बिजनेस स्टैंडर्ड - नया रिलायंस
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नया रिलायंस

संपादकीय /  April 28, 2019

रिलायंस इंडस्ट्रीज एक दिलचस्प कायाकल्प से गुजर रही है। दूरसंचार एवं खुदरा क्षेत्र जैसे नए कारोबारों की अब कंपनी के कुल राजस्व में हिस्सेदारी चौथाई तक जा पहुंची है। अगर इसमें मीडिया जैसे नए कारोबार को भी जोड़ दें तो कंपनी के ऊर्जा कारोबार की हिस्सेदारी 70 फीसदी से भी नीचे आ जाएगी। रिलायंस समूह के नए कारोबारों के आंकड़े छोटे-मोटे नहीं हैं। खुदरा कारोबार और जियो ने वित्त वर्ष 2018-19 में करीब 1.77 लाख करोड़ रुपये का राजस्व कमाया है। जियो की दस्तक ने तो भारतीय दूरसंचार बाजार में हलचल ही मचा दी थी और मार्च 2019 आने तक यह 30 करोड़ उपभोक्ताओं के साथ देश की तीसरी बड़ी दूरसंचार कंपनी बन चुकी है। पांच साल पहले देश की सबसे बड़ी खुदरा कंपनी होने के बावजूद रिलायंस रिटेल का कुल राजस्व में अंशदान पांच फीसदी से भी कम था और उसे समूह के भीतर 'अन्य' श्रेणी में ही रखा जाता था। उस समय तो रिलायंस का दूरसंचार कारोबार शुरू भी नहीं हुआ था। शेयरधारकों के लिए यह सफर खासा मुनाफापरक रहा है। 

 
सितंबर 2016 में जियो की शुरुआत होने के बाद से आरआईएल के शेयर करीब 170 फीसदी चढ़ चुके हैं। आरआईएल ने तेल व्यवसाय की चक्रीय प्रकृति को देखते हुए अपने कारोबार में विविधता लाने के इरादे से बड़ी मात्रा में नकदी नए कारोबारों में लगाई। करीब एक दशक से वर्ष 2017 तक रिलायंस के शेयर अपेक्षाकृत सीमित दायरे में बने हुए थे। बीच में 2008 के दौरान उठापटक का दौर भी रहा। रिफाइनिंग एवं पेट्रो-रसायन क्षेत्र में क्षमता बढ़ाने से इतर फंड डालने की भी जरूरत थी। लेकिन रिलायंस के मुख्य व्यवसाय से जुड़े तेल एवं गैस उत्खनन और शेल गैस में विविधता लाने के भी बहुत अच्छे नतीजे नहीं आ रहे थे। ऐसी स्थिति में रिलायंस इंडस्ट्रीज ने खुदरा एवं दूरसंचार पर ध्यान देने का फैसला किया। आरआईएल की संचार, कंटेंट एवं कॉमर्स गतिविधियों के सम्मिलन की मंशा को देखते हुए अब उसके पास कई विकल्प हो गए हैं। 
 
हालांकि कुछ संकेत चेतावनी भी देते हैं। नए कारोबारों में सफलता भारी निवेश के दम पर आई है। अकेले जियो में ही तीन लाख करोड़ रुपये का निवेश हुआ है। जियो ने 2017-18 में शुद्ध लाभ दिखाया था लेकिन उसकी बड़ी वजह मूल्यह्रïास नीति थी। जियो को कम लागत के कर्ज मिले हैं और उसमें पूंजी भी अपने समकक्षों की तुलना में बेहतर ढंग से लगी है। उसे मूल कंपनी आरआईएल से काफी मदद भी मिली है। ऐसे में विश्लेषकों का मानना है कि भारती एयरटेल एवं वोडा-आइडिया की तरह अगर जियो को भी अकाउंटिंग मानकों का पालन करना पड़े और समान पूंजी लागत आए तो वह भी लाभ की स्थिति में नहीं रह जाएगी।
 
आरआईएल ने जियो के लिए बैलेंस शीट पर बोझ कम करने के लिए अपने फाइबर एवं टॉवर परिसंपत्तियों को 1.07 लाख करोड़ रुपये की देनदारी के साथ दो ढांचागत निवेश ट्रस्टों को हस्तांतरित कर दिया। लेकिन इसका लाभ नया निवेशक आने के बाद ही मिल पाएगा। भले ही इससे आरआईएल का शुद्ध ऋण दिसंबर 2018 के 2.78 लाख करोड़ से घटकर 2.02 लाख करोड़ रुपये पर आ गया है लेकिन इससे अप्रभावित लोगों ने इस पहल को महज 'ऑप्टिकल' बताया है। जियो को टॉवर एवं फाइबर परिसंपत्तियों का किराया भी देना होगा जो मूल्यह्रïास एवं ब्याज लागत में कटौती को प्रभावित कर सकता है। शुल्क दरों में बढ़ोतरी के कोई आसार नहीं होने से जियो की लाभप्रदता में फिलहाल सुधार आना एक और समस्या है। इस दौरान कारोबार में नए निवेश की मांग बनी रहेगी और नए कारोबारों का समेकन भी होगा। इस तरह आरआईएल को कर्ज का बोझ बढऩे से रोकने के लिए कुछ गंभीर उपायों पर विचार करना होगा। उस संदर्भ में रिफाइनिंग एवं पेट्रो-रसायन कारोबार का 25 फीसदी हिस्सा बेचने का कदम विवेकपूर्ण लगता है। 
Keyword: reliance, telecom, retail, JIO, RIL,,
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