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कच्चा तेल 100 डॉलर पर पहुंचेगा: क्रिस वुड

पुनीत वाधवा /  April 26, 2019

भारतीय शेयरों के लिए अगले पांच वर्षों के नजरिये से सबसे बड़ी चुनौती तेल की चढ़ती कीमतें हैं। यह बात सीएलएसए के प्रबंध निदेशक और इक्विटी रणनीतिकार क्रिस्टोफर वुड ने निवेशकों के लिए अपने साप्ताहिक नोट- ग्रीड ऐंड फीयर में कही है। वुड का अनुमान है कि अगर अमेरिका 2 मई के बाद ईरान पर प्रतिबंध में सभी रियायतों को खत्म कर देता है तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच सकती हैं। उन्होंने कहा कि इस जोखिम से बचने का सबसे अच्छा तरीका तेल शेयरों की खरीद है। हालांकि वुड का अनुमान है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपने रुख को नरम करेंगे। 

वुड ने लिखा, 'इस मुद्दे का यह पहलू यह भी है कि अमेरिका का ईरान से तेल खरीद पर चीन के साथ विवाद खड़ा करना तर्कसंगत नहीं है और अगर रियायतों का नवीनीकरण नहीं किया गया तो विवाद होना लाजिमी है। वहीं डॉनल्ड ट्रंप चीन के साथ व्यापार समझौते और 'जीत' की उम्मीद कर रहे हैं। एक पहलू यह भी है कि अब सऊदी अरब ट्रंप की धमकी की प्रतिक्रिया में तेल उत्पादन नहीं बढ़ाना चाहेगा।'

अमेरिका ने ईरान के तेल एवं जहाजरानी क्षेत्रों पर पिछले साल 5 नवंबर से प्रतिबंध लगाए थे। हालांकि इन प्रतिबंधों में 8 देशों को 180 दिनों की रियायत दी गई थी और इनके फिर से नवीनीकरण की संभावना जताई जा रही थी। इन रियायतों का नवीनीकरण नहीं किए जाने के आसार के कारण ब्रेंट क्रूड तेल के दाम 2019 में अब तक 38 फीसदी बढ़कर 75 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच चुके हैं। तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी का रुपये पर भी असर पड़ा है। रुपया शुक्रवार को डॉलर के मुकाबले छह सप्ताह के निचले स्तर 70.25 पर पहुंच गया।

वुड कहते हैं, 'रुपया ग्रीड ऐंड फीयर की पसंदीदा उभरती बाजार की मुद्राओं में से एक नहीं है। हालांंकि भारतीय शेयर बाजार है। निश्चित रूप से अभी रुपया वास्तविक प्रभावी विनिमय दर के आधार पर सस्ता नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक के नए नेतृत्व के तहत नरम मौद्रिक नीति का मतलब है कि यह मुद्रा ऊंची वास्तविक दरों से कम सुरक्षित है। हालांकि पहले ऐसा होता था।'

नरेंद्र मोदी सरकार की दो सबसे बड़ी नीतिगत पहलों- नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के बारे में वुड का कहना है कि इन दोनों में से नोटबंदी ने भारत की असगंठित अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि भारत में असंगठित अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी है, लेकिन इसे मापना लगभग नामुमकिन है। हालांकि नोटबंदी नेक इरादे से की गई थी, जिसका मकसद अर्थव्यवस्था के वित्तीय क्षेत्र को प्रोत्साहन देना और काले धन को खत्म करना था।

इसके बाद वित्तीय संपत्तियों में नकदी की आवक बढऩे से गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को ऋण वितरण बढ़ाने में मदद मिली। हालांकि वुड का मानना है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि नोटबंदी से असंगठित क्षेत्र पर चोट पड़ी और जीएसटी लागू करने से यह चोट और गहरी हुई। उनके मुताबिक इससे सबसे ज्यादा प्रभावित छोटे कारोबारी हुए, जो परंपरागत रूप से भारतीय जनता पार्टी के समर्थक हैं। वुड का मानना है कि लोग सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार नहीं करना चाहते हैं कि वे मोदी विरोधी हैं। यह ठीक उसी तरह है, जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में बहुत से लोग सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार नहीं करते थे कि वे डॉनल्ड ट्रंप को वोट देंगे।

Keyword: Iran, Crude Oil, Indian Share market, CLSA, Equity, Strategic, Christopher Wood, Non Banking Finance Company, NBFC, Donald Trump,
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