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काम के घंटों को लेकर छिड़ी 888 बनाम 996 की बहस

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  April 25, 2019

श्रम अधिकार कार्यकर्ता रॉबर्ट ओवेन ने एक श्रमिक की जिंदगी से जुड़ा 888 का चर्चित मुहावरा पेश किया था। इसका मतलब है कि श्रमिक 8 घंटे काम करता है, 8 घंटे आराम करता है और 8 घंटे वह अन्य कार्यों एवं मनोरंजन में लगाता है। यह एक अतिवादी स्थिति है। ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा के संस्थापक जैक मा ने गत दिनों एक अलग नजरिया पेश किया। मा ने यह कहकर बड़ा विवाद पैदा कर दिया है कि युवाओं को कामकाजी संस्कृति के 996 मॉडल को एक बड़े वरदान के रूप में देखना चाहिए। इस कामकाजी मॉडल में एक कर्मचारी से हफ्ते में छह दिन तक सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक काम करने की अपेक्षा की जाती है। मा कहते हैं, 'दुर्भाग्य से कई कंपनियों और बहुत लोगों को 996 मॉडल पर काम करने का मौका ही नहीं मिल पाता है।'
 
हालांकि ऐसा लगता है कि बहुत ही कम लोग इस अवसर का लाभ उठाने में रुचि दिखाएंगे। माइक्रोसॉफ्ट की कोड-शेयरिंग साइट गिटहब पर बने एक चर्चा समूह ने इसे 999.आईसीयू नाम दिया है। यह नामकरण इस ओर इशारा करता है कि हफ्ते में छह दिन 12-12 घंटे काम करने वाले कर्मचारी को आईसीयू में ही जाना पड़ेगा। वैसे चीन के अलावा कुछ अन्य देशों में भी 996 संस्कृति आम है। मसलन, जापान भी ज्यादा काम से होने वाली मौतों की समस्या से जूझ रहा है। इस समस्या की गवाही न केवल जापान के आंकड़े दे रहे हैं बल्कि जापानी भाषा में इसके लिए एक शब्द 'करोशी' भी है। कर्मचारी या तो काम से उपजे तनाव से जुड़ी बीमारियों से मर रहे हैं या काम के भारी दबाव के चलते अपनी जान दे देते हैं। जापान सरकार की एक रिपोर्ट बताती है कि चार में से एक कंपनी के कर्मचारी महीने भर में 80 घंटे से अधिक काम करते हैं जबकि 10 में से एक जगह पर कर्मचारियों को 100 घंटे से भी अधिक काम करना पड़ता है। 
 
लेकिन मा की सलाह को सबसे ज्यादा गंभीरता से शायद भारत में लिया जा रहा है। जरा इस पर गौर करें: यूबीएस के एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया के शीर्ष 10 भीड़भाड़ वाले शहरों में भारत के भी दो शहर मुंबई और दिल्ली हैं। सच तो यह है कि दुनिया में सर्वाधिक मेहनतकश लोग मुंबई के हैं। मुंबई के निवासी साल भर में औसतन 3,315 घंटे काम करते हैं। इसकी तुलना में पेइचिंग का एक कर्मचारी साल भर में औसतन 2,096 घंटे काम करता है। छुट्टियों की संख्या से भी इसका अंदाजा लगता है। ट्रैवल एजेंसी एक्सपीडिया की छुट्टी वंचना रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में भारत के लोग सबसे कम छुट्टियां लेते हैं। भारत वर्ष 2017 में इस सूची में पांचवें स्थान पर था लेकिन पिछले साल वह शीर्ष पर आ गया। इस सर्वे के मुताबिक 68 फीसदी लोगों ने वर्ष 2018 में कामकाज से जुड़ी व्यस्तताओं के चलते या तो छुट्टियों पर जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया या फिर गए ही नहीं। ये आंकड़े परेशान करने वाले हैं। 
 
कई शोध बताते हैं कि हफ्ते में 50 घंटे से अधिक काम करने वाले कर्मचारी की उत्पादकता घट जाती है और 55 घंटे से अधिक काम करने पर तो उत्पादकता औंधे मुंह गिरती है। हालत यह हो जाती है कि अगर किसी कामगार से हफ्ते में 70 घंटे काम लिया गया हो तो आखिरी 15 घंटों में उसकी उत्पादकता ना के बराबर होती है। यह सबूत है कि ऑफिस में देर रात तक रहने का यह मतलब नहीं है कि उस कर्मचारी की उत्पादकता भी जरूर बढ़ जाएगी। इससे साथी कर्मचारियों पर दबाव भी बढ़ता है। हार्वर्ड बिज़नेस रिव्यू की रिपोर्ट में कहा गया है, 'कर्मचारी जितनी देर तक काम करते हैं वे निरर्थक होते जा रहे कामों को उतनी ही बेवकूफी से अंजाम देते हैं।' 
 
तकनीक ने तो स्थिति और भी खराब कर दी है। तकनीक के अधिक इस्तेमाल से जुड़े जोखिम व्यक्ति के सोने-जागने की आदतों, अवसाद, बर्नआउट और उसके संबंधों को भी प्रभावित करते हैं। शुक्र है कि कई कंपनियों को यह लगने लगा है कि इससे किसी को भी लाभ नहीं होता है। यह स्थिति एक कर्मचारी के 'संपर्क में न रहने के अधिकार' को बताती है। जर्मनी में डैमलर अपने कर्मचारियों को छुट्टी पर रहने के दौरान ई-मेल को ऑटो डिलीट कर देने की सुविधा देती है। इसी तरह फोक्सवैगन ने अपने सर्वर को इस तरह प्रोग्राम किया है कि काम खत्म होने के 30 मिनट बाद कर्मचारी को ई-मेल भेजना बंद हो जाए। अगले दिन उसकी शिफ्ट शुरू होने के आधे घंटे पहले ही फिर उसे मेल भेजा जा सकता है।
 
लेकिन कंपनियां अपने सबसे काबिल कर्मचारियों पर काम का बोझ लादने की गलती अक्सर करती हैं। ऐसा किया जाना अनुचित है क्योंकि कोई भी व्यक्ति उतना ही अच्छा होता है जितना अच्छा वह काम करता है। एक समय के बाद उसे काम बढऩे का अहसास होने लगेगा और फिर उसे लगेगा कि न केवल काम की तुलना में उसे कम वेतन मिल रहा है बल्कि उसे प्रदर्शन के लिए दंडित भी किया जा रहा है। ऐसे में उस कर्मचारी को सबसे पहले यह महसूस होता है कि उसके काम की गुणवत्ता गिर सकती है।
 
सोच उस संस्कृति से बचने की है जो अधिक काम को सम्मान से देखती हो। ऐसे माहौल में लोग काम के अजीबोगरीब घंटों को मानक मानने लगते हैं। लेकिन लंबे समय तक देर तक काम नहीं किया जा सकता है। यह सवाल पूछने का वक्त शायद आ गया है: क्या हम स्मार्ट ढंग से काम करने के बजाय केवल कड़ी मेहनत कर रहे हैं? ऐसी सोच वाले लोगों के बीच रहने का कोई मतलब नहीं है जो यह मानते हों कि बॉस को खुश करने के लिए दिन के 24 घंटे काम करना सबसे अच्छा तरीका है। लेकिन खतरा यह है कि उस सीईओ की टीम में ऐसे लोग रह जाएंगे जो 'जॉम्बी' बन चुके हैं। जहां 888 संस्कृति अब व्यवहार्य नहीं रह गई है वहीं 996 मॉडल भी कारगर नहीं हो सकता है। समाधान तो कुछ और ही है। 
Keyword: office, working, hour, alibaba,,
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