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तकनीकी दौर में अब गोपनीय नहीं रहा आपका गुप्त मतदान

तकनीकी तंत्र
देवांग्शु दत्ता /  April 23, 2019

लोकसभा चुनाव के मौजूदा अभियान में मतदाताओं को धमकाने की कोशिशें की गई हैं कि भाजपा को मत नहीं देने पर उन्हें किन हालात का सामना करना पड़ेगा? उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर से भाजपा उम्मीदवार मेनका गांधी ने मुसलमानों की एक सभा में कहा है कि उन्हें मत देने वालों के बारे में उन्हें पता चल ही जाएगा और फिर उन्हें मत नहीं देने वाले लोग जब रोजगार मांगने आएंगे तो उनकी मदद करने में उनकी  कोई रुचि नहीं रहेगी। उन्होंने मत प्रतिशत के आधार पर गांवों की श्रेणी तय करने की भी बात कही है। इसी तरह गुजरात में भाजपा नेता रमेश कटारा ने लोगों को याद दिलाने की कोशिश की है कि मतदान केंद्र पर सीसीटीवी कैमरे भी लगे होते हैं।

 
यह मसला एक गंभीर सवाल खड़ा करता है। नागरिकों को गुप्त मतदान का अधिकार मिला हुआ है लेकिन तकनीक एवं चुनाव से जुड़ी प्रक्रियाओं के चलते इस गोपनीयता को कायम रख पाना लगभग नामुमकिन हो जाता है। अब यह संभव हो चुका है कि किसी व्यक्ति के मत के बारे में काफी हद तक अनुमान लगाए जा सके। मेनका या कटारा की तरह ऐसी बात कहने वाले नेता बहुत कम हैं लेकिन हरेक बड़ा राजनीतिक दल मतदाताओं के व्यवहार के बारे में अंदाजा लगाने के लिए अपने स्तर पर आंकड़ों का विश्लेषण जरूर करता है।
 
मतपत्रों के जरिये मतदान की पुरानी व्यवस्था में यह अंदाजा लगा पाना नामुमकिन था कि किसी मतपेटी में मतपत्र किस क्रम में डाले गए थे? तब यह भी नहीं पता चल पाता था कि किस मतदाता ने किसको मत दिया है? इसके अलावा एक जगह पर इक_ïा मतपेटियों से निकले सारे मतपत्रों को मिलाए जाने के बाद मतगणना शुरू होती थी। इस तरह मत पूरी तरह गोपनीय रहता था। लेकिन आधुनिक चुनाव प्रणाली में स्थितियां बदल चुकी हैं। मतदाता सूचियां सार्वजनिक होती हैं और कोई भी ऑनलाइन उन्हें देख सकता है। उन सूचियों में मतदाता का नाम, पिता का नाम, पता, लिंग और उम्र की जानकारी भी दर्ज होती है। मतदाता को मतदाता पहचान-पत्र देने के साथ ही मतदान केंद्र भी आवंटित किया जाता है। अब तो आधार क्रमांक से भी उसे जोड़ा जाने लगा है।
 
मतदाता सूची तक सबकी पहुंच होनी चाहिए ताकि कोई भी गड़बड़ी होने पर उसमें जरूरी संशोधन कराया जा सके। लेकिन यह भी सच है कि मतदाता सूचियों ने किसी खास समुदाय को निशाना बनाने वाले दंगों को भी संभव बनाया है। इसकी शुरुआत 1984 में ही हो गई थी जबकि उस समय मतदाता सूचियां ऑनलाइन नहीं होती थीं। मतदान के दिन मतदाता अपने आवंटित मतदान केंद्र पर जाता है जहां उसके पहचान-पत्र की जांच होती है। फिर एक रजिस्टर में उसका नाम दर्ज किया जाता है और वह मतदान करता है। मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) का इस्तेमाल होता है जिसमें हरेक मत क्रमिक ढंग से रिकॉर्ड होता है और उसका मिलान करने के लिए वीवीपैट पर्ची भी निकलती है। अगर मतदान केंद्र के रजिस्टर का मिलान ईवीएम में दर्ज मतों के क्रम से किया जाए तो यह पता लगाना वाकई में संभव है कि किस मतदाता ने किस उम्मीदवार को मत दिया है। इस मामले में हमें चुनाव आयोग की निष्ठा पर भरोसा करना होता है।
 
हरेक ईवीएम मशीन एक क्षेत्र में मतदान केंद्र पर लगी होती है जिससे यह पता लगाना भी संभव है कि वहां के मतदाताओं ने किस दल को मत दिया है? यह सूचना सार्वजनिक रूप से भी उपलब्ध होती है। मतगणना केंद्र पर भी उम्मीदवारों के अपने प्रतिनिधि तैनात होते हैं जो मतों की गिनती पर नजर रखते हैं। चुनाव आयोग चुनावों के बारे में फॉर्म 20 भी जारी किया जाता है जिसमें हरेक ईवीएम मशीन में डाले गए मतों का ब्योरा दर्ज होता है। राजनीतिक दल किसी स्थान पर धर्म, जाति एवं पसंद का अंदाजा लगाने के लिए आंकड़ों का व्यापक विश्लेषण करते हैं। स्थानीय कार्यकर्ताओं को मतदाताओं की आर्थिक स्थिति के बारे में अच्छी जानकारी होती है। अब तो सोशल मीडिया के प्रसार और आधार क्रमांक जोड़े जाने से तमाम योजनाओं के बारे में भी आंकड़े उपलब्ध होने लगे हैं। मसलन, आधार क्रमांक से मोबाइल फोन नंबर के अलावा आयकर रिटर्न और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में भी पता लगाया जा सकता है। इसके अलावा फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म के जरिये संबंधित व्यक्ति की शैक्षणिक पृष्ठभूमि, रोजगार और पारिवारिक विन्यास के बारे में भी पता चल जाता है। बहुत कम लोग ही ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपने राजनीतिक रुझान और पारिवारिक संपर्कों के बारे में बताने से खुद को रोक पाते हैं। भला ऐसा करना भी क्यों चाहिए?
 
जब इन तमाम स्रोतों से मिली सूचनाओं का मिलान फॉर्म 20 से किया जाता है तो काफी सटीक अनुमान मिल जाता है कि किसी व्यक्ति, परिवार, समुदाय और गांव ने किस दल को मत दिया है? दलों के कार्यकर्ता इस आधार पर व्हाट्सऐप एवं फेसबुक ग्रुप बनाकर मतदाताओं को प्रभावित करने में जुट जाते हैं। इस दौरान 'गैर-समर्थक' मतदाताओं की शिनाख्त कर उनका नाम मतदाता सूची से हटवाने या मतदान के दिन उन्हें दूर रहने के लिए बाध्य करने जैसी चालबाजियां भी अपनाई जाती हैं। मेनका और कटारा की इन धमकियों को इसी श्रेणी में रखना चाहिए।
 
आंध्र प्रदेश में मतदाताओं का प्रोफाइल बनाने के लिए आधार कार्ड से जुड़े आंकड़े खंगालने का आरोप एक निजी फर्म पर लग चुका है। इस धांधली में करीब 80 लाख लोगों के ब्योरे जुटाकर उनका गलत इस्तेमाल किया गया। यह तो आधार रूपी हिमखंड का एक छोटा हिस्सा भर है। ऐसे मामलों में दंड लगभग नगण्य है जबकि फायदा काफी बड़ा है। मतदान आंकड़ों को अनाम रखने का कोई भी तरीका आसान नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न ईवीएम मशीनों से जुटाए गए आंकड़ों को जोड़कर कुल मतों की गणना किए जाने संबंधी प्रस्ताव को 2017 में वीटो कर दिया था। यह बताता है कि कानूनी प्रणाली पर तकनीक किस कदर हावी हो चुकी है?
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, congress,,
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