बिजनेस स्टैंडर्ड - छोटे कारोबारियों को कर्ज
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छोटे कारोबारियों को कर्ज

संपादकीय /  April 23, 2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यापारियों के एक सम्मेलन को संबोधित करते समय दोबारा अपनी सरकार बनने पर नीतियों में बदलाव को लेकर कई वादे किए हैं। मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को परंपरागत तौर पर छोटे कारोबारियों की पार्टी माना जाता रहा है लेकिन उनकी सरकार के पांच वर्षों के कार्यकाल में अपनाई गई कुछ नीतियों ने इस परंपरागत वोट बैंक को दूर करने का काम किया है। मोदी निश्चित रूप से उनका समर्थन दोबारा हासिल करना चाहते हैं और यह उनकी प्राथमिकता भी है। लेकिन प्रधानमंत्री का एक वादा ऐसा है जिस पर खास ध्यान देने की जरूरत है। इस वादे का ढांचा बीते दशकों में कर्ज को लेकर भारतीय राज्य की गलतियों को ही प्रदर्शित करता है और भारतीय वित्तीय क्षेत्र के इस मुश्किल दौर में इसकी सलाह नहीं दी जा सकती है। 

 
प्रधानमंत्री ने कहा है कि किसान क्रेडिट कार्ड की तर्ज पर कारोबारियों के लिए भी क्रेडिट कार्ड योजना लाई जाएगी। उन्होंने यह भी कहा है कि इस क्रेडिट कार्ड पर कारोबारियों को बगैर किसी जमानत के 50 लाख रुपये तक का कर्ज भी दिया जाएगा। संकल्पना के स्तर पर इस योजना का मकसद समझा जा सकता है। कई कारोबारियों को नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दोहरे आघातों के बाद नकदी की कमी का सामना करना पड़ा है। कर्ज मिलना काफी मुश्किल हो चुका है। ऐसे में इस खास क्षेत्र और अर्थव्यवस्था दोनों के ही नजरिये से यह जरूरी लगता है ताकि कारोबारी क्षेत्र में कर्ज का प्रवाह अधिक खुलेपन से होना सुनिश्चित किया जा सके। लेकिन इस तरह से निर्देशित कर्ज आवंटन हमेशा ही बुरा विचार होता है। पिछले दशकों के अनुभव बताते हैं कि कर्ज बांटने के लिए लगाए गए कर्ज मेले शायद ही कभी अपना लक्ष्य हासिल कर पाते हैं। आखिरकार निर्देशित कर्ज आवंटन, खासकर बिना जमानत के कर्ज देने से ये कर्ज बांटने के लिए बाध्य किए गए बैंकों पर केवल दबाव ही बढ़ता है। बैंकों के राष्ट्रीयकरण का आज तक का पूरा इतिहास ही यह दिखाता है कि राष्ट्रीयकृत बैंक सरकारी नीति का औजार बन जाने पर मध्यावधि से लेकर दीर्घावधि के संकट में फंस जाते हैं। बैंकों के राष्ट्रीयकरण को इसी आधार पर उचित ठहराया गया था कि नियोजित अर्थव्यवस्था की प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को कर्ज देने के लिए उन्हें बाध्य किया जा सके।
 
वास्तव में, बैंक कर्ज फंसने से पैदा हुए संकट से अभी तक ठीक से उबर नहीं पाए हैं। आधारभूत ढांचा, निर्माण, ऊर्जा और कमोडिटी क्षेत्र को कर्ज का आवंटन अब भी फंसा हुआ है। इसी दौरान सरकार ने मुद्रा योजना के तहत बांटे गए कर्जों के रूप में बैंकिंग की पीड़ा और बढ़ाने का ही काम किया है। गत वित्त वर्ष में इन बैंकों में चूक की घटनाएं बढ़ी हैं। और अब प्रधानमंत्री मोदी बैंकों का कर्ज फंसने का एक और जरिया तैयार करने की बात कर रहे हैं। हमारे नेताओं को यह समझने की जरूरत है कि सार्वजनिक बैंकिंग प्रणाली उनके दोबारा चुने जाने के लिए पैसों का इंतजाम करने का मुफ्त का जरिया नहीं है।  रियायती दरों पर या बिना जमानत के कर्ज देने के वादों का खमियाजा आखिरकार प्रत्यक्ष आय अंतरण के रूप में भरना ही होगा। लेकिन लोन मेला या कर्ज माफी योजनाएं समूची वित्तीय व्यवस्था को दबाव में लाने का काम करती हैं जिसके चलते कोई बैंक आगे कर्ज बांटने पर रोक भी लगा सकता है। अगर ऐसा होता है तो आर्थिक सुस्ती या संकट के हालात बन सकते हैं। अगर छोटे कारोबारियों के लिए क्रेडिट कार्ड योजना लाने को लेकर सरकार वाकई गंभीर है तो इस वादे को लेकर अधिक जानकारी दी जानी चाहिए थी। मौजूदा समय में तो यह एक गलत विचार ही लग रहा है।
Keyword: narendra modi, BJP, traders,,
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