बिजनेस स्टैंडर्ड - कांग्रेस की वापसी के लिए क्या है जरूरी?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, May 26, 2019 01:12 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

कांग्रेस की वापसी के लिए क्या है जरूरी?

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  April 28, 2019

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ मौजूदा आम चुनावों में कांग्रेस के लिए लक्ष्य की तरफ इशारा करने वाले वरिष्ठतम पार्टी नेता हैं। उन्होंने कहा है कि वर्ष 2014 की तुलना में इस बार कांग्रेस अपनी सीटें तिगुनी कर लेगी। पार्टी के डेटा प्रमुख प्रवीण चक्रवर्ती भी ऐसा अनुमान जता चुके हैं। कमलनाथ ने वर्ष 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस के मुख्य लक्ष्य पर भी रोशनी डाली है। उनका कहना है कि नरेंद्र मोदी को लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए कांग्रेस की इतनी सीटें काफी होंगी।

 
आश्चर्य नहीं है कि इस बयान का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से अधिक कांग्रेस समर्थकों ने उपहास उड़ाया। उनका कहना था कि वह पार्टी विक्षिप्त ही होगी जो नई सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें लाने का दावा भी न कर पाए। यह एक तरह से चुनाव अभियान के बीच में ही हार मानने जैसा है। पिछली बार मिली 44 सीटों की अगर तिगुनी सीटें कांग्रेस जीत भी लेती है तो वह 132 सीटें ही होंगी। अगर कांग्रेस ने इतना ही लक्ष्य रखा है तो फिर उसे 100 का आंकड़ा पार करने में भी दिक्कत होगी। 
 
ये तमाम आपत्तियां तथ्यात्मक रूप से सही लेकिन राजनीतिक रूप से गलत हैं। आखिर कैसे? अगर भाजपा 200 सीटों तक पहुंच जाती है तो वह निश्चित रूप से अगली सरकार बना लेगी। उसे सरकार बनाने से रोकने का इकलौता रास्ता यही है कि उसे 200 के नीचे रोक दिया जाए। वर्ष 2019 के लिए भाजपा और कांग्रेस का 'कैंची' ग्राफिक्स बनाते हैं। अगर मोदी-शाह की अगुआई वाली भाजपा का न्यूनतम लक्ष्य 200 सीटों का है तो वे उस बिंदु पर गहरी नजर रखेंगे जहां इस कैंची के दोनों सिरे क्रॉस करते हैं। इस बिंदु पर कांग्रेस महज 100 तक ही पहुंच पाती है। अगर कांग्रेस तीन अंकों तक पहुंचती है तो फिर भाजपा 200 के नीचे आ जाएगी। कांग्रेस 100 के ऊपर जितनी सीटें जीतेगी, भाजपा 200 से उतनी ही कम होती जाएगी। मैं यह नहीं कह रहा कि कांग्रेस इतनी सीटें जीतने ही जा रही है। 
 
मेरे हिसाब से कांग्रेस का 100 सीटों पर पहुंचना ही एक अहम पड़ाव है। कांग्रेस अगर 132 के लक्ष्य तक पहुंच जाती है तो फिर वह मोदी को दोबारा सत्ता में आने से रोक सकती है। कांग्रेस ने 2004 में 132 से 12 सीटें ही अधिक सीटें जीती थी लेकिन वह संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार बनाने में सफल रही थी। एक बार फिर मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसा ही होगा। मेरा बस यह कहना है कि 132 के लक्ष्य का मजाक न उड़ाएं। अब 2014 की समीक्षा करते हैं। भाजपा को मिली 282 सीटों में से 167 पर कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही थी। इसका मतलब है कि मोदी लहर का समूचा तानाबाना कांग्रेस के पूर्ण पराभव के इर्दगिर्द बुना गया था। कांग्रेस 206 सीटों से गिरकर 44 पर सिमट गई और उसकी हारी हुई अधिकांश सीटें भाजपा के पास गई थीं। भाजपा ने समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से भी 38 सीटें छीनी थीं। अब अगर कांग्रेस को 100 तक पहुंचना है तो उसे भाजपा से 60 सीटें छीननी होंगी। उत्तर प्रदेश में सपा एवं बसपा से ली गई सीटें इस बार भाजपा को उन्हें लौटानी पड़ सकती हैं और यह बात निर्णायक हो सकती है। मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसा होने ही जा रहा है।
 
कांग्रेस को पिछली बार 44 सीटें 16 राज्यों से मिली थीं। केवल कर्नाटक में ही वह 10 सीटों के साथ दहाई में पहुंची थी। उसके बाद सात सीटों के साथ केरल का स्थान था। बाकी 27 सीटें 14 राज्यों में बिखरी हुई थीं और वे सभी सीटें स्थानीय उम्मीदवारों की निजी ताकत के दम पर आई थीं। कांग्रेस जिन 167 सीटों पर भाजपा के बाद दूसरे स्थान पर रही थी, उनमें से 14 पर मतों का अंतर दस फीसदी से कम था। कोई भी चुनाव विश्लेषक यही कहेगा कि 10 फीसदी मत-अंतर को पाटना भूस्खलन को रोकने जैसा है। इसी तरह 10 से 15 फीसदी अंतर वाली छह सीटें थीं। बाकी सीटों पर दोनों दलों को मिले मतों का अंतर 75 फीसदी तक रहा था।
 
अब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को मिली जीत पर नजर डालते हैं। इन नतीजों ने 2014 की करारी शिकस्त को पलटने का काम किया। इसका मतलब है कि इन राज्यों में कांग्रेस मतदाताओं का समर्थन जुटा सकती है। सैकड़ा मारने की कोशिश में लगी पार्टी को इन तीनों राज्यों से मिलाकर 30 सीटें जीतनी ही होंगी। छत्तीसगढ़ में शानदार प्रदर्शन के आधार पर वह  वहां बेहतर नतीजों की उम्मीद कर सकती है। लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान को मिलाकर 25 सीटों की उम्मीद करना अधिक आशावादी होगा। लोकसभा चुनाव में मोदी के पक्ष या विपक्ष में मतदान होने से विधानसभा चुनावों का रुख कायम नहीं भी रह सकता है।
 
लोकसभा चुनावों के बीच में पहुंचने के बाद यही स्थिति है। अब भी इसके नतीजे खुले हुए हैं। भले ही सबसे ज्यादा नजरें उत्तर प्रदेश पर लगी हैं लेकिन फैसला आखिरकार मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, झारखंड और असम एवं अन्य राज्यों की करीब 150 सीटों पर होगा जहां भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। मोदी और अमित शाह को मालूम है कि केवल कांग्रेस ही उन्हें सत्ता से दूर रख सकती है। शायद इसीलिए मोदी उन जगहों पर भी कांग्रेस पर ही हमलावर हैं जहां कांग्रेस मुख्य मुकाबले में भी नहीं है। मोदी के लिए भी कांग्रेस को 100 के नीचे रखना जरूरी है जितना कांग्रेस के लिए मोदी को 200 के नीचे लाना।
 
अगर कांग्रेस ने मोदी को रोकने के लिए 132 का लक्ष्य तय किया था तो वह तीन महीने पहले था। कांग्रेस ने उसके बाद इस लक्ष्य की दिशा में कैसे कदम बढ़ाए हैं? क्या उसने जरूरी समर्पण, प्रतिबद्धता, संगठन और निर्णायक अंदाज दिखाया है? यह सवाल हमें हरियाणा के डबवाली कस्बे से होकर गुजरने वाले राजमार्ग पर ले जाता है। पत्रकारों की एक टीम डबवाली में कच्ची शराब पीने से हुई मौत के बड़े हादसे की कवरेज के बाद लौट रही थी। 1980 के दशक की उस रात हमारे साथ विपक्ष के नेता देवीलाल भी थे। सड़क पर एक खरगोश को देखकर ड्राइवर ने अचानक ब्रेक लगा दिया लेकिन इधर-उधर भागते रहने से खरगोश पहिये के नीचे आ ही गया। उस घटना के बाद देवीलाल ने हमें एक कहानी सुनाई। देवीलाल ने बताया कि वह अविभाजित पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों के साथ कहीं जा रहे थे तब भी ऐसा हुआ था। देवीलाल के मुताबिक, 'कैरों ने कार रोकने के बाद कहा था कि एक दिन नेहरु के साथ भी यही होगा। तुम्हें बाएं या दाएं जाना होता है। कोई भी असमंजस में नहीं रह सकता है।' 
 
अब उसी बात को कांग्रेस पर लागू करते हैं जिसकी कमान नेहरु की तीसरी पीढ़ी के पास है। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा और दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का सवाल हो या ममता बनर्जी, के चंद्रशेखर राव एवं नवीन पटनायक से संपर्क साधने की बात हो या कर्नाटक में जनता दल सेक्यूलर के साथ खुलकर खड़े होने की बात हो और अब वाराणसी से प्रियंका गांधी के चुनाव लडऩे को लेकर बनी अनिश्चितता हो? इन सभी मामलों में राहुल गांधी की पार्टी कार की तेज रोशनी से घबराए खरगोश जैसी नजर आती है।
 
अगर यह बहाना बनाया जाता है कि पार्टी को भविष्य के लिए खुद को तैयार करना है तो यह एक कोरी-कल्पना ही है। क्रिकेट की तरह राजनीति में भी कोई अपनी पहली पारी इसलिए नहीं बरबाद कर देता कि वह दूसरी पारी खेलना चाहता है। कांग्रेस को मनमोहन सिंह से ही कुछ सीख लेनी चाहिए। मनमोहन ने नोटबंदी पर चर्चा के दौरान मेनार्ड कीन्स को उद्धृत करते हुए कहा था, लंबे समय में हम सभी मर जाते हैं। इस मामले में तो कम समय में ही मरने का जोखिम है।
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, congress, kamalnath,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या एनबीएफसी पर मसौदा परिपत्र से कम होंगी मुश्किलें?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.