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निवेशकों, एमएफ और सेबी के लिए सबक

देवाशिष बसु /  April 23, 2019

एफएमपी प्रकरण ने बाजार नियामक, फंड कंपनियों और निवेशकों को बुनियादी नियमों की तरफ लौटने का सबक सिखाया है। फंड बाजार के इस पहलू का विश्लेषण कर रहे हैं देवाशिष बसु

 
म्युचुअल फंड के निवेशकों को एक और झटका लगा है। कुछ महीने पहले कुछ डेट फंडों को दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुके अनिल अंबानी समूह, हद से ज्यादा बड़े ज़ी समूह, विवादास्पद दीवान हाउसिंग और कुप्रबंधन की शिकार इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) में निवेश के चलते काफी नुकसान उठाना पड़ा था। फंड कारोबार को उसी समस्या ने एक बार फिर अपनी चपेट में लिया है। इस बार ज़ी समूह में निवेश करने वाले फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान (एफएमपी) लपेटे में आए हैं।
 
दो फंड हाउस के कुछ एफएमपी पिछले दिनों परिपक्व होने वाले थे लेकिन वे अपने निवेशकों को समूची परिपक्वता राशि नहीं लौटा पाए या फिर उन्होंने परिपक्वता की तारीख आगे खिसका दी। इसकी वजह यह है कि उन्होंने ज़ी समूह में निवेश कर रखा था लेकिन समूह उन्हें राशि नहीं लौटा पाया। फंड हाउस ने इस समस्या का हल निकालने की कोशिश की है लेकिन वे उस प्रावधान का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं जिसमें कहा गया है कि एफएमपी की परिपक्वता अवधि पूरी होने पर वे निवेशकों को समूची रकम लौटाएंगे। किसी भी फंड हाउस के लिए परिपक्व प्लान की राशि को पूरी तरह और निर्धारित समय पर न लौटा पाना निवेशक के साथ किए गए अनुबंध का गंभीर उल्लंघन है और फंड प्रणाली में एक गंभीर स्थिति को दर्शाता है। इस प्रकरण से क्या सीख मिलती है? वह सबक यह है कि नियामक, फंड हाउस और निवेशक तीनों को बुनियादी सिद्धांत की तरफ लौटना चाहिए।
 
म्युचुअल फंडों के लिए सबक
 
फंड हाउस कई सुविधाजनक व्याख्याओं के साथ सामने आए हैं, मसलन वे निवेशकों के सर्वश्रेष्ठ हित में काम कर रहे हैं (जबकि पहले वे अपने निवेश निर्णयों को लेकर काफी लापरवाह रहे हैं) लेकिन सच यह है कि उन्होंने ज़ी समूह के शेयरों के एवज में रकम दी है लेकिन वे उन शेयरों को बेच नहीं सकते हैं। इसकी वजह यह है कि तमाम 'लेनदार' वैसी ही हालत में हैं। अगर वे भुगतान में चूक की स्थिति में फंड से निकलने की कोशिश भी करते हैं तो उस प्लान की कीमत 30 फीसदी से अधिक गिर जाएगी।
 
अब कोई भी प्रेक्षक यह सवाल पूछ सकता है कि निवेशकों ने एफएमपी को चुनकर ऋण प्रतिभूति (डेट) में निवेश करने का विकल्प चुना था तो उन्हें ज़ी के शेयरों से क्या लेना-देना है? अगर वे ज़ी के शेयरों में ही निवेश करना चाहते तो वे इक्विटी फंडों के जरिये या फिर सीधे शेयर ही खरीद सकते थे। यह कमरे में बंद ऐसा हाथी है जिसके बारे में कोई भी बात नहीं करना चाहता है।  म्युचुअल फंडों ने इनमें से अधिकांश मामलों में सूचीबद्ध शेयरों के एवज में 'प्रवर्तक फंडिंग' की है। मेरा मानना है कि प्रवर्तक फंडिंग का मतलब डेट प्रतिभूति में निवेश करना नहीं है। निश्चित रूप से सूचीबद्ध शेयर जैसे अस्थिर समकक्ष के लिए पैसे उधार देना तो तय परिपक्वता अवधि वाली योजना (एफएमपी) के लिए एक त्रासद रणनीति है। हालात उस समय और जटिल हो गए जब म्युचुअल फंडों से लेकर वित्तपोषण कंपनियों जैसी 40 इकाइयां किसी झुंड की तरह एक ही शेयर को उधार देती रहीं। लेकिन अब वह झुंड फंस चुका है। वे अपने पास रखे शेयर बेच नहीं सकते हैं। निवेशकों से मिली रकम निवेश करने वाले म्युचुअल फंडों का काम शेयरों के एवज में उधार देना नहीं है क्योंकि यह सीमित रिटर्न देने वाले डेट उत्पादों में इक्विटी की तरह अधिक जोखिम पर दांव न लगाने के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। यहीं से हम अगले सबक तक पहुंचते हैं।
 
निवेशकों के लिए सबक
 
अपने संस्थान मनीलाइफ में हम करीब 10 वर्षों से लगातार यह कहते आए हैं कि बचतकर्ताओं और निवेशकों को एफएमपी से परहेज करना चाहिए। इसके पीछे बहुत सरल नियम है। इक्विटी जोखिम से भरे होते हैं लेकिन उन पर ऊंचा रिटर्न मिलने की संभावना होती है। उनकी तुलना में ऋण उत्पाद कम जोखिम वाले होते हैं और उन पर रिटर्न भी अपेक्षाकृत कम ही होता है। यही वजह है कि जब इक्विटी का मामला आता है तो निवेशकों को जोखिम लेना चाहिए लेकिन डेट के मामले में उन्हें जोखिम उठाने से बचना चाहिए। लेकिन अफसोसजनक ढंग से निवेशक इसका ठीक उलटा करते हैं। वे इक्विटी में कम जोखिम उठाते हुए थोड़ा आवंटन ही करते हैं लेकिन ऋण उत्पादों के मामले में थोड़े से अधिक ब्याज और कर बचत के चक्कर में अधिक जोखिम उठाते हैं।
 
डेट उत्पादों का दूसरा पहलू यह है कि अलग-अलग श्रेणियों में जोखिम का स्वरूप अलग होता है। अगर आपने किसी बढिय़ा कंपनी या बैंक में राशि जमा की है तो उसमें कम जोखिम होता है। वहां ब्याज दरें और निवेश की अवधि दोनों ही तय होती हैं और परिपक्वता पर आपको मूलधन के साथ ब्याज भी मिलता है। लेकिन डेट फंड एकदम अलग तरह की योजना होते हैं। वे किसी तरह का ब्याज नहीं देते हैं। डेट फंड और उसके निवेशक दोनों ही ऋण बाजार का हिस्सा बनते हैं और उससे निवेशक को पूंजीगत लाभ या हानि होती है। अब यह एक अलग तरह का जोखिम है जो निवेश का समय गलत होने से जुड़ा है। इसे गलती से 'निश्चित आय वाली योजना' भी कह दिया जाता है। क्या आपके पास ऐसी विशेषज्ञता है कि ऋण बाजार में निवेश का सही समय जान सकें? इसका जवाब ना में है। लिहाजा इस जोखिम से दूर ही रहना चाहिए। या फिर किसी ऐसी योजना को खरीदें जिसमें समय का कोई भी जोखिम न रहे, मसलन लिक्विड फंड और शॉर्ट टर्म फंड। अब हम इतना तो जान ही गए हैं कि डेट फंड शेयरों के एवज में कर्ज देकर इक्विटी बाजार के हालात पैदा कर देते हैं। 
 
सेबी के लिए सबक
 
ऐसा नहीं है कि बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित ये सबक निवेशकों एवं फंड हाउसों के लिए नए हैं। लेकिन आदतों से जुड़े पूर्वग्रहों- संक्षिप्त याद्दाश्त, लालच, झुंड के रूप में चलने के चलते इन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन एक संयमी रेफरी होने के नाते बाजार नियामक सेबी को ऐसा कोई पूर्वग्रह नहीं रखना चाहिए। इसके अलावा सही कदम उठाने में मदद करने के लिए सेबी के पास संस्थागत स्मृति भी होनी चाहिए। संयोग से सेबी ने अपने मौजूदा चेयरमैन अजय त्यागी की अगुआई में म्युचुअल फंड कारोबार को साफ-सुथरा करने के लिए कई कदम उठाए हैं। फंड हाउसों ने तमाम श्रेणियों में तमाम योजनाएं पेश कर दी हैं जबकि उनकी कोई जरूरत ही नहीं है। दुर्भाग्य से सेबी डेट फंडों और एफएमपी की नाकामी से जुड़े मामलों में खुद को अक्षम पा रहा है। 
 
सेबी को यह सवाल पूछने की जरूरत है कि एफएमपी का इस्तेमाल सूचीबद्ध शेयरों के एवज में प्रवर्तकों को फंड जुटाने के साधन के तौर पर क्यों किया जा रहा है? क्या इसमें इक्विटी जोखिम नहीं शामिल है? अगर हां तो फिर यह किसी भी डेट म्युचुअल फंड में एक योजना क्यों होती है? लगता है कि सेबी भी प्रवर्तकों के निवेश साधनों (मसलन, येस बैंक और दीवान हाउसिंग) को फंड मुहैया कराने वाले म्युचुअल फंडों पर कार्रवाई नहीं कर पाया है। सबसे बुरा प्रदर्शन क्रेडिट रेटिंग देने वाली एजेंसियों का रहा है। इन एजेंसियों ने ही आईएलऐंडएफएस को अव्वल दर्जा दिया था। ये सभी परिस्थितियां पहले सिद्धांत का उल्लंघन करती हैं। वक्त आ गया है कि हम बुनियादी नियमों का पालन करें। इस दौरान सेबी अधिकारियों को वर्ष 2008 में हुए एफएमपी घोटाले पर भी एक नजर डाल लेनी चाहिए जिसके सबक शायद वे भूल गए हैं। 
 
(लेखक मनीलाइफ डॉट इन वेबसाइट के संपादक हैं)
Keyword: sebi, share, market, sensex, बीएसई, कंपनी, शेयर,,
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