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नई सरकार की वृहद आर्थिक प्राथमिकताएं

शंकर आचार्य /  April 24, 2019

देश में जो भी नई सरकार बनेगी, उसके समक्ष कुछ ऐसी अहम चुनौतियां होंगी जो प्रमुख राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणापत्रों में नजर नहीं आतीं। विस्तार से बता रहे हैं शंकर आचार्य

 
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार का कार्यकाल पूरा होने को है और चुनाव की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। नई सरकार की वृहद आर्थिक प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए, इस बारे में बात करने का यह सही वक्त है, फिर चाहे सरकार राजग की हो (जिसकी संभावना ज्यादा है) या कांग्रेस की। बीते पांच वर्ष का आर्थिक रिकॉर्ड मिलाजुला रहा है और आने वाली सरकार के समक्ष कई चुनौतियां होंगी। खासतौर पर कमजोर वैश्विक आर्थिक माहौल को देखते हुए।  निम्नलिखित बातों पर विचार कीजिए: वर्ष 2011-12 के राष्ट्रीय आय के आधिकारिक आंकड़े (जिनकी पेशेवर क्षमता पर सवाल उठे) बताते हैं कि बीते दो वर्ष के दौरान वृद्घि में धीमापन आया है। जीडीपी वृद्घि दर 2016-17 में 8.2 फीसदी और 2018-19 में 7 फीसदी रह गई। तिमाही वृद्घि दर में भी कमी आई और 2017-18 की चौथी तिमाही के 8 फीसदी से घटकर 2018-19 की चौथी तिमाही में 6.5 फीसदी रह गई। यह मंदी उच्च तीव्रता वाली सूचनाओं मसलन औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, कारोबारी आंकड़ों, कारोबारी आय के नतीजे, क्रय प्रबंधक सूचकांक, प्रमुख क्षेत्रों के संकेतकों आदि में भी नजर आई। मौजूदा नीतियों और रुझानों के मुताबिक 2019-20 में जीडीपी वृद्घि दर 6 से 6.5 फीसदी हो सकती है। इसकी प्रमुख वजह इस प्रकार हैं: वैश्विक वृद्घि और व्यापार में धीमापन, देश के निर्यात में ठहराव, केंद्र और राज्यों का संयुक्त राजकोषीय घाटा 7 फीसदी के आसपास होने से निजी निवेश में कमी, सरकारी उधारी की 8.5 फीसदी की दर, ऊंची ब्याज दर, फंसे कर्ज का बैलेंस शीट पर दबाव तथा कारोबारी भावना का ह्रास आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा वित्तीय क्षेत्र में भी तंगी है तथा कृषि, बिजली, भूमि और श्रम बाजारों में सुधारों का इंतजार है। 
 
सकारात्मक पहलू की बात करें तो खुदरा महंगाई का आंकड़ा 3 फीसदी से नीचे आया और वर्ष 2018-19 का इसका औसत 3 फीसदी के आसपास रहा। हालांकि मूल मुद्रास्फीति की दर 5 फीसदी से ऊपर बनी रही। लेकिन इसे कमजोर ईंधन कीमतों और कृषि जिंस कीमतों में गिरावट का लाभ मिला।  दूसरी ओर, बाह्य वित्त भी दबाव में है और भुगतान संतुलन में चालू खाते का घाटा अप्रैल-दिसंबर 2018 के बीच औसतन 2.6 फीसदी के असहज करने वाले स्तर पर रहा। यह बात खासतौर पर चिंतित करने वाली है क्योंकि विनिर्मित वस्तुओं का निर्यात 2011-12 से ही 30,000 करोड़ डॉलर सालाना पर ठहरा हुआ है। जीडीपी के साथ इसका अनुपात 17 फीसदी से घटकर 2018-19 में 12 फीसदी पर आ गया। इसकी वजह इस प्रकार हैं: अधिमूल्यित विनिमय दर, चीन से सस्ते विनिर्माण के स्थानांतरण से लाभ नहीं उठा पाना (जबकि वियतनाम और बांग्लादेश ने इसका फायदा उठाया) और वैश्विक मूल्य शृंखला का हिस्सा न बन पाना, बीते दो वर्ष में उच्च सीमा शुल्क लागू करना, नोटबंदी और जीएसटी के नकारात्मक प्रभाव (खासकर छोटे निर्यातकों पर) और निर्यात क्षेत्र में कारोबारी सुगमता की कमी। 
 
सबसे बढ़कर देश में रोजगार की स्थिति काफी गंभीर हो गई है क्योंकि शिक्षा, कौशल और स्वास्थ्य के क्षेत्र में लंबे समय से कमजोरी व्याप्त है तथा श्रम कानून और नियमन भारी पैमाने पर रोजगार विरोधी साबित हुए हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय ने 2017-18 में जो श्रम शक्ति सर्वेक्षण कराया था, उसके आंकड़े जारी नहीं किए गए हैं लेकिन उसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इनके मुताबिक बेरोजगारी दर 6 फीसदी, 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी खतरनाक रूप से ऊंची है। शहरी महिलाओं में यह दर 27 फीसदी और शहरी पुरुषों में 19 फीसदी है। श्रम भागीदारी दर कुल मिलाकर 50 फीसदी से कम है। 
 
लब्बोलुआब यह कि नई सरकार को धीमी आर्थिक वृद्धि, कमजोर निजी निवेश, कमजोर निर्यात, बाह्य असंतुलन, तंगहाल वित्तीय तंत्र, बढ़ते राजकोषीय दबाव तथा भारी बेरोजगारी की समस्याओं से निपटना होगा। इस परिदृश्य में किसी भी सरकार के लिए वृहद आर्थिक नीति के लक्ष्यों पर सहमत होना मुश्किल न होगा। इसके लिए जीडीपी और रोजगार में तेज वृद्धि की आवश्यकता होगी। उपभोक्ता मुद्रास्फीति और बाह्य घाटे को कम रखना होगा और वित्तीय तंत्र को मजबूत रखना होगा। ऐसी नीतियां तैयार करना मुश्किल काम है जिनमें निरंतरता भी हो और जो राजनीतिक रूप से स्वीकार्य भी हों। मेरे मुताबिक वृहद आर्थिक नीति में इन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए:
 
निर्यात वृद्धि की गति तेज करना: रुपये के मौजूदा अधिमूल्यन में कमी, जीएसटी तंत्र और उसकी प्रक्रियाओं में सुधार करना, सीमाशुल्क में बढ़ोतरी को स्थिर करना और फिर उसे कम करना (यह निर्यात पर कर की तरह काम करता है), क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौतों को सफलतापूर्वक अंजाम देना, ताकि तेज विकास वाले आसियान देशों के साथ व्यापार के अवसरों को सुरक्षित किया जा सके। तेज निर्यात वृद्धि से जीडीपी भी दुरुस्त होगा और रोजगार भी बेहतर होगा क्योंकि 35 से 40 फीसदी निर्यात छोटे उत्पादकों से आता है। इसके अलावा हमारा व्यापार और चालू खाता घाटा कम होगा तथा कारोबारी साझेदारों के साथ हमारे रिश्ते मजबूत होंगे।
 
केंद्र सरकार के राजकोषीय और राजस्व घाटे को कम करना होगा। इसके लिए व्यय और राजस्व मोर्चे पर कुछ कड़े फैसले करने होंगे। ऐसा करने से तीन लाभ होंगे। एक तो निजी निवेश के लिए मध्यम और लंबी अवधि के लिए धन की ब्याज दरों में कमी आएगी। दूसरा, उच्च सार्वजनिक बचत होगी और व्यापार घाटे को समायोजित करने में मदद मिलेगी तथा जीडीपी के 70 फीसदी के बराबर के हमारे सरकारी कर्ज में धीरे-धीरे कमी आएगी। बीते पांच वर्ष के प्रमुख आर्थिक सुधारों-उदाहरण के लिए जीएसटी और आईबीसी-को आधार बनाकर आगे काम करना। जीएसटी दर के ढांचे को सहज बनाने की आवश्यकता है। शायद 15-16 फीसदी की मॉडल दर के साथ यह काम किया जा सकता है। इसके साथ 8 से 10 फीसदी की रियायती दर और व्यसन वाली सामग्री तथा सीमित विलासिता वस्तुओं पर 25 से 30 फीसदी की दर लगाई जा सकती है। निर्यात पर प्रभावी दर शून्य किए जाने की आवश्यकता है। सूचना प्रौद्योगिकी व्यवस्था, पंजीयन और रिपोर्टिंग की आवश्यकता और अनुपालन प्रक्रिया की समय-समय पर समीक्षा और सुधार करने होंगे। आईबीसी की व्यवस्था पर प्रवर्तक और अन्य निहित स्वार्थ वाली कंपनियां निरंतर गंभीर प्रहार कर रही हैं। इस सुधार को मजबूत बनाने के लिए लगातार समीक्षा और सुधार की आवश्यकता है। 
 
अगर हम रोजगार को बढ़ावा देने वाले विनिर्माण क्षेत्र में सुधार को लेकर गंभीर हैं तो हमें श्रम और भूमि क्षेत्र में बड़े सुधारों को अंजाम देना होगा। हमारा लक्ष्य यह होना चाहिए कि हम वियतनाम और बांग्लादेश के साथ मुकाबला करके, चीन से बाहर जा रहे श्रम आधारित उद्योगों को ज्यादा से ज्यादा तादाद में अपने यहां आकर्षित कर सकें।  ये तमाम प्राथमिकताएं चुनाव घोषणापत्रों में भले ही नजर न आएं लेकिन देश के विकास और रोजगार वृद्घि के लिए ये काफी अहम हैं। सतत आर्थिक और सामाजिक विकास का लक्ष्य इनके बिना हासिल करना मुश्किल होगा।
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