें एक पेच है। 2011 की तुलना में इस समय स्थिति वास्तव में बेहतर हुई है, लेकिन भारत में आवासीय क्षेत्र कुल मिलाकर अब भी महंगा बना हुआ है। इसलिए जो भी मकान खरीदना चाहते हैं, उन्हें सतर्कता बरतनी चाहिए और जरूरत से ज्यादा कर्ज लेने के जोखिम में नहीं फंसना चाहिए। 

 
मकान खरीदने की क्षमता बढ़ गई है या खरीदारों के लिए मकान किफायती हो गए हैं, इसके पीछे तीन प्रमुख कारण हैं। जेएलएल इंडिया में मुख्य अर्थशास्त्री और रिसर्च एवं आरईआईएस के प्रमुख सामंतक दास बताते हैं, 'पिछले पांच-छह साल में मकानों की कीमतें थोड़ी कम हुई हैं या ठहरी हुई हैं या उनमें ज्यादा से ज्यादा 2 फीसदी सालाना का इजाफा हुआ है। लेकिन इसी दौरान औसत पारिवारिक आय ज्यादा तेजी से बढ़ी है। आवास ऋण पर ब्याज की दरें भी घट गई हैं और 2012-13 में 12-13 फीसदी पर रहने वाली दरें आज 9 फीसदी के आसपास ही हैं।' डेवलपर भी कुछ न कुछ जुगत भिड़ा रहे हैं। मसलन पिछले कुछ साल में डेवलपरों ने मकानों का आकार कम कर दिया है, जिससे उन्हें खरीदना ग्राहकों के लिए आसान हो गया है। नई आवासीय परियोजनाएं अब उपनगरीय इलाकों में बनाई जा रही हैं ताकि उनकी कीमतें ठीकठाक बनी रहें।
 
बहरहाल जो लोग मकान खरीदने के बारे में सोच रहे हैं, उन्हें इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि मकान खरीदार की खर्च करने की क्षमता के भीतर तो आ रहे हैं यानी किफायती तो हो रहे हैं, लेकिन भारत में रियल एस्टेट कुल मिलाकर महंगा ही हो रहा है। अर्थयंत्र के संस्थापक और मुख्य कार्य अधिकारी नितिन व्याकरणम कहते हैं, 'यदि आप प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की तुलना किसी भी बड़े शहर में मकान खरीदने की लागत से करें तो पता चल जाएगा कि भारत अब भी महंगा है।' यदि आपको फैसला करना है कि मकान खरीदा जाए या किराये पर ही रहा जाए तो आपको कुछ वित्तीय कसौटियों का ध्यान रखना होगा। फिनवे के मुख्य कार्य अधिकारी और सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार रचित चावला समझाते हैं, 'यदि मासिक किस्त यानी ईएमआई कमोबेश उतनी ही है, जितना किराया आप दे रहे हैं तो बिना सोचे-विचारे मकान खरीद डालिए। उसकी वजह यह है कि साल बीतने के साथ आपकी ईएमआई तो उतनी ही बनी रहेगी, लेकिन अपना मकान नहीं हुआ तो किराया हर साल बढ़ता जाएगा। कुछ समय गुजरने के बाद आपके मकान की कीमत भी बढ़ ही जाएगी।' लेकिन भारत में ईएमआई अक्सर किराये की 2 से 6 गुना तक हो सकती है। ऐसे मामलों में मकान खरीदने का इरादा कुछ वक्त के लिए टाला जा सकता है। चावला की राय है, 'यदि किराये और ईएमआई के बीच दोगुने से अधिक का फर्क है तो मकान खरीदने के लिए कर्ज लेने के बजाय इस लक्ष्य के साथ म्युचुअल फंड में एसआईपी शुरू कर दीजिए। कुछ साल बाद सही मौका आने पर तगड़ा डाउन पेमेंट करके मकान खरीद लीजिए।' आवास ऋण पर 9 फीसदी की दर से ब्याज देने के बजाय म्युचुअल फंड में निवेश करना और 11 से 13 फीसदी की दर से प्रतिफल हासिल करना किसी भी वक्त बेहतर हो सकता है। ऐसा करते हैं तो मकान खरीदते समय आपका खर्च बहुत कम हो जाता है। 
 
संभावित खरीदार एक और बात गांठ बांध सकते हैं। ध्यान रखिए कि आपके सभी प्रकार के कर्जों पर जो ईएमआई चल रही हैं, वे कुल मिलाकर आपकी बचत (हाथ में आने वाले वेतन से खर्च घटाने के बाद बची रकम) की 50 फीसदी से अधिक नहीं हों। चावला कहते हैं, 'जरूरत से ज्यादा कर्ज लेने से हर हाल में बचना चाहिए ताकि आप ऐसी हालत में न फंस जाएं, जहां अगले 10 साल तक आपके सामने नकदी की किल्लत रहे।' कर्ज के दुष्चक्र में फंसने से बचने के लिए दास की सलाह खरीदारों के काम आ सकती है। वह कहते हैं कि कम कीमत में मकान खरीदने के लिए इलाके और यात्रा के समय के मामले में समझौता कर लेना चाहिए यानी बेहतरीन इलाके में मकान नहीं मिले और वहां से दफ्तर दूर हो तो भी रकम बचाने के लिए उसे खरीद लेना चाहिए। मगर अपना घर खरीदने के बाद अगर आपको दफ्तर तक जाने के लिए भी बहुत लंबा सफर करना पड़े तो पहले देख लीजिए कि आप वाकई उसके लिए तैयार हैं या नहीं।
 
मकान खरीदते वक्त डाउन पेमेंट यानी शुरुआती भुगतान पर भी विचार करना जरूरी है। व्याकरणम कहते हैं, 'हमने अक्सर देखा है कि अगर मकान महंगा होता है और उसे खरीदने के लिए अधिक डाउन पेमेंट करना पड़ता है तो लोग रकम जुटाने के लिए दूसरे संसाधनों की तलाश शुरू कर देते हैं। कई लोगों को परिवार से कर्ज लेना पड़ता है और कई लोग पर्सनल लोन आदि का सहारा लेते हैं।'मकान लेते समय आपको इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि आप उस शहर में लंबे अरसे तक ठहरने वाले हैं या कुछ साल में ही आपको वहां से जाना पड़ सकता है। व्याकरणम कहते हैं, 'यह बात हमेशा ध्यान रहे कि भारत में संपत्ति खरीदना या बेचना आसान नहीं होता।' कई लोग कहते हैं कि वे अपने घर में 3-4 साल ही रहेंगे और जब उन्हें बाहर जाना होगा तो मकान किराये पर चढ़ा देंगे। लेकिन उन्हें याद रखना चाहिए कि भारत में किराये से होने वाली आमदनी बमुश्किल 1.5 से 2.5 फीसदी ही है।
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